Flash back- जानिए जब लोकसभा चुनाव में यूपी से इस राष्ट्रीय पार्टी का खाता भी नहीं खुला था

पहली बार 1998 में वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में नई इबारत लिखी।

By: Ajay Chaturvedi

Published: 29 Mar 2019, 12:48 PM IST

डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी

वाराणसी. पिछले पांच साल से सत्तारूढ़ पार्टी के शीर्ष नेता एक ही नारा लगाते रहे, कांग्रेस मुक्त भारत। खास तौर पर प्रधानमंत्री का एक मात्र यही स्लोगन रहा। मई 2014 में दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के बाद हुए अधिकांश विधानसभा चुनावों (दिल्ली और पंजाब छोड़ कर) शुरूआती दौर में बीजेपी को सफलता भी मिली जब एक के बाद एक प्रदेशों में उसकी सरकार बनती गई। 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को सपा से गठबंधन के बाद भी करारी हाल झेलनी पड़ी थी। लेकिन अगर बात करें कांग्रेस से मुक्ति का तो वह तो 1977 में ही शुरू हो गया था। पहली बार दिल्ली की सत्ता पर गैर कांग्रेस सरकार बनी थी। वह भी तब जब विपक्षी गठबंधन को प्रचार-प्रसार का पर्याप्त मौका भी नहीं मिला था। अब बीजेपी के नेता कह रहे हैं कि यूपी में पिछली बार से भी बेहतर मत मिलेगा। तो यहां यह भी बता दें कि 1951 से अब तक हुए 16 लोकसभा चुनावों में दो मौके ऐसे आ चुके हैं जब यूपी में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला।

पहली बार कांग्रेस से मुक्ति 1977 में
बता दें कि 25 जून, 1975 से लेकर 21 मार्च, 1977 तक भारत में इमरजेंसी लगी रही। इसी बीच दौरान 23 जनवरी, 1977 को इंदिरा गांधी ने अचानक लोकसभा चुनाव का ऐलान कर दिया। 16 से 19 मार्च तक चुनाव हुए, 20 मार्च से मतगणना शुरू हुई और 22 मार्च तक लगभग सारे परिणाम घोषित कर दिए गए। यह पहला मौका जब देश में कांग्रेस को भारी पराजय का समाना करना पड़ा था। महज 153 सीटें मिली थीं कांग्रेस गठबंधन को। कारण इस चुनाव में पहली बार कांग्रेस हराओ के नाम पर समूचा विपक्ष एक जुट हो गया था। जनता पार्टी के नाम से नई पार्टी का उदय हुआ। हालांकि समूचा विपक्ष भारतीय लोक दल के चुनाव निशान पर लड़े थे। तब इस गठबंधन को 295 सीटें मिली थीं। मोरारजी देसाई इस गठबंधन के नेता थे। सूरत से जीते थे। यहां तक कि पाकिस्तान के टुकड़े करा कर बांग्लादेश के रूप में दुनिया के मानचित्र पर एक नए देश का नाम अंकित कर लौह महिला का खिताब पाने वाली तेज तर्रार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रायबरेली से खुद से राजनारायण के हाथों हार मिली थी। इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी भी चुनाव हार गए थे। यानी पहली बार यूपी में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला।

ये दल शामिल थे जनता पार्टी में
जनता पार्टी के गठबंधन में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, शिरोमणि अकाली दल, पेजैंट्स एंड वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया, रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया और डीएमके। सबने भारतीय लोकदल के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ा था।

कांग्रेस के साथ थे ये दल
कांग्रेस के गठबंधन में एआईडीएमके, सीपीआई, जम्मू एंड कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, केरल कांग्रेस और रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी। दोनों ही गठबंधन को दो-दो निर्दलियों का समर्थन प्राप्त था।

इंदिरा गांधी की हार की पृष्ठभूमि
1971 में रायबरेली से इंदिरा गांधी ने राजनारायण को हराया था। उस वक्त इंदिरा गांधी की पहचान सख्त नेता की थी। उन्होंने बैंकों के राष्ट्रीयकरण और पाकिस्तान के साथ युद्ध और पाकिस्तान के टुकड़े कर नए देश के रूप में बांग्लादेश की स्थापना कर अपनी इमेज बहुत तगड़ी बना ली थी। पर उसी चुनाव के बाद राजनारायण ने इंदिरा गांधी पर चुनाव के दौरान धांधली का आरोप लगाया। मामला कोर्ट में गया। जस्टिस जगमोहन सिन्हा ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध करार दे दिया। यहीं से शुरू हुआ इमरजेंसी का दौर। इंदिरा गांधी ने लोकतांत्रिक प्रणाली को ताख पर रख कर अप्रत्याशित तरीके से देश में आपात काल लागू करने का कदम उठाया।

'1998 में सोनिया के राजनीति में शामिल होने के बाद भी मिली थी पराजय
ये दौर था 1998 का जब पहली बार सोनिया गांधी ने सक्रिय राजनीति में आना स्वीकार किया था। पार्टी ने सत्ता में रहने के लिए किसी अन्य दल के साथ समझौता नहीं किया था। मई 1991 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की निःशंस हत्या के बाद उस हत्याकांड की जांच को गठित जैन कमेटी की रिपोर्ट आ चुकी थी। पार्टी को भरोसा था कि राजीव गांधी की हत्या पर आई जैन कमेटी की रिपोर्ट का फायदा उसे जरूर मिलेगा। ऊपर से सोनिया गांधी के भी पार्टी से जुड़ने पर दिग्गज कांग्रेसी नेताओं को नई संजीवनी बूटी मिल चुकी थी। लेकिन राजनीति की सीढ़ी पर सोनिया ने अभी पहला कदम ही रखा था। पार्टी का प्राइमरी मेंबर बने उन्हें चंद महीने ही हुए थे। ऊपर से सोनिया ने चुनाव लड़ना भी मंजूर नहीं किया था।

सोनिया के कांग्रेस से जुड़ने से कांग्रेस में था अदम्य उत्साह
गांधी परिवार के एक बार फिर कांग्रेस से जुड़ने पर भले ही दिग्गज कांग्रेसी उत्साह से भरे हुए थे। लेकिन उधर सभी विपक्षी पार्टियों ने चुनाव के लिए कांग्रेस को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया और जैन कमेटी की रिपोर्ट पर भी कांग्रेस को मतदाताओं का साथ नहीं मिला। सही मायने में 12वां लोकसभा चुनाव बीजेपी की ताकत का मुजाहिरा बना। बीजेपी को छोड़ दें तो लगभग सभी पार्टियों के वोट शेयर गिरे। बीएसपी के वोट शेयर जरूर ढाई फीसदी बढ़े लेकिन पार्टी की सीटें घटकर 11 से 05 ही रह गईं।

लिखी गई भारतीय लोकतंत्र की नई इबारत
1998 के लोकसभा चुनावों में मतदाताओं ने भारत के लोकतंत्र की एक नई इबारत लिख दी थी। पहली बार कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बज चुकी थी और उसे कड़ी टक्कर थर्ट फ्रंट से नहीं बल्कि बीजेपी से मिल रही थी। कोई भी पार्टी कांग्रेस के टक्कर की तभी मानी जा सकती थी जब वो न सिर्फ कांग्रेस से ज्यादा सीटें जीतें बल्कि देश भर में उसका जनाधार हो।

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस तथा जनसंघ/भाजपा की स्थिति


चुनावी वर्ष- कांग्रेस की जीत- मत प्रतिशत- जनसंघ/भाजपा- मत प्रतिशत

1-1951- 81- 52.99- 00- 7.29

2-1957- 70- 49.29- 02- 14.79

3-1962- 62- 38.02- 07- 17.57

4-1967- 47- 33.44- 12- 22.18

5-1971- 73- 48.54 04- 12.23

6-1977- 00- 24.99- 85- 68.07

7-1980- 51- 35.90 29- 29.02

8-1984- 83- 51.03- 00- 6.24

9-1989- 15- 31.77- 08- 7.58

10-1991- 05- 18.02- 51- 32.82

11-1996- 05- 8.14- 52- 33.44

12-1998- 00- 6.02- 57- 36.49

13-1999- 10- 14.72- 29- 27.64

14-2004- 09- 12.04- 10- 22.17

15-2009- 21- 18.25- 10- 17.05

16-2014- 02- 7.53- 71- 42.63

 

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