विश्वनाथ कॉरिडोर प्रकरण- ...तो देश के दूसरे प्रधानमंत्री ने जहां रह कर की पढ़ाई वह निशानी भी अब नहीं रहेगी

लाहौली टोला निवासी इस प्रकांड विद्वान व आशुलिपि के जनक का घर भी ध्वस्त कर दिया जाएगा।

By: Ajay Chaturvedi

Published: 25 Apr 2018, 05:39 PM IST

डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी


वाराणसी. श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, गंगा पाथ वे के नाम पर जिन प्राचीन इमारतों को ध्वस्त करने की सूची वाराणसी विकास प्राधिकरण ने तैयार की है, उसमें एक ऐसा भवन भी है जिससे देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का गहरा नाता है। लाल बहादुर शास्त्री ही नहीं, अपितु वह भवन ऐसी सख्शियत का है जिसका देश की हर नामचीन हस्ती से सीधा नाता रहा। उन्हें आशु लिपि का जनक माना जाता है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय उन्हें अपना सहोदर भ्राता मानते रहे। वह गणित के प्रकांड विद्वान भी थे। ऐसी सख्शियत का भवन जिसे संरक्षित करने की जरूरत हो उसे भी धरोहर नहीं मानता ये शासन-प्रशासन। उस ऐतिहासिक धरोहर को भी जमींदोज करने का निर्णय कर लिया गया है।

ये भवन और किसी का नहीं बल्कि पंडित निष्कामेश्वर मिश्र का है। पंडित जी को आशुलिपि का जनक माना जाता है। पंडित जी के पौत्र आनंद मिश्र ने पत्रिका से खास बातचीत में यह जानकारी दी। बताया कि नागरी प्रचारिणी सभा में रहते हुए दादा जी ने निष्काम प्रणाली विकसित की थी, वह हिंदी शार्टहैंड के नाम से विख्यात हुई। उस वक्त के लोग इसका प्रोयग कर आसानी से बहुत तेजी से कुछ भी लिख लिया करते थे। उन्होंने बताया कि दादा जी पहले हरिश्चंदर कॉलेज में गणित व अंग्रेजी के शिक्षक थे, उसी वक्त लाल बहादुर शास्त्री से उनकी मुलाकात हुई। एक रोचक किस्सा बताते हुए कहा कि दादा जी अक्सर बच्चों को शैक्षणिक भ्रमण पर ले जाया करते थे। एक बार एक टूर पर जाना था तो उस जमाने में उन्होंने बच्चों से एक-एक आना मंगवाया था कि आने-जाने का किराया निकल जाएगा। लेकिन शास्त्री जी के पास तब एक आना भी नहीं था। पूछने पर शास्त्री जी ने उन्हें अपनी आर्थिक स्थिति की जानकारी दी। वो वक्त था कि दादा जी ने उनसे कहा कि आप मेरे लाहौरी टोला स्थित आवास पर आओ, हम आपकी शिक्षा-दीक्षा और खाने पीने का सारा इंतजाम करेंगे, तभी से दादी जी के साथ ही वह रहने लगे। आनंद मिश्र ने बताया कि बाद में शास्त्री जी ने मेरे पिता राधा कृष्ण मिश्र उर्फ राधे भैया, चाचा आदि को पढाने लगे। उस ट्यूशन का पैसा दादी गुल्लक में रखती थीं। शास्त्री जी की बेटी की शादी में दादी ने गुल्लक फोड़ कर तब नौ सौ रुपये दिए थे। वो नौ सौ रुपये आज की कीमत से लाखों में होगा। आनंद मिश्र बताते हैं कि दादा जी यानी निष्कामेश्वर मिश्र काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पंडित महामना मालवीय के भी काफी नजदीक रहे। मालवीय जी के बुलावे पर ही वह सेंट्रल हिंदू स्कूल में बतौर शिक्षक चले गए। उन्होंने बताया कि आज भी उस घर में मेरे बड़े भाई, चाचा आदि का परिवार रहता है। कहा कि यह जानकर बहुत दुःख हुआ कि विश्वनाथ कॉरिडोर के नाम पर इस धरोहर को भी ध्वस्त कर दिया जाएगा।

वरिष्ठ पत्रकार योगेंद्र नारायण शर्मा ने पत्रिका से बातचीत में बताया कि शास्त्री जी ने पंडित निष्कामेश्वर मिश्र के घर रह कर पढ़ाई तो की ही। प्रधानमंत्री बनने के बाद जब वह पहली बार वाराणसी आए तो वह अपने गुरुजी से मिलने पहुंचे थे लाहौली टोला। तब सरस्वती फाटक क्षेत्र स्थित पंडिक कालिका प्रसाद वैद्य के दवाखाने पर उनका भव्य स्वागत किया गया था। उस वक्त हम लोग छोटे थे, हम लोगों को भी शास्त्री जी से मुलाकात करने का मौका मिला था। अब वो सारी यादें भी नहीं रह जाएंगी जब सब ध्वस्त हो जाएगा। बताया कि मिश्र जी, शास्त्री जी को अपने पुत्र के समान मानते थे। यह रिश्ता पंडित जी के निधन तक कायम रहा। यहां तक कि बताया जाता है कि दिल्ली से बनारस आते समय जब रजौला के पास ट्रेन में ही हृदयाघात से पंडित जी का निधन हो गया तो प्रधानमंत्री रहते हुए शास्त्री जी रजौला आए थे और प्लेट फार्म पर ही चप्पल तक उतार दी थी और नंगे पांव उस बोगी में गए। यहां तक कि पंडित जी के पुत्र जब चप्पल पहन कर बोगी में चढ़ने लगे तो शास्त्री जी ने उन्हें टोका और कहा कि इस बोगी में गुरुजी ने प्राण त्यागे हैं यहां उनका पार्थव शरीर है लिहाजा यह मंदिर है। ऐसी था दोनों के बीच का संबंध। अब उस महान विभूति का आवास भी जमींदोज कर दिया जाएगा।

Ajay Chaturvedi
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