डीआईजी का बंगला ही बेचने की तैयारी में थे माफिया 

डीआईजी का बंगला ही बेचने की तैयारी में थे माफिया 
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1939 में ही रची गई थी कहानी, भू माफिया ने बिछाया जाल, पुलिस लड़ रही मुकदमा

वाराणसी. अभिषेक बच्चन की एक चर्चित फिल्म बंटी और बबली आपने देखी ही होगी। फिल्म में किस तरह वह धोखाधड़ी करके ताज महल तक बेच देता है। ऐसा ही कुछ बनारस में हुआ है। जो पुलिस माफिया के साथ मिलकर जमीनों पर कब्जा करती है, गुंडे-बदमाशों से पीडि़त जनता को न्याय दिलाने में अहम भूमिका निभाती हो, उसे भी कोई चूना लगा सकता है। पुलिस विभाग के एक आला अधिकारी का बंगला ही भू माफिया कागजों की हेराफेरी कर अपने नाम दर्ज करा लिया था वह भी सरकारी विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत से। जी हां, ये सच है वाराणसी में भू माफिया ने तहसील कर्मियों के साथ मिलकर ऐसी हेराफेरी की कि वाराणसी पुलिस के भी होश फाख्ता हो गए। डीआईजी बंगला और परिसर की जमीन का एक बड़ा भू-भाग अपने नाम करा लिया था। सूत्रों के अनुसार बीते दस वर्षों में पूर्वांचल के एक माफिया के साथ मिलकर कारोबारी उक्त जमीन को झूठे कागजातों के आधार पर हथियाने की फिराक में था ताकि वहां पर एक बहुमंजिली इमारत खड़ी हो सके। फिलवक्त तो मामला हाईकोर्ट से लेकर वाराणसी की विभिन्न अदालतों में चल रहा है और पुलिस चक्कर लगा रही है।
माफिया, भू माफिया और कारोबारी की तिकड़ी ने इस खेल को बनारस की सबसे बड़ी हेराफेरी बना दिया है। चलिए, हम आपको बताते हैं कि डीआईजी बंगले से जुड़ी वह जानकारी जो आपको हैरत में डाल देगी। 

पुलिस लाइन के समीप मकबूल आलम रोड पर दो बीघा से अधिक जमीन में डीआईजी आफिस है। इस परिसर में डीआईजी का बंगला भी है। कागजी अभिलेखों की पड़ताल में यह बात सामने आई कि वर्ष 1900 से पूर्व यह जमीन काशी नरेश की थी। 1900 में काशी नरेश ट्रस्ट ने उक्त जमीन औसानगंज स्टेट को सौंप दिया। औसानगंज स्टेट के राजा ईश्वरीनारायण सिंह ने उक्त भूखंड को अपने पास ही रखा था। 

जानकारी के अनुसार ईश्वरी नारायण सिंह ने दो शादियां की थी। एक पत्नी का नाम रामकुमारी और दूसरी का नाम जनकनंदिनी। संयोगवश ईश्वरी नारायण सिंह की दोनों पत्नियों से बेटियां हुई, बेटा नहीं। रामकुमारी की बेटी से केदारनाराण सिंह पैदा हुए। मकबूल आलम रोड स्थित उक्त जमीन के साथ ही स्टेट की अन्य संपत्तियों को लेकर रामकुमारी और जनकनंदिनी की बेटियों के परिवार में झगड़ा शुरू हो गया। 

औसानगंज स्टेट से जुड़े लोगों ने उस दौरान औसानगंज ट्रस्ट बनाकर रामकुमारी को मैनेजर बना दिया। रामकुमारी देवी की बेटी से पैदा हुए केदारनाराण सिंह और जनकनंदिनी के बीच मकबूल आलम रोड वाली उक्त जमीन का विवाद शुरू हो गया। इस बीच अधिक अवस्था होने व दोनों पत्नियों के बीच विवाद को देखते हुए ईश्वरीनारायण सिंह ने रामकुमारी के नाती केदारनारायण सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। सौतेली मां ने आपत्ति जताई तो ईश्वरी नारायण सिंह ने डीआईजी बंगला परिसर वाले भूखंड को कई नंबरों में बांट दिया और वसीयत लिखी कि दोनों पत्नियों रामकुमारी और जनकनंदनी के निधन के बाद उक्त जमीन राज्य सरकार को स्वत: स्थानांतरित हो जाएगी। 

केदारनारायण को ट्रस्ट का मैनेजर बनाए जाने को लेकर विवाद गहराया और मामला कोर्ट में पहुंचा तब कोर्ट ने उन्हें ही वारिस माना और ट्रस्ट को और मजबूत करने को कहा। कोर्ट ने संपत्तियों की देखरेख के बाबत कोर्ट ने डीएम गाजीपुर को रिसिवर घोषित किया । इस बीच ईश्वरी नारायण सिंह का निधन हो गया। तत्कालीन कलेक्टर एमए कबीर ने सन 1939 में संपत्ति से संबंधित कागजातों में केदानारायण सिंह का तो नाम दर्ज किया लेकिन डीएम गाजीपुर का नहीं जिससे ऐसा प्रतीत होने लगा कि उक्त जमीन सिर्फ केदारनारायण सिंह की है जबकि उक्त जमीन पर राज्य सरकार का भी हक था। 


साठ के दशक में तहसील में मौजूद कागजातों में से अचानक केदारनारायण सिंह का भी नाम कटकर उनकी सौतेली मां जनक नंदनी का नाम चढ़ गया। जनक नंदनी के पीछे खड़े उस समय आनंद अग्रवाल ने डीआइजी बंगला की जमीन का विक्रयनामा अपने नाम करा लिया और सरकार से डीआईजी बंगले का किराया लेना शुरू कर दिया। इस बीच तहसील की मदद से आनंद ने अपना नाम भी अभिलेख में दर्ज करा लिया और किसी को खबर तक नहीं । 

सन 2005 में आनंद अग्रवाल ने तीन लाख रुपये मासिक किराया के लिए आवेदन किया। एडीएम रेंट ने इंकार किया तो वह सेशन में चले गए। सेशन कोर्ट ने एक लाख 5 हजार किराया तय किया तो आनंद हाईकोर्ट गए। हाईकोर्ट ने एक लाख पैंसठ लाख किराया तय किया। तीन साल भुगतान नहीं हुआ तो आनंद ने दोबारा कोर्ट का दरवाजा खटखटाया तब हाईकोर्ट ने बीते साल 2015 में पुलिस विभाग को किराये के मद में तीन करोड़ रुपये भुगतान का आदेश दिया। 

किराये की रस्साकसी के बीच बात खुली की उक्त जमीन तो रामकुमारी और जनकनंदिनी की मौत के बाद राज्य सरकार को स्थानांतरित होनी थी। पुलिस महकमा फास्ट हुई। तत्कालीन एसपी क्राइम राहुलराज ने अपनी टीम को कागजों की पड़ताल के लिए लगाया और इस बीच उनके हाथ वह डीड लग गई जो ईश्वरी नारायण सिंह ने लिखी थी कि उनकी पत्नियों की मौत के बाद उक्त भूखंड राज्य सरकार को स्वत: स्थानांतरित हो जाएगी।
मामले की परत-दर-परत खुलती गई और पुलिस हैरानी में पड़ गई। सरकार सुप्रीम कोर्ट तक गई मामले में। फिलहाल पुलिस इस मामले को लेकर एडीएम रेंट, सिविल जज जूनियर डिवीजन व सीनियर डिवीजन मेें मुकदमा चल रहा है। 
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