वाराणसी में मतदाताओं ने सबका रखा मान पर रहे खामोश, नहीं गर्मा सका एक भी स्थानीय मुद्दा

वाराणसी में मतदाताओं ने सबका रखा मान पर रहे खामोश, नहीं गर्मा सका एक भी स्थानीय मुद्दा

Ajay Chaturvedi | Publish: May, 17 2019 07:52:19 PM (IST) Varanasi, Varanasi, Uttar Pradesh, India

रैली हो या रोड शो सबमें उमड़ी भीड़
अब ये भीड का क्या होगा रुख। नेताओं की धड़कन तेज
गंगा, मंदिरों का टूटना नहीं बन सका मुद्दा
वायु हो या जल प्रदूषण घोषणा पत्र के पन्नो में दब कर रह गया
सफाई, शिक्षा, स्वास्थ्य भी पीछे छूटा

 

डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी

वाराणसी. अंतिम चरण के मतदान में महज दो दिन शेष हैं। कहने को चुनाव प्रचार का शोर थम चुका है, हालांकि यह शोर अबकी उतनी जोर से सुनाई ही कब दिया। लोग पहले आईपीएल में व्यस्त रहे। उससे खाली हुए तो क्रिकेट विश्वकप की चर्चा में मशगूल हो गए। चुनाव आया और चला गया। इस दौरान नरेंद्र मोदी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, मायववती, चौधरी अजीत सिंह सभी तो आए। पब्लिक ने भी किसी को निराश नहीं किया। सबके साथ हो लिए। चाहे वह मोदी का रोड शो हो या प्रियंका का। चाहे गठबंधन की रैली। सभी में लोग जुटे। अब लोगों को यह समझ नहीं आ रहा कि जब सबके साथ ये जनता है तो जीतेगा कौन। कयास इस बात पर लगाए जा रहे हैं कि ये भीड़ जो नरेंद्र मोदी और प्रियंका गांधी के रोड शो में दिखी तथा अखिलेश यादव, मायवती और चौधरी अजीत सिंह की रैली में नजर आई वो भीड 19 मई को किस करवट बैठेगी।

स्थानीय मुद्दों पर भारी क्रिकेट

वैसे शायद यह पहला मौका होगा जब इस लगभग दो महीना लंबा खिचे लोकसभा चुनाव में बनारस की अडियों पर भी चर्चा से राजनीति तकरीबन गायब रही। पिछले साल भर से या उससे भी पहले से काशीवासी जिन मुद्दों को लेकर चर्चा करते रहे। मसलन गंगा, विश्वनाथ कॉरिडोर, मंदिरों का टूटना, विरासत का नष्ट होना जैसे तमाम मुद्दे थे। इन मुद्दों को लेकर धरना-प्रदेशन तक हुआ। नारेबाजी हुई। कुछ नेता भी पक्ष में ख़ड़े हुए। लेकिन ऐन वक्त पर जब इन मुद्दों को मजबूती से उठाने की दरकार थी तब सब कुछ गायब हो गया। उनकी जगह विराट कोहली, एमएस धौनी, रोहित शर्मा, मुंबई इंडियंस, चैन्नई सुपर किग, कोलकाता नाइट राइडर्स ऐसे ही टीमों ने ले लिया।

वायु प्रदूषण, गंगा प्रदूषण पर भी चुप्पी, मंदिरों को तोड़ने पर भी खामोशी

वायु प्रदूषण जो अब कहीं ज्यादा घातक हो चुका है, जानलेवा हो चुका है। किसी को फिक्र नहीं। गंगा जो पांच साल में नमामि गंगे योजना लागू होने के बाद भी बद से बदतर स्थिति में पहुंच गई हैं। यह भी किसी के जेहन में नहीं आया। लोगों ने गंगा सप्तमी को गंगा की आराधना कर ली। केसरिया जल अर्पित कर दिया।
कॉरिडोर के नाम पर मंदिरों को ध्वस्त करने और विरासत को नष्ट करने का आरोप लगाने वाले भी चुप्पी साधे रहे। न मंदिर का मुद्दा उठा न विरासत का। लोग आए और अपनी बात कह कर चलते बने। कोई कुछ बोल गया तो कोई मुस्कुरा कर निकल लिया।

चौका घाट फ्लाइओवर हादसे की बरसी भी बीत गई

जाम का झाम दिन ब दिन बढ़ता ही गया

 

पूरे देश से मुद्दे रहे गायबः प्रो मिश्र

मां गंगा हों या विश्वनाथ कॉरिडोर का मुद्दा,दोनों ही मसलों पर बेबाकी से अपनी राय रखने वाले संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो विश्वंभर नाथ मिश्र के अनुज प्रो विजय नाथ मिश्र ने पत्रिाक से बातचीत में कहा कि बनारस क्या पूरे देश में कोई मुद्दा नहीं रहा। जब किस स्तर पर चर्चा ही नहीं हो रही तो उसी में बनारस भी है। कहा हम लोगों को इस बात का फर्क रहा कि प्रधानमंत्री हमारे जनप्रतिनिधि रहे और फिर हो सकते हैं। लेकिन हमारी स्थानीय समस्याएं जो थीं पांच साल पहले वो आज भी यूं ही कायम है। कुछ तो और बढी हैं।

लोग गंगा आरती को बना रहे काशी की पहचान, घाट बने अवागी का अड्डा

वह कहते हैं कि बनरास की पारंपरिक रामलीला, कृष्ण लीला, नरसिंह लीला, मोहर्रम, रमजान पर कोई ध्यान नहीं। कभी मोहर्रम पर बिस्मिल्लाह खां साहब के मातमी धुन को सुन हिंदू-मुस्लिम सभी की आंखें सजल हो जाती थीं। वो गंगा जमुनी तहजीब कहां गई। गंगा मर रही हैं पर लोग गंगा आरती में व्यस्त है। गंगा आरती को सोशल मीडिया पर फैला कर काशी की पहचान बना दी गई है। लेकिन जहां आरती होती है वे ही घाट आवरगी का अड्डा बन गए हैं। साल भर से घाट वाक करने के दौरान देखा कि ये घाट आपराधिक घाट में तब्दील हो गए हैं। सिंधिया से राजघाट तक अपराध में डूबा है तो चेतगंज घाट से भदैनी घाट तक का भी वही हाल है। पुलिस से शिकायत करने पर भी सुनवाई नहीं। सिर्फ अच्छे दिन की घुट्टी पिलाई जा रही। अस्सी घाट पर सुबह से रात तक तीन-तीन बार झाड़ू लगता है पर गंगा में सीवर का गिरना जारी है।

रामनगर की रामलीला की जमीन पर हो रहा कब्जा

वह कहते हैं कि रामनगर की विश्व प्रसिद्ध लीला की जमीन पर कब्जा हो रहा है। रामनगर दुर्गा गिरने के कगार पर लेकिन इस पर ध्यान नहीं। अरे ये भी तो विरासत है, हृदय योजना के तहत इसका भी तो जीर्णोद्धार होना चाहिए।

काश कि सात किलोमीटर छोड़ कर नई काशी बनती

जहां तक मंदिरों को तोड़ने और कॉरिडोर बनाने की बात है तो हम काशीवासी सिर्फ यही चाहती थी कि ये सात किलोमीटर को छोड़ कर जिसे हम अपनी विरासत मानेत हैं की जगह कहीं और नई काशी बना लेते। लेकिन नहीं, अब तो घाट अय्याशी का अड्डा बन गए हैं।

बीएचयू से अलग एक बड़ा अस्पताल बनता

स्वास्थ्य पर कोई ध्यान नहीं। ले दे कर एक बनारस हिंदू विश्वविद्यालय है लेकिन इससे काम नहीं चल रहा। इससे इतर एक बड़े अस्पताल की जरूरत है। पर इस तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। बनारस का फोट खींच कर नया फ्रेम देने की कोशिश हो रही है। लेकिन लोग नहीं जानते कि बनारस खत्म हुआ तो फिर कुछ नहीं मिलेगा। इन सब पर चुप्पी से दुःखी हैं मन।

 

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काशी के टूटते मंदिर
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