भक्तों के कांधे पर निकली भगवान जगन्नाथ की पालकी यात्रा, देखें वीडियो...

Ajay Chaturvedi

Publish: Jul, 13 2018 06:19:06 PM (IST)

Varanasi, Uttar Pradesh, India

वाराणसी. गुलाब की पंखुड़ियों की वर्षा और जयकारों के बीच भक्तों के कांधें पर सवार हो कर भगवान जगन्नाथ, बड़े भैया बलभद्र और बहना सुभद्रा के साथ निकल पड़े शहर की सैर को। अस्सी स्थित जगन्नाथ मंदिर में प्रभु के दर्शन के लिए सुबह से उमड़ा रहा श्रद्धालुओं का सैलाब। शाम होते होते वहां तिल रखने को जगह नहीं थी। हर कोई बस भगवान जगन्नाथ की एक झलक पाने और उनकी डोली उठाने के लिए व्यग्र दिखा। ढोल, मजीरा, मृदंग की थाप पर शाम चार बजे मंदिर से निकली प्रभु जगन्नाथ की डोली।

इन रास्तों से निकली पालकी यात्रा
प्रभु की यह पालकी यात्रा अस्सी स्थित जगन्नाथ मंदिर से निकली तो दुर्गाकुंड, नवाबगंज, कश्मीरीगंज, खोजवां, शंकुलधारा, बैजनत्था होते पहुंची रथयात्रा। यहां शाम पांच बजे भगवान की डोली बेनीराम के बगीचे में उतारी गई। यहीं प्रभु की आरती हुई। अब कुछ देर इंतजार के बाद आधी रात के बाद या यूं कहें कि शनिवार तड़के देव विग्रहों को बेनीराम के बगीचे से चंद कदम दूर रथयात्रा चौराहे पर पहले से सुसज्जित 14 पहिए वाले 20 फीट चौड़े व 18 फीट लंबे विशाल रथ स्थापित किया जाएगा। ये विग्रह खास लकड़ी के बने होते हैं। रथ भी पूरी तरह से लकड़ी का ही होता है। तीनों विग्रहों को रथ में प्रतिस्थापित करने से पहले रथ की पूजा की जाएगी। आरती उतारी जाएगी।

 

ज्येष्ठ पूर्णिमा को पड़े थे बीमार

बता दें कि एक पखवारा पहले भक्तों के अतिशय प्रेम के वशीभूत हो कर अत्यधिक स्नान के बाद बीमार पड़े भगवान जगन्नाथ आसाढ़ कृष्ण अमावष्या को स्वस्थ हो गए। शुक्रवार की सुबह प्रभु जगन्नाथ का पट दर्शनार्थियों के लिए खुल गया। शाम होते होते वह शहर की सैर करते हुए मान्यतानुसार रथयात्रा स्थिति ससुराल पहुंचे। अब शनिवार को अलसुबह मंगला आरती के बाद शुरू हो जाएगा काशी के प्राचीन लक्खी मेलों में शुमार रथयात्रा का मेला। बतादें कि पुरी के बाद वाराणसी में ही इतने बड़े पैमाने पर मनाया जाता है रथयात्रा का मेला।

ऐसे हुआ श्रृंगार

पुजारी राधेश्याम पांडेय ने प्रभु जगन्नाथ की विशेष पूजा और आरती की। श्वेत वस्त्र धारण किए भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को गेंदे व तुलसी की माला चढ़ाई गई। केशरयुक्त चंदन, इत्र से श्रृंगार किया गया। कपूर, घी के दीपक और अगर बत्ती संग आरती उतारी गई। फिर निकली पालकी यात्रा।

लगा परवल के जूस का भोग

इससे पहले शुक्रवार की भोर में पांच बजे प्रभु जगन्नाथ को परवल के जूस का भोग लगाया गया। फिर श्रृंगार आदि के पश्चात दर्शनार्थियों के लिए पट खोल दिए गए थे। दोपहर 12 से तीन बजे तक प्रभु के विश्राम के लिए पट बंद कर दिया गया था जो शाम करीब 3.30 बजे खुला और उसके पश्चात प्रभु के सैर की तैयारी शुरू हो गई।


तीन दिवसीय कार्यक्रम

पहले दिन यानी शनिवार को भोर में पीतांबर परिधान में भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा दर्शन देंगे। गेंदे की माला और रजनीगंधा के पुष्प से श्रृंगार होगा। सुबह 5.11 मिनट पर मंगला आरती के बाद दर्शनार्थियों के लिए पट खुल जाएगा। सुबह आठ बजे दूध का नैवेद्य भगवान को चढ़ाया जाएगा। इसके बाद दर्शन-पूजन का जो सिलसिला शुरू होगा वह आधी रात तक जारी रहेगा। बीच-बीच में जैसे दोपहर में भगवान को विविध पकवान का भोग लगेगा। फिर रात में भोग और शयन आरती के बाद आधी रात को पट बंद हो जाएगा।

दूसरे दिन रविवार को पुनः सुबह 5.11 बजे मंगला आरती होगी। इसके बाद प्रभु को लाल परिधान पहनाया जाएगा। लाल फूलों से श्रृंगार होगा। सुबह नौ बजे कुंवर अनंत नारायण प्रभु का दर्शन करेंगे।


तीसरे व अंतिम दिन यानी सोमवार को भी सुबह 5.11 बजे मंगला आरती होगी। छह बजे इस्कान मंदिर की मंडली चैतन्य महाप्रभु के भजनों की प्रस्तुति देगी। नौ बजे छौंके हुए मूंग-चना, पेड़ा, गुड़, खांडसारी, नीबू का तुलसी मिश्रित शर्बत का भोग लगेगा।

लगेगा मगही पान का भोग, होगा नेवान
बतादें कि मान्यता के अनुसार इन तीन दिनों में सबसे पहले मगही पान का भोग भी भगवान जगन्नाथ को लगाया जाता है। मान्यता यह भी है कि इन तीन दिनों में भगवान के विशाल रथ का पहिया अगर बारिश से भींग जाए तो वर्ष पर्यंत धन धान्य की कमी नहीं रहती। फसर अच्छी रहती है। ऐसे में भक्तजन यह कामना करते हैं कि तीन दिनों में देवराज इंद्र की कृपा हो और भगवान जगन्नाथ के रथ का पहिया जरूर से भींगे।

 

भगवान जगन्नाथ
Ad Block is Banned