PM नरेन्द्र मोदी की सीट पर इतनी बड़ी तादाद में लोग नहीं डाल पाए वोट, अब हुआ खुलासा

आमजन से लेकर नेताओं तक की आवाज
-मतदाता सूची में नाम न होना
-एक परिवार के सदस्यों का अलग-अलग केंद्र पर नाम होना
-दिसंबर में विशेष अभियान के दौरान भरा फार्म फिर भी नहीं आया नाम
-बीएलओ के स्तर बड़ी गड़बड़ी

By: Ajay Chaturvedi

Published: 21 May 2019, 01:47 PM IST

वाराणसी. भारत निर्वाचन आयोग से लेकर उत्तर प्रदेश का निर्वाचन विभाग और जिला निर्वाचन कार्यालय तक के स्तर पर पिछली फरवरी से ही देश भर में मतदाता जागरूकता अभियान चलाया गया। लोगों को मतदान के लिए जागरूक करने के लिए अकेले बनारस में साढे तीन लाख रुपये खर्च किए गए। बावजूद इसके मतदान बढ़ने की बजाय दो फीसद घट गया। अब लोगों के बीच कम से कम बनारस में यह चर्चा नहीं हर गली चौराहे पर बहस का रूप ले चुका है। लोगो का कहना है कि जब उन्होंने दिसंबर में ही अपना नाम दर्ज कराने को फार्म भरा फिर उनका नाम मई तक मतदाता सूची में दर्ज क्यों नहीं हुआ। ऐसे हजारों लोग जो तीखी धूप में मतदान केंद्र तक पैदल चल कर गए लेकिन मतदाता सूची में नाम न होने के कारण उन्हें मतदान नहीं करने दिया गया। ऐसे में अब बहस का मुद्दा यह भी है कि मतदाता सूची को आधार कार्ड से क्यों नहीं लिंक किया जाता। क्यों नहीं इसे अनिवार्य किया जाता।

लोगो का कहना है कि जब मोबाइल फोन से लेकर बैंक खातों तक को आधार से लिंक कराना अनिवार्य है तो फिर इतने बड़ी जिम्मेदारी से कैसे मुकरा जा सकता है। बीजेपी के पूर्व पार्षद अशोक पंडित कहते हैं कि मतदाता सूची से आधार को लिंक करना ही विकल्प है। एक बार राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चला कर ऐसा करने के बाद से काफी कुछ सही हो जाएगा।

अशोक ने बताया कि कैंट विधानसभा के भेलूपुर इलाके में ही सैकड़ों लोग ऐसे रहे जिन्होंने दिसंबर में अपना नाम दर्ज कराने के लिए फार्म भरा लेकिन उनका नाम मतदाता सूची में दर्ज नहीं हो सका। पास में खड़े कल्लू प्रजापति का कहना था कि एक दो नहीं कई स्तर पर गड़बड़ी थी। अब एक ही परिवार के कई-कई सदस्यों के अलग-अलग बूथ ही नहीं केंद्रों की सूची में जोड़ दिया गया था। यहीं सीएम एंग्लो बंगाली इंटर कॉलेज केंद्र पर शाम करीब 5.50 बजे तीन महिलाएं पहुंचीं वो बंगाली टोला इंटर कॉलेज, नगर निगम से होते हुए यहां आई थीं, कारण बीएलओ लगातार उन्हें दौड़ाती रहीं। अंत में एंग्लोबंगाली इंटर कॉलेज की मतदाता सूची में उनका नाम निकाल कर अंतिम समय में मतदान कराया गया।

कमच्छा निवासी विशेष भट्टाचार्या का कहना है कि वह करीब 30 साल से मतदान कर रहे हैं, उनके पूरे परिवार का नाम मतदाता सूची में रहा है। 2017 के विधानसभा और नगर निकाय के लिए हुए मतदान में मत डाला था पर अबकी बार नाम नहीं था। बूथ पर जा कर पता चला कि नाम नहीं है।
टेढी नीम निवासी विश्वनाथ दुबे का कहना है कि हर चुनाव के लिए अलग-अलग मतदाता सूची का होना भी गड़बड़ है। पूरे देश में हर चुनाव के लिए एक ही मतदाता सूची होनी चाहिए। अब कुछ लोग यह मान कर शांत बैठे रहते हैं कि निकाय चुनाव में तो मेरा नाम था वोटर लिस्ट में। वो लोकसभा के लिए होने वाले चुनाव के लिए प्रयास ही नहीं करते। ऐसे में एक वोटर लिस्ट हो और आधार से उसे जोड़ा जाए।

विश्वनाथ गली निवासी श्री कृष्ण शर्मा ने बताया कि विश्वनाथ सनातन धर्म कॉलेज के बूथ पर 5000 वोटर है। लेकिन इसमें से 2600 वोटरों का नाम ही इस बार नहीं था। ये सभी लोग मतदान केंद्र तक पहुंच कर निराश लौटे। ये सभी 2017 के विधानसभा चुनाव में वोट दिए थे। नगर निगम के चुनाव में भी मताधिकार का प्रयोग किया था।

जिला कांग्रेस अध्यक्ष प्रजानाथ शर्मा ने कहा कि आधार से मतदाता सूची को जोड़ने की पहल तो यूपीए सरकार ने ही की थी, लेकिन तब तक सरकार ही चली गई। निश्चित तौर पर अगर मतदाता सूची सही होती तो वोटिंग परसेंटेज घटने की बजाय जरूर बढता। हजारों लोग वोट नहीं दे पाए।

समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष डॉ पीय़ूष यादव का भी कहना है कि गर्मी का कोई फर्क नहीं पड़ा, मतदाता सूची सही होती तो मत प्रतिशत नहीं घटता।

जिला प्रचार समिति के प्रभारी अनिल श्रीवास्तव 'अन्नू' मतदान प्रतिशत बढ़ाने और फर्जी मतदान लोकने के लिए के लिए आवश्यक है कि मतदाता सूची एक हो और वह आधार से जुड़ा हो ,एैसा होने पर मत प्रतिशत में बढ़ोत्तरी भी होगी और लोगों का विश्वास मतदान के प्रति बढ़ेगा तब लोकतंत्र मजबूत होगा।

बता दें कि इस बार बनारस में पिछली बार की तुलना में डेढ़ फीसदी कम वोटिंग हुई है। 2014 में जहां 58.25 फीसद मत पड़े थे वहीं इस बार 56.97 फीसद ही मत पड़े हैं। जिला निर्वाचन विभाग की ओर से जारी संशोधित आंकड़ों के अनुसार वाराणसी के कुल 18 लाख चार हजार 635 मतदाताओं में से 10 लाख 28 हजार, 61 मतदाताओं ने ही मतदाधिकार का प्रयोग किया है।

 

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