फूलपुर-गोरखपुर उपचुनाव: कम वोटिंग के बाद अब सियासी पंडितों के दावे से बढ़ी बीजेपी की टेंशन

फूलपुर और गोरखपुर का उपचुनाव जहां बीजेपी के लिये नाक का सवाल है तो वहीं सपा-बसपा गठबंधन के लिये संजीवनी जैसा।

इलाहाबाद/गोरखपुर. पूरे प्रयास के बावजूद फूलपुर और गोरखपर उपचुनाव के लिये डाले गए वोटों का प्रतिशत काफी कम रहने से बीजेपी की चिंता बढ़ गयी है। जहां गोरखपुर सीट पर 49 प्रतिशत तो फूलपुर में महज 38 परसेंट ही वोटिंग हुई। जो गोरखपुर में करीब पांच से आठ प्रतिशत जबकि फूलपुर में 15 फीसद कम रही। ऐसा कहा जा रहा है कि कम वोटिंग से बीजेपी का समीकरण बिगड़ सकता है और उसे नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। दोनों ही सीटें भाजपा के पास ही थीं और CM योगी आदित्यनाथ और डिप्टी CM केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे के बाद खाली हुई थीं।

 

रविवार को शांतिपूर्ण संपन्न हुए लोकसभा उपचुनाव में कम वोटिंग ने सियासी सरगर्मी बढ़ा दी है। सियासी पंडितों की मानें तो इतने कम मतदान से हार जीत के बीच का फर्क काफी कम होगा। स्थिति ऐसी बन गयी है कि किसी की जीत हार का सही अंदाजा लगा पाना मुश्किल हो रहा है। यहां ये याद रखने की जरूरत है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में फूलपुर में 52 प्रतिशत से अधिक वोटिंग हुई थी। मोदी लहर के चलते अकेले बीजेपी को 32 प्रतिशत वोट मिले थे। सपा और बसपा ने मिलकर भी उतना वोट नहीं पाया था जितना अकेले बीजेपी को मिला था। आज के यूपी के डिप्टी सीएम केशव मौर्य ने पांच लाख से अधिक वोट पाकर बीजेपी को पहली बार इस सीट से जीत दिलायी थी। इस सीट पर 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों में भी बम्पर वोटिंग हुई, जिसके चलते बीजेपी जीत गई।

 

इसी तरह गोरखपुर तो बीजेपी का गढ़ रहा है। यहां से यूपी के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पांच बार सांसद रहे और हर बार उनकी जीत के वोटों का अंतर बढ़ता ही रहा। 2014 लोकसभा चुनाव में यहां भी वोटिंग 50 से 60 प्रतिशत के बीच ही थी। 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी बम्पर वोटिंग ने भाजपा को फायदा दिलाया। यहां तक कि मेयर के चुनाव में शहरी इलाके में 33 प्रतिशत वोटों पर ही लीड कर लिया। उपचुनाव में बीजेपी का गढ़ माने जाने वाले शहरी इलाके में वोटिंग 37 प्रतिशत हुई है, जिससे बीजेपी थोड़ा राहत महसूस कर रही है। सूत्र बताते हैं कि खुद CM योगी ने मतदान के पहले कार्यकर्ताओं को शहरी इलाके में कम से कम 60 प्रतिशत तक वोटिंग कराने के लिये जी जान से लगने का निर्देश दिया था।

 

बात करें मतदान फूलपुर और गोरखपुर के एक्जिट पोल की तो अभी तक कोई ऐसा आंकड़ा नहीं आ सका है कि जिससे किसी पार्टी को जीतता हुआ दिखाया जा सके। हालांकि फूलपुर संसदीय सीट पर मुस्लिम बाहुल और सपा के दावे वाले इलाकों में बेहतर वोटिंग से बीजेपी मुश्किल में दिखायी दे रही है। यहां सपा और बीजेपी दोनों ने पटेल प्रत्याशी पर दांव खेला है। सपा ने नागेन्द्र सिंह पटेल को तो बीजेपी ने वाराणसी के पूर्व मेयर कौशलेन्द्र सिंह पटेल को मैदान में उतारा है। इससे पटेल वोटों में बंटवारा तय कहा जा रहा है। जातीय समीकरण की बात करें तो पिछड़े वोर्टस की तादाद सबसे ज्यादा करीब साढ़े सात लाख हैं, जबकि दलित वोटों का आंकड़ा साढ़े पांच लाख के करीब है। यहां मुस्लिम वोटरों की संख्या दो लाख 25 हजार हैं जबकि यादव मतदाताओं की संख्या एक लाख 76 हजार है। डेढ़ लाख ब्राम्हण वोटर हैं। कुल मिलाकर साढ़े चार लाख के करीब अगड़ी जाति के वोटर हैं। चुनाव से पहले बसपा के समर्थन से सपा को फायदा मिला है। पर बाहुबली अतीक अहमद के मैदान में आ आने के चलते मुस्लिम वोटों के बंटने के चलते बीजेपी कुछ राहत महसूस कर रही है। हालांकि मुस्लिम वोटों की अच्छी तदाद सपा के पक्ष में दिखी, जिससे मुकाबला कड़ा होने की उम्मीद है।

 

उधर गोरखपुर में उपेन्द्र दत्त शुक्ल भले ही सीएम योगी के आदमी न हों पर केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री शिव प्रताप शुक्ल के करीबी हैं जिन के नजदीकी बाहुबली हरिशंकर तिवारी का परिवार है। इसके चलते तिवारी परिवार उपेन्द्र दत्त के खिलाफ नहीं निकला। वोटिंग प्रतिशत के चलते भी बीजेपी को यहां राहत है। हालांकि निषाद पार्टी, पीस पार्टी के समर्थन से सपा यहां कड़ी टक्कर दे रही है। सपा लगातार जीत का दावा कर रही है, पर राजनीतिक पंडित दावा न कर सिर्फ इतना ही कह रहे हैं कि जीत हार का अंतर काफी कम होगा।

 

फूलपुर और गोरखपुर का उपचुनाव जहां भाजपा के लिये नाक का सवाल है और सीएम योगी आदित्यनाथ व उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की परीक्षा है तो यह सपा बसपा गठबंधन का लिटमस टेस्ट भी है। इस उपचुनाव का रिजल्ट 2019 के लिये सियासत के नए समीकरण पैदा करेगा। यदि गठबंधन बेहतर प्रदर्शन कर जाता है तो 2019 के लोगसभा चुनाव में बीजेपी के लिये मुसीबत का कारण बन सकता है।

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रफतउद्दीन फरीद
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