यह यूपी की सियासत के बदलाव का संकेत है

Akhilesh Tripathi

Publish: Mar, 14 2018 07:02:31 PM (IST) | Updated: Mar, 15 2018 11:06:16 AM (IST)

Varanasi, Uttar Pradesh, India
यह यूपी की सियासत के बदलाव का संकेत है

सपा-बसपा की जोड़ी ने सारे सियासी दावों को किया ध्वस्त, 2019 के लिए महागठबंधन की आहट

अभिषेक श्रीवास्तव
वाराणसी. 1992 यूपी की राजनीति के लिए वह दौर था, जब सत्ता राष्ट्रीय पार्टी के हाथ से छिटककर क्षेत्रीय दल की राजनीति की शुरूआत करने वाले मुलायम सिंह यादव के पास जाने को बेताब थी। मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी का गठन किया और 1993 में बसपा से गठबंधन किया। रामलहर के बावजूद तब सपा ने 260 सीटों पर चुनाव लड़कर 109 और बसपा ने 163 में से 67 पर जीत दर्ज की थी। लेकिन यह सियासी गठबंधन 2 जून 1993 को गेस्ट हाउस कांड की भेंट चढ़ गया। इसका सबसे अधिक फायदा भाजपा को हुआ। फिर 2018 का ये दौर, जब एक बार फिर सपा और बसपा अप्रत्यक्ष तौर पर साथ खड़ी नजर आ रही हैं, इसका सीधा असर वोटों के ध्रुवीकरण के रूप में दिखा। इस अप्रत्यक्ष गठबंधन का असर ऐसा हुआ कि विश्व की सबसे बड़ी पार्टी का दावा करने वाली भाजपा अपने मु यमंत्री और उप मु यमंत्री की सीटिंग सीट भी गंवा बैठी। उपचुनावों में भाजपा को सपा ने 2-0 से मात दे दी।

 

दरअसल, मोदी मैजिक ने यूपी में क्षेत्रीय दलों की सियासत को नकार दिया था। पहले 2014 और फिर 2017 विधानसभा चुनाव। भगवा लहर में सपा के साथ ही बसपा की हालत खराब हो गई। बसपा का कोई भी सांसद लोकसभा में नहीं पहुंचा था और सपा सिर्फ परिवार की पांच सीटें ही बचा पाई थी। भाजपा के मकडज़ाल से निकलने के लिए अखिलेश यादव ने पहले हाथ पकड़ा, लेकिन यह प्रयोग सफल नहीं हो पाया। फिर अंतत: अपने धुर विरोधी कहे जाने वाली बसपा से समर्थन मांगा। बसपा से बढ़ी नजदीकियों ने उपचुनावों में भाजपा के वोटों के गणित को फेल कर दिया। एक बार फिर राजनीति सोशल इंजीनियरिंग के फार्मुेले की ओर जाती दिखी।

 

2019 में होगा महागठबंधन
उपचुनावों में सपा की जीत के साथ ही तय हो गया कि यूपी में सपा-बसपा और राष्ट्रीय लोकदल के बीच गठबंधन होगा। अगर ऐसा होता है तो 2019 में यूपी का रिजल्ट काफी बदला हुआ दिखेगा। इस गठबंधन से अगर सबसे अधिक नुकसान किसी को हुआ है तो वह है कांग्रेस। उप चुनाव में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने इस गंठबंधन के अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर दिया था। ऐसे में सपा-बसपा और रालोद की तिकड़ी को चौकड़ी बनाने के लिए कांग्रेस को काफी मानमनौव्वल करनी होगी।

 

योगी और केशव पर उठेंगे सवाल
जिस तरह अति उत्साह के कारण भाजपा को हार का सामना करना पड़ा उसका सीधा असर योगी और केशव प्रसाद पर पड़ेगा। गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ तो फूलपुर से डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या सांसद थे। इन दोनों के बीच चल रही खींचतान से सभी वाकिफ हैं। ऐसे में कार्यकर्ता दबी जुबान यह सवाल उठाने लगे हैं।

 

वोटों का ध्रुवीकरण
सपा-बसपा गठबंधन में सबसे अहम रहा बसपा के वोटों का ध्रुवीकरण। चुनाव बसपा की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका था। इसलिए बसपा ने अपने वोटर को बूथों तक भेजा और उसे सपा को वोट करने के लिए प्रेरित किया।

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