#Akhirkyun बनारसी ताने-बाने के पीछे का ये दर्द आपको रुला देगा

कम हो रही बनारसी साड़ी की चमक के पीछे की सच्चाई। वो जो बनारस की जिंदादिली का अहम हिस्सा थे आज बदहाली की चक्की में पिस रहे हैं।

मो. रफत फरीदी

वाराणसी. हिन्दुस्तान में बनारसी साड़ियां एक फैशन नहीं परम्परा हैं। भारतीय शादी में बनारसी साड़ी ने सदियों से एक रस्म की हैसियत बना रखी है। बनारसी साड़ियों का रुतबा सदियों से रहा है। ये एक रेशमी रिश्ते की तरह हैं जो बनारस के घरों में बुना जाता है। पर उनका क्या जो ये रिश्ते बुनते हैं। किस हाल में हैं वो बुनकर। एक जमाना था जब बनारस की हर गली से करघे की आवाज आती थी। बनारसी साड़ी के कारोबार में लगे लोगों की जिंदगी आसानी से कटती थी। कारोबार भी ठीक था और धंधे में खुशहाली भी थी। वो जो कभी खुशहाल थे आज बदहाल हैं। वो जो बनारस की जिंदादिली का अहम हिस्सा थे आज बदहाली की चक्की में पिस रहे हैं। जिनकी बुनी हुई रेशमी साड़ी का पल्लू नवविवाहिता की लाज बनता है आज उन बुनकरों के लिये दो वक्त की रोटी सबसे बड़ी समस्या है।




सरकारों ने जब से बुनकारी के विकास पर काम करना शुरू किया यह कारोबार और बदहाल होता चला गया। आज यह बदहाली उस स्तर तक पहुंच चुकी है कि बुनकर खुदकुशी जैसा कदम उठाने में हिचकते नहीं। अपनी चुनावी सभाओं से लेकर पीएम बनने के बाद तक पीएम नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह बुनकरों की बदहाली दूर करने की बात कही, उससे एक उम्मीद तो जगी पर दो साल होने के बाद भी बुनकर बदहाल हैं और समस्याएं बढ़ती ही जा रही हैं।




खुद कपड़ा मंत्रालय के सर्वेक्षण में यह बात सामने आ चुकी है कि बनारस में बुनकरों की स्थिति बेहद खराब है। बुनकरों के नाम पर बुनकर क्रेडिट कार्ड, बीमा योजना, इलाज समेत योजनाएं तो तमाम हैं पर उनका लाभ नहीं मिल पा रहा है। इतना ही नहीं उनका जीवन स्तर भी बेहद निम्न स्तर का है। सामाजिक सुरक्षा के नाम पर उनके पास कुछ नहीं है। बस्तियां बदहाल हैं, बजबजाती नालियां और सड़कों पर बहता सीवर का पानी इनकी पहचान बन चुकी है। बजरडीहा, सरैयां, कोनिया अश्फाक नगर और लोहता की बस्तियां इसकी जीती जागती मिसाल हैं। बस्तियों में बिजली, पानी और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं।




बनारस में बुनकरों की तादाद तकरीबन चार लाख के पार है। बावजूद इसेक बनारस का बुनकर उद्योग तकरीबन एक हजार करोड़ से अधिक का है। पर इससे होने वाले फायदे में आम बुनकरों का हिस्सा बेहद मामूली है। इतना जिससे कि उन्हें घर चलाना भी मुश्किल होता है। बुनकरों की भलाई के लिये काम करने वाले बनारसी साड़ी के कारोबारी हाजी जुबैर एनएसपी कहते हैं कि सरकारें बुनकरों की भलाई क लिये कहती हैं और योजनाएं भी बनाती हैं, पर उनपर अमल नहीं हो पाता। पैसे जारी होते हैं लेकिन बुनकरों तक पहुंच नहीं पाते हैं।





लालपुर में सरकार बुनकरों और हस्तशिल्पियों के लिये ट्रेड फैसिलिटी सेंटर बनवा रही है। अब देखना यह होगा कि इसका बुनकरों को क्या फायदा मिलता है, क्योंकि जब तक नकली धागे, पावरलूम पर बनने वाली नकली सस्ती बनारसी साड़ी जैसी परेशानियों से बनारस का बुनकर जूझता रहेगा उसकी परेशानी खत्म नहीं हो सकती। पहले भी बुनकरों के लिये मार्केट, डिपो वगैरह बनाने की बातें हुईं पर आज तक वो जमीन पर नहीं उतर पाया।




सरकारी नीतियां और पावरलूम ने दिया दर्द
बुनकरों की मानें तो एक समय था जब उन्हें किसी मदद की जरूरत नहीं थी। उन्हें काम का पूरी कीमत मिलती थी। पर तब इस पर सरकारों की नजर लगी और ऐसी लगी कि ये दरख्त जो कभी हराभरा था आज तकरीबन सूख चुका है। बुनकरों की मानें तो उनकी बदहाली की वजह सरकारों के गलत फैसले रहे, जिस पर पावरलूम ने और बड़ा दर्द दिया। पावरलूम के आने के बाद करघे पर काम करने वाले बुनकर और बदहाल हुए। लूम पर हूबहू बनारसी साड़ी की नकल महज चंद सौ रुपयों में तैयार होने लगी, जबकि वैसी ही असली बनारसी साड़ी करघे पर बुनने में उसकी दस गुनी लागत आती।




लल्लापुरा के बुनकर इदरीस अंसारी कहते हैं कि 1989 के दो फैसलों ने बुनकरों को बदहाली के कगार पर पहुंचा दिया। पहला था पावरलूम के इस्तेमाल की इजाजत और दूसरी थी यूपी और यूपिका हैण्डलूम के जरिये बुनकरों का तैयार माल लेना बंद करना। इसके पक्ष में दलील दी गई कि सरकार को रद्दी माल बेचा जा रहा है। बुनकर वजीउद्दी अंसारी कहते हैं कि कुछ लोग गलत हो सकते हैं पर सब नहीं। सरकार ने निगरानी के बजाय सीधे बुनकरों के लिये संजीवनी बने यूपी और यूपिका हैण्डलूम को माल बेचने की सुविधा ही खत्म कर दी। उधर जकार्ट के इस्तेमाल से पावरलूम पर भी वह डिजाइन्स बनने लगीं जो केवल करघे पर ही बनती थीं। इससे करघे खामोश होते गए।
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