तुरुप के इक्के ने बढ़ा रखी है सियासी दलों के दिल की धड़कन 

तुरुप के इक्के ने बढ़ा रखी है सियासी दलों के दिल की धड़कन 
akhielsh yadav

अखिलेश के एक बयान से पार्टी के भीतर और बाहर हलचल 

वाराणसी. मानव का स्वभाव है कि जब उसके सामने कोई सवाल आता है तो जब तक वह उसका जवाब नहीं खोज लेता दिल-दिमाग परेशान रहता है। कुछ ऐसा ही हाल उत्तर प्रदेश के चुनावी संग्राम में विजय पताका फहराने के उद्देश्य से रणभूमि में उतरे राजनीतिक दलों का है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के एक बयान ने विरोधी समेत सपा के दिलों की धड़कन बढ़ा रखी है। हर दिन हर पल अखिलेश यादव की गतिविधियों पर समाचार पत्रों-टीवी चैनलों के माध्यम से नजर रखी जा रही है। उनकी हर बात के मायने निकाले जा रहे हैं लेकिन फिलहाल किसी को कोई जवाब नहीं मिल रहा और टेंशन लगातार घड़ी की सूई की तरह बढ़ती जा रही है। 

राजनीतिक गलियारों में एक हवा तेजी से फैल रही है कि अखिलेश उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव की घोषणा से पहले ही इस्तीफा दे सकते हैं। अखिलेश अपने इस्तीफे का आधार चुनाव में टिकट बांटने के अधिकार से वंचित रखने, गुंडे-माफिया को टिकट देने की बात सामने रख सकते हैं। वजह एक यह भी है कि अब तक सपा ने यह घोषणा नहीं की है कि यदि प्रदेश में सपा की सरकार दोबारा आती है तो मुख्यमंत्री अखिलेश ही होंगे। अखिलेश को भी अपने चाचा की ख्वाहिश का अच्छे से पता है। ऐसे में अखिलेश ने यदि इस्तीफे के रूप में तुरुप का पत्ता फेंका तो निश्चित ही सपा के लिए बहुत बड़ा झटका होगा। ऐसे में अखिलेश की छवि ईमानदार और स्वच्छ के रूप में निखर जाएगी। ऐसे में सपा के सामने के दो विकल्प होंगे या तो वह अखिलेश को अगला मुख्यमंत्री घोषित करके चुनाव लड़े या फिर उन टिकटों पर दोबारा मंथन करे जिनपर अखिलेश को कड़ा एतराज है। 

दरअसल, लोक भवन के उद्घाटन समारोह के दौरान सपा प्रदेश अध्यक्ष व चाचा शिवपाल यादव से मनमुटाव के बीच समर्थकों के टिकट कटने, बर्खास्त लोगों की बहाली के मुद्दे पर जब सवाल हुआ तब अखिलेश यादव ने कहा था कि परिवार में कोई झगड़ा नहीं है, समय आने दिजीए सब पता चल जाएगा। मैं ताश नहीं शतरंज खेलता हूं लेकिन मेरे पास भी तुरुप का इक्का है जिसे समय आने पर वह दिखाएंगे। 

प्रदेश में सपा सरकार के मुखिया अखिलेश यादव के इस बयान से राजनीतिक गलियारों में तो बेचैनी बढ़ी ही, पार्टी और परिवार के लोगों के दिलों की धड़कन भी बढ़ गई। लोग अखिलेश के बयान के निहितार्थ निकालने लगे। अखिलेश तो अपने काम में लग गए लेकिन विरोधी बाल की खाल निकालने में जुट गए। 

गौरतलब है कि पार्टी में अमर सिंह की वापसी, कौएद के विलय को लेकर अखिलेश ने कुछ ऐसे तेवर दिखाए कि पार्टी के भीतर ही घमासान मच गया क्योंकि यह दोनों मामले सीधे शिवपाल यादव से जुड़े थे। मुख्यमंत्री न बनने की टीस पहले ही थी शिवपाल को लेकिन जब अखिलेश ने उनके मामलों में अपनी राय जाहिर की तब से तुफान उठ गया और फिर अचानक गायत्री प्रजापति समेत अन्य मंत्रियों की बर्खास्तगी ने आग में घी डालने का काम कर दिया। 

मुलायम ने अपना कुनबा बचाने के लिए अखिलेश से सपा प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी छीन कर भाई शिवपाल को थमा दी। शिवपाल ने कमान हाथ आते ही अखिलेश के समर्थकों पर चाबुक चलाना शुरू कर दिया जिससे अखिलेश की नाराजगी स्वाभाविक थी और इस बात को उन्होंने मीडिया के सामने बेहिचक रखा। खैर, परिवार में मचे घमासान किसी तरह सार्वजनिक मंच पर न दिखे। इस कोशिश में अखिलेश ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन मुलायम और शिवपाल यादव ने जिस तरह से अखिलेश को दरकिनार करने की कोशिश की उससे अखिलेश की छवि और ताकतवर बनकर निखरी जिसका भान मुलायम सिंह यादव व शिवपाल को नहीं थी। 


जब से अखिलेश ने तुरुप के इक्के वाली बात कही है तब से शिवपाल यादव व मुलायम सिंह यादव के चेहरे पर भी शिकन आ गई है। अखिलेश के नए घर की पूजा के दौरान की जो तस्वीरें सामने आई उसमें साफ मुलायम और शिवपाल की टेंशन दिख रही थी। 
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