इतना उन्मादी क्यों हो गया राहुल सांकृत्यायन और कैफी का शहर आजमगढ़

   इतना उन्मादी क्यों हो गया राहुल सांकृत्यायन और कैफी का शहर आजमगढ़

साहित्य, कला और बनारसी साड़ी के लिए कभी देश ही नहीं दुनिया में जिसकी तूती बोलती थी। जिले की पहचान मुनि दत्तात्रेय की तपोभूमि के साथ ही राहुल सांकृत्यायन और कैफी आजमी के शहर के रूप में होती थी, लेकिन वक्त के साथ सबकुछ बदला नजर आता है।

आजमगढ़ से अभिषेक श्रीवास्तव

बनारस से महज 100 किलोमीटर दूर एक जीवंत शहर। साहित्य, कला और बनारसी साड़ी के लिए कभी देश ही नहीं दुनिया में जिसकी तूती बोलती थी। जिले की पहचान मुनि दत्तात्रेय की तपोभूमि के साथ ही राहुल सांकृत्यायन और कैफी आजमी के शहर के रूप में होती थी, लेकिन वक्त के साथ सबकुछ बदला नजर आता है। चुनाव के समय में जब दूसरे शहरों में हर नुक्कड़ चौराहे पर राजनीतिक दलों और विकास की चर्चा होती है, तब इस जीवंत शहर का चौक बाजार धर्म, जाति और ध्रुवीकरण की ओर सिमटता दिख रहा है। बाजार लगभग दो भागों में बंट चुका है। यहां घरों के बाहर लगे केसरिया झंडे कुछ और कहानी कहते हैं तो दूसरी ओर के बाजार में सिर्फ धर्म की बात होती है।


Azamgarh



आजमगढ़ का चौक बाजार

लोगों को विकास तो चाहिए, लेकिन वह धर्म और जाति से ऊपर नजर नहीं आता। जिले की 10 विधानसभा सीटों में 9 पर सपा का कब्जा है। एक सीट बसपा की झोली में है। भाजपा यहां खाता खोलने के लिए तडफ़ड़ा रही है। इसबार उसने ओबीसी और कट्टरता को हथियार बनाया है, जिसमें उसे कुछ हद तक सफलता मिलती दिख रही है। 


दरअसल, जब इस शहर को हमने बारीकी से समझने का प्रयास किया तो एक बात तो नजर आई कि सत्ता के साथ हमेशा खड़ा रहने वाले इस जिले को हमेशा उपेक्षा का सामना करना पड़ा। मुबारकपुर का ताना-बाना हो या फिर दत्तात्रेय की तपोभूमि सभी को नुमाइंदों से आस थी, लेकिन मिला तो सिर्फ आश्वासन। फिर भी जाति और धर्म का जंजाल इस कदर से लोगों को जकड़ा हुआ है कि वह इसके आगे अपनी विकास की टीस को तिलांजली दे देते हैं। कहते हैं अगर यादव हैं तो अखिलेश के साथ ही जाएंगे। मुस्लिम हैं तो पहले मुस्लिम प्रत्याशी देखेंगे उसके बाद पार्टी। न अखिलेश से परहेज है और न ही माया से, बस जीतना चाहिए अपने समाज का प्रत्याशी। यानी यहां बड़े-बड़े वायदे किसी काम के नहीं। एक बार फिर वोटर धनबल और बाहुबल की ही हां में हां मिलाता दिख रहा है। कुल मिलाकर इस शहर पर अब उन बातों की भी पीड़ा नहीं दिख रही, जो उसे अक्सर सुर्खियों में लाते हैं। राजनीतिक दलों ने जरूर साम्प्रदायिक बयान देकर लोगों के बीच पैदा हुए नफरत के बीज को एक पेड़ के रूप का आकार दे दिया है।



अब बात करते हैं यहां के सियासी हालात के
दरअसल, आजमगढ़ की 10 की 10 विधानसभा सीट जातीय और धर्म के बंधन में उलझी हुई हैं। एक बात तो तय है कि यह चुनाव सपा गठबंधन के लिए उतना रास नहीं आने वाला जितना 2007 में था। सपा के कई मंत्री अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए जीजान से जुटे हुए हैं। चाहे वह मंत्री बलराम यादव के बेटे की सीट हो या फिर दुर्गा प्रसाद यादव की खुद की सीट। कारण साफ है ध्रुवीकरण के माहौल ने सभी के माथे पर पसीना ला दिया है। भाजपा के बाहुबली नेता और चार बार के सांसद रमाकांत भी अपने बेटे की सीट के लिए पसीना बहाते दिख रहे हैं। लोगों के दिमाग में मोदी मैजिक भी है तो अखिलेश के काम बोलता है का नारा भी गूंज रहा है। शहर में आज भी एटीएम में लोगों की लाइन लगी हुई है, लेकिन नोटबंदी कोई मुद्दा नहीं। सिर्फ एक वर्ग और एक जाति को छोड़ दें तो लोगों का कहना है कि पहली बार किसी नेता ने बड़ा निर्णय लिया। अब बैंक के अधिकारियों ने ही धोखा दे दिया तो वह क्या कर सकता है। यानी भाजपा ने यहां एक बड़े तपके पर यह छाप छोड़ दी है कि नोटबंदी के कारण अगर बड़ी समस्या पैदा हुई तो उसके पीछे बैंक ही कारक हैं। ऐसे में यह मुद्दा हवा होता दिख रहा है। उधर, बसपा के साथ मुस्लिमों का एक बड़ा हिस्सा खड़ा हो रहा है, जो कुछ और ही कहानी कहता दिख रहा। यानी कुल मिलाकर आजमगढ़ इस बार एक नया सियासी समीकरण लिखने वाला है धर्म के नाम पर जाति के नाम पर और ध्रुवीकरण के उद्देश्य से। अहम यह कि यहां हर सीट पर तीनों बड़ी पार्टियां मजबूती से खड़ी हैं। अब गेंद ओबीसी मतदाताओं के पाले में है, जिन्हें उनका मत मिलता है, वह ही सत्ता के संग्राम में विजेता बनेंगे।


अब बात कुछ हटकर

Rajiv Singh
राजीव सिंह

आजमगढ़ शहर में एक शख्स आपको हमेशा हाथों में तख्तियां लेकर दिख जाएगा। कहने को प्रशासन ने इसे पागल करार दे दिया है। पहले एक स्कूल के प्रबंधक रहे इस शख्स की खासियत है कि यह दुकानदारों से एक-एक रुपए चंदा लेकर एक तख्ती तैयार करता है। यह तख्ती हमेशा सरकार पर कटाक्ष करती है और गंभीर सवाल उठाती है। राजीव सिंह नाम के इस व्यक्ति की पहचान ही यह बन चुकी है। कभी भी किसी मंत्री, डीएम के कार्यक्रम में पहुंचकर पूछ देता है कि आखिर कितने रुपए इसमें कमीशन मिले और फिर मिलती है उसे पिटाई। 



एक तस्वीर यह भी

Azamgarh
बांस से बना पुल
आजमगढ़ की एक विधानसभा सीट है निजामाबाद। यहीं पड़ती है मुनि दत्तात्रेय की तपोस्थली। कहने को इसका अगर विकास हो जाए तो देश ही नहीं विदेश से भी पर्यटक आने लगेंगे। आपको हैरानी होगी कि दत्तात्रेय की तपोस्थली के ठीक सामने एक नदी गुजरती है। नदी के उस पार दर्जनों गांव हैं, लेकिन धर्म और जाति अलग होने के कारण अबतक पुल नहीं बन पाया। लोगों ने बांस के सहारे एक अस्थाई पुल बना रखा है, जो बरसात में डूब जाता है। फिर इस पार आने के लिए एक मात्र सहारा बनता है नाव। सपा विधायक आलमबदी के क्षेत्र में आने वाले इस स्थल की समस्या का संज्ञान एक मुस्लिम ने लिया और वह अब लोगों से चंदा लेकर पुल का निर्माण करा रहा है। हालांकि आर्थिक तंगी के कारण काम अभी बंद है। इस पुल का खर्च 11 करोड़ रुपए बताया जा रहा है।



जिक्र एक प्रेम कहानी की
आजमगढ़ में नगर सेठ जमुना प्रसाद अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे। पत्नी ने उनसे फिल्म दिखाने को कहा तो उन्होंने शहर के बीचोबीच 1950 में डिलाइट सिनेमा हाल खड़ा कर दिया। अब भले ही यह थियेटर खंडहर बन चुका है, लेकिन जमुना प्रसाद के प्रेम को दर्शाता है।



बात आजमगढ़ जिले की सामाजिक स्थिति की
2011 की जनगणना के अनुसार जिले की आबादी लगभग 47 लाख है। 32 लाख वोटर यहां प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करेंगे। इसमें 18 प्रतिशत मुस्लिम हैं तो 22 फीसदी यादव और उतने ही दलित। लगभग 24 फीसदी ओबीसी हैं और 8 प्रतिशत सवर्ण।

(21 फरवरी 2017 को  आजमगढ़ घूमने के दौरान जैसा लगा।)
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