बनारस बीजेपी में सुलग रही बगावत की चिंगारी

बनारस बीजेपी में सुलग रही बगावत की चिंगारी
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परिवारवाद में फंसी दो सीट, जानिए कौन है वह दो उत्तराधिकारी जिनको लेकर पार्टी में मचा है घमासान

विकास बागी

वाराणसी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में बीजेपी के अंदर बगावत के स्वर फूटने लगे हैं। कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाने वाली बीजेपी भी परिवारवाद की आग में झुलस रही है। वाराणसी के आठ विस सीटों में से दो सीटों को लेकर बीजेपी में सबसे अधिक घमासान है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह अपने बेटे का राजनीतिक करियर संवारने के लिए बनारस की सबसे सुरक्षित सीट माने जाने वाले विस क्षेत्र सेे टिकट दिलाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हैं। दूसरी ओर एक और सीट परिवारवाद में फंसी है। मां के बाद अब बेटा अपने पिता अपने पिता की विरासत संभालने को तैयारी कर रहे हैं लेकिन पार्टी के अन्य नेता अब उस सीट को परिवार की बेड़ी से निकालने के लिए जोर आजमाइश कर रहे हैं। 

शहर की तीन सीटों को लेकर छिड़ा है संग्राम
वाराणसी की आठ विस सीटों में से शहर के तीन उत्तरी, दक्षिणी और कैंट विस क्षेत्र की सीट को लेकर बीजेपी में सबसे अधिक सिर फुटव्वल मची है। वजह भी बड़ी है क्योंकि बीजेपी के लिए सबसे सुरक्षित सीट दक्षिणी और कैंट विस सीट रही है। दक्षिणी में विधायक श्यामदेव राय चौधरी मजबूती से भगवा झंडा लेकर खड़े हैं तो कैंट की सीट विधायक ज्योत्सना श्रीवास्तव के परिवार के पास लंबे समय से है। बदले परिसीमन के बाद से बीजेपी के लिए अब उत्तरी विधानसभा सीट भी सुरक्षित मानी जाने लगी है।

उत्तरी पर गृहमंत्री की नजर
बीजेपी के अंदखाने की खबर है कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह अपने बेटे पंकज के लिए उत्तरी विस सीट का टिकट मांग रहे हैं। वर्तमान में इस सीट से भाजपा के रवींद्र जायसवाल विधायक हैं। उधर इसी खेमे के माने जाने वाले भाजपा नेता और बाहुबली एमएलसी बृजेश सिंह के भतीजे विधायक सुशील सिंह भी 2017 में इस सीट से चुनाव लडऩे के लिए जोर लगा रहे हैं। यदि पंकज का नाम फाइनल होता है तो सुशील अपने वर्तमान सीट से ही दोबारा चुनाव लड़ेंगे। पंकज व सुशील का नाम उत्तरी के लिए चर्चा में चलने से रवींद्र जायसवाल खेमे को तगड़ा झटका लगा है क्योंकि रवींद्र जायसवाल ने बीते पांच सालों में अपने विधानसभा क्षेत्र में पार्टी का झंडा मजबूती से लहराया है। हालांकि पार्टी सूत्रों के अनुसार उत्तरी में यदि शीर्ष नेता किसी खास को उतारती है तो रवींद्र कैंट विस क्षेत्र जाने को तैयार हैं लेकिन उस सीट पर पहले से ही दावेदारों की लंबी लिस्ट के साथ परिवारवाद फंसा है। 

कैंट और कायस्थ समीकरण 
भाजपा की विधायक ज्योत्सना श्रीवास्तव की बढ़ती उम्र के कारण पार्टी इस बार उन्हें विधानसभा भेजने के मूड में नहीं है। विधायक के पुत्र सौरभ श्रीवास्तव मां के स्थान पर अपने पार्टी से टिकट मांग रहे हैं। दूसरी ओर इस सीट पर कई और उम्मीदवार इस आशा के साथ देख रहे है कि पार्टी परिवारवाद को बढ़ावा नहीं देगी और उनकी राह आसान होगी। हालांकि जातिगत समीकरण को ध्यान में रखते हुए कैंट विस सीट से सपा ने अपना प्रत्याशी मैदान में उतार दिया है। भाजपा अभी कांग्रेस के पत्ते खोलने का इंतजार कर रही है। सूत्रों के अनुसार कैंट विस सीट से यदि कांग्रेस ने अनिल श्रीवास्तव को टिकट थमा दिया तब सौरभ के लिए इस सीट से टिकट पाना कठिन हो जाएगा। तीनों पार्टियों से एक ही जाति के उम्मीदवार चुनाव मैदान में होंगे तो वोट का बिखराव तय है ऐसे में भाजपा किसी अन्य बिरादरी को आगे ला सकती है। बीजेपी के सूत्र बताते हैं कि उत्तरी के विधायक रवींद्र जायसवाल कैंट से लडऩे की इच्छा जता चुके हैं। दूसरी ओर मीना चौबे, अशोक तिवारी, सौरभ श्रीवास्तव समेत कई भाजपा नेता कैंट के लिए अपने स्तर की तैयारी में जुटे हैं। 

दक्षिणी में दादा करेंगे बगावत
पार्टी में लगातार हो रही उपेक्षा ने दक्षिणी विधानसभा क्षेत्र के कद्दावर भाजपा नेता श्यामदेव राय चौधरी को बगावत करने पर मजबूर कर दिया है। अंदरखाने की खबर है कि टिकट न मिलने पर दादा बीजेपी के बागी प्रत्याशी के रूप में चुनावी जंग में कूदेंगे। दरअसल, कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा में शामिल हुए दयाशंकर मिश्र दयालु को पार्टी के कुछ पदाधिकारी लगातार आगे करते हुए दक्षिणी की ओर से मजबूत दावेदार के रूप में पेश कर रहे हैं जिससे दादा के समर्थकों में खासा रोष है। बढ़ती उम्र व नए कलेवर के अनुरुप खुद को न ढाल पाने के कारण दादा उपेक्षा का शिकार होते गए। वर्तमान में दक्षिणी विधानसभा सीट के लिए कुछ लोग दयालु को प्रमोट कर रहे तो एक धड़ा गुलशन कपूर के नाम को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। गुलशन को गंगा किनारे के वाशिंदों का खासा समर्थन है, दूसरी ओर टीम मोदी में भी गुलशन की खासी पकड़ है। 

उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचने के लिए मौजूदा जनप्रतिनिधि से लेकर पार्टी में उभरे तमाम भाजपा नेता टिकट के लिए साम-दाम-दंड-भेद की रणनीति अपना रहे हैं। भाजपा ने यदि वाराणसी की इन तीन सीटों को लेकर जारी घमासान को शांत नहीं कराया तो आगामी चुनाव में पार्टी को खासा नुकसान उठाना पड़ सकता है।  
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