पूर्वांचल की इन सीटों के बंटवारे को लेकर सपा-बसपा में हो सकता है घमासान

ज्यादातर सीटों पर दोनों का रहा है वर्चस्व। जानिए कहां कहां से किसका होगा प्रबल दावा...

By: Ajay Chaturvedi

Published: 25 Apr 2018, 04:03 PM IST

वाराणसी. आगामी लोकसभा चुनाव 2019 समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी मिल कर लड़ेंगे, यह तो तय माना जा रहा है। लेकिन सीटों का बंटवारा कैसे होगा वह भी पूर्वांचल में। दोनों दलों के शीर्ष नेताओं के लिए यह बड़ी चुनौती होगी। आसान नहीं होगा कार्यकर्ताओं को संभाल पाना। अगर असंतोष बढ़ा तो यूपी विधानसभा चुनाव के पहले के हालात पैदा होने के खतरे की आशंका से नहीं बच सकते हैं दोनों दल। कारण साफ है, बसपा को राष्ट्रीय दल की मान्यता भले मिली हो पर सपा हो या बसपा दोनों ही दलों के कार्यकर्ताओं के नस-नस में क्षेत्रीयता कूट-कूट कर भरी है। दोनों को ही क्षेत्रीय पार्टी के रूप में ही देखा जाता है। दोनों का जनाधार पूर्वांचल में जबरदस्त है। ऐसे में सीटों का बंटवारा आसान नहीं होगा। अगर इन पार्टियों में भगदड़ नहीं भी मची तो भी भितरघात की आशंका से पूरी तरह इंकार भी नहीं किया जा सकता।


खास तौर से अगर बात करें पूर्वांचल के 21 जिलों की तो इसमें करीब आधा दर्जन से ज्यादा सीटें ऐसी हैं जहां दोनों का वर्चस्व है। कभी सपा का सांसद रहा तो कभी बसपा का। ऐसे में दोनों ही दल अपना-अपना दावा मजबूती के साथ पेश करेंगे। दोनों ही चाहेंगे कि सीट उन्हें ही मिले। अब अगर शुरूआत इलाहाबाद के फूलपुर से ही की जाए तो वह सीट फिलहाल उपचुननाव के बाद सपा (नागेंद्र सिंह पटेल) के खाते में है, लेकिन 2009 की बात करें तो यह सीट बसपा के कब्जे में थी, तब कपिल मुनी यहां से बसपा के टिकट पर विजयी हुए थे। इस स्थिति में बहुत पीछे न भी जाएं तो 2019 में यह सीट किसे जाएगी यह तय कर पाना आसान नहीं होगा। भदोही की बात करें तो 2009 में यह सीट बसपा के कब्जे में थी, तब गोरखनाथ बसपा के टिकट पर विजयी हुए थे। वहीं बात करें सपा की तो जाहिद बेग का रसूख भी यहां कम नहीं है। वैसे ही राबर्ट्सगंज सुरक्षित सीट पर बसपा के जितेंद्र एडवोकेट और सपा के अविनाश कुशवाहा दावेदार होंगे। सुरक्षित सीट होने के नाते बसपा का पलड़ा भारी पड़ेगा। वहीं जौनपुर की बात करें तो 2009 में बाहुबली धनंजय सिंह यहां से बसपा के टिकट पर विजयी हुए थे लेकिन कालांतर में उन पर लगे यौन शोषण के मामले के बाद मायावती ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब जौनपुर से अशोक सिंह तो सपा से पारस नाथ ? यादव दावेदार हैं। दोनों की अच्छी पकड़ बताई जा रही है।


वहीं अगर बात की जाए चंदौली की तो इस सीट पर सपा का कब्जा रहा है। 2009 में रामकिशुन यादव यहां के सांसद चुने गए थे। वहीं अब विनीत सिंह की दावेदारी भी काफी मजबूत है। ऐसे में बसपा इस सीट पर भी दावा पेश कर सकती है। उधर मिर्जापुर से सपा के बाल कुमार पटेल और बसपा के नरेंद्र कुशवाहा को लेकर दोनों दलों के बीच टसल रहेगी। बनारस की ही बात करें तो यहां कांग्रेस, सपा और बसपा तीनों ही बराबर-बराबर रूप से अपनी-अपनी मजबूत दावेदारी पेश करेंगे। 2004 में यह सीट कांग्रेस के पास थी तो 2009 में कांग्रेस चौथे नंबर पर आ गई थी, तब सपा तीसरे नंबर पर थी। 2014 की बात करें तो नरेंद्र मोदी के खिलाफ आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयजोक अरविंद केजरीवाल दूसरे, कांग्रेस के अजय राय तीसरे, बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी विजय प्रकाश जायसवाल चौथे और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी कैलाश चौरसिया पांचवें स्थान पर रहे। ऐसे में यहां कांग्रेस और बसपा के बीच टसल होगी।

2009 में पूर्वांचल की इन सीटों पर सपा-बसपा के सांसद
बसपा
-फूलपुर कपिल मुनी कर्वरिया
-जौनपुर धनंजय सिंह
-भदोही गोरखनाथ


सपा
-चंदौली- रामकिशुन यादव
-मिर्जापुर बाल कुमार पटेल

 

Ajay Chaturvedi
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