30 साल बाद शरद पूर्णिमा पर बन रहा यह अद्भुत संयोग, बन रहा महालक्ष्मी का योग

30 साल बाद शरद पूर्णिमा पर बन रहा यह अद्भुत संयोग, बन रहा महालक्ष्मी का योग
Sharad Purnima

Sarweshwari Mishra | Updated: 12 Oct 2019, 01:52:09 PM (IST) Varanasi, Varanasi, Uttar Pradesh, India

अश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है

वाराणसी. पूर्णिमा तिथि हिंदू धर्म में एक खास स्थान रखती है। प्रत्येक मास की पूर्णिमा का अपना अलग महत्व होता है। लेकिन कुछ पूर्णिमा बहुत ही श्रेष्ठ मानी जाती हैं। अश्विन माह की पूर्णिमा उन्हीं में से एक है बल्कि इसे सर्वोत्तम कहा जाता है। अश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। इस पूर्णिमा पर रात्रि में जागरण करने व रात भर चांदनी रात में रखी खीर को सुबह भोग लगाने का विशेष रूप से महत्व है। इसलिये इसे कोजागर पूर्णिमा भी कहते हैं। ज्योतिष अतुल शास्त्री के अनुसार इस साल शरद पूर्णिमा पर्व पर शुभ संयोग बन रहा है। ज्योतिषाचार्य अतुल शास्त्री के अनुसार 13 अक्टूबर रविवार को शरद पूर्णिमा पर 30 साल बाद दुर्लभ योग बन रहा है। यह शुभ योग चंद्रमा और मंगल के आपस में दृष्टि संबंध होने से बन रहा है। जिसे महालक्ष्मी योग कहा जाता है। इस शुभ योग के बनने से शरद पूर्णिमा का पर्व और ज्यादा विशेष हो जाएगा। शरद पूर्णिमा का व्रत अश्विन माह की पूर्णिमा को रखा जाता है।

जानिए शरद पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त
शरद पूर्णिमा तिथि- रविवार, 13 अक्‍टूबर 2019
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ- 13 अक्‍टूबर 2019 की रात 12 बजकर 36 मिनट से
पूर्णिमा तिथि समाप्‍त- 14 अक्‍टूबर की रात 02 बजकर 38 मिनट तक
चंद्रोदय का समय- 13 अक्‍टूबर 2019 की शाम 05 बजकर 26 मिनट
कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात में मां लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर सवार होती हैं और पृथ्वीलोक का भ्रमण करती हैं। इस दौरान मां लक्ष्मी यह देखती है कि कौनसा भक्त रात्रि में जागकर उनकी पूजा अर्जना कर रहा है। मां लक्ष्मी उस पर अपनी कृपा बरसाती हैं। इस शरद पूर्णिमा पर महालक्ष्मी योग में देवी की पूजा करने का सौभाग्य 30 साल बाद मिल रहा है। शरद पूर्णिमा पर रविवार को चंद्रमा से अमृत बरसेगा। पूर्णिमा और उत्तराभाद्र पद नक्षत्र के संयोग विशेष फलदायी होंगे। घरों में पूजा होगी। छत पर रात भर खीर रखकर सुबह प्रसाद बांटा जाएगा। शरद पूर्णिमा के साथ दिवाली की धूम मच जाएगी।

शरद पूर्णिमा व्रत की कथा

शरद पूर्णिमा की पौराणिक कथा भगवान श्री कृष्ण द्वारा गोपियों संग महारास रचाने से तो जुड़ी ही है लेकिन इसके महत्व को बताती एक अन्य कथा भी मिलती है जो इस प्रकार है। मान्यतानुसार बहुत समय पहले एक नगर में एक साहुकार रहता था। उसकी दो पुत्रियां थी। दोनों पुत्री पूर्णिमा को उपवास रखती लेकिन छोटी पुत्री हमेशा उस उपवास को अधूरा रखती और दूसरी हमेशा पूरी लगन और श्रद्धा के साथ पूरे व्रत का पालन करती। समयोपरांत दोनों का विवाह हुआ। विवाह के पश्चात बड़ी जो कि पूरी आस्था से उपवास रखती ने बहुत ही सुंदर और स्वस्थ संतान को जन्म दिया जबकि छोटी पुत्री के संतान की बात या तो सिरे नहीं चढ़ती या फिर संतान जन्मी तो वह जीवित नहीं रहती। वह काफी परेशान रहने लगी। उसके साथ-साथ उसके पति भी परेशान रहते। उन्होंने ब्राह्मणों को बुलाकर उसकी कुंडली दिखाई और जानना चाहा कि आखिर उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है। विद्वान पंडितों ने बताया कि इसने पूर्णिमा के अधूरे व्रत किये हैं इसलिये इसके साथ ऐसा हो रहा है। तब ब्राह्मणों ने उसे व्रत की विधि बताई व अश्विन मास की पूर्णिमा का उपवास रखने का सुझाव दिया। इस बार उसने विधिपूर्वक व्रत रखा लेकिन इस बार संतान जन्म के पश्चात कुछ दिनों तक ही जीवित रही। उसने मृत शीशु को पीढ़े पर लिटाकर उस पर कपड़ा रख दिया और अपनी बहन को बुला लाई बैठने के लिये उसने वही पीढ़ा उसे दे दिया। बड़ी बहन पीढ़े पर बैठने ही वाली थी उसके कपड़े के छूते ही बच्चे के रोने की आवाज़ आने लगी। उसकी बड़ी बहन को बहुत आश्चर्य हुआ और कहा कि तू अपनी ही संतान को मारने का दोष मुझ पर लगाना चाहती थी। अगर इसे कुछ हो जाता तो। तब छोटी ने कहा कि यह तो पहले से मरा हुआ था आपके प्रताप से ही यह जीवित हुआ है। बस फिर क्या था। पूर्णिमा व्रत की शक्ति का महत्व पूरे नगर में फैल गया और नगर में विधि विधान से हर कोई यह उपवास रखे इसकी राजकीय घोषणा करवाई गई।

शरद पूर्णिमा व्रत व पूजा विधि
पूर्णिमा ही नहीं किसी भी उपवास या पूजा का लिये सबसे पहले तो आपकी श्रद्धा का होना अति आवश्यक है। सच्चे मन से पूर्णिमा के दिन स्नानादि के पश्चात तांबे अथवा मिट्टी के कलश की स्थापना कर उसे वस्त्र से ढ़कें। तत्पश्चात इस पर माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें। यदि आप समर्थ हैं तो स्वर्णमयी प्रतिमा भी रख सकते हैं। सांयकाल में चंद्रोदय के समय सामर्थ्य अनुसार ही सोने, चांदी या मिट्टी से बने घी के दिये जलायें। 100 दिये जलायें तो बहुत ही उपयुक्त होगा। प्रसाद के लिये घी युक्त खीर बना लें। चांद की चांदनी में इसे रखें। लगभग तीन घंटे के पश्चात माता लक्ष्मी को यह खीर अर्पित करें। सर्वप्रथम किसी योग्य ब्राह्मण या फिर किसी जरुरतमंद अथवा घर के बड़े बुजूर्ग को यह खीर प्रसाद रूप में भोजन करायें। भगवान का भजन कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करें। सूर्योदय के समय माता लक्ष्मी की प्रतिमा विद्वान ब्राह्मण को अर्पित करें।

Show More
खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned