शिवसेना की उत्तर प्रदेश में दहाड़ से बेचैन भगवा खेमा

शिवसेना की उत्तर प्रदेश में दहाड़ से बेचैन भगवा खेमा
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रणनीतिकार मान रहे वोटकटुआ, जानिए क्या बन रहे समीकरण

वाराणसी. पत्रिका ने तीन माह पहले ही खुलासा कर दिया था कि शिवसेना उत्तर प्रदेश में बीजेपी की मुश्किलें बढ़ाने आ रही है। शिवसेना दो सौ से अधिक सीटों पर चुनाव लडऩे की तैयारी में है और शंखनाद वाराणसी से होगा। बात सच निकली और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार की अभियान भाजपा सांसद व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से करेंगे। बीते दिनों लखनऊ आए शिवसेना नेता संजय राउत ने भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा था कि शिवसेना उत्तर प्रदेश में चुनाव लडऩे की तैयारी में जुटी है। 

स्थापना की पचासवीं सालगिरह पर शिवसेना ने महाराष्ट्र के बाहर मजबूती से कदम रखने जा रही है और उसे हौसला दिया बीते वर्ष बिहार में हुए विस चुनाव के परिणामों ने जहां शिवसेना का प्रदर्शन काबिले तारीफ था। काबिले तारीफ इसलिए क्योंकि उत्तर भारतीय खासतौर पर बिहारियों को लेकर महाराष्ट्र में शिवसेना ने शुरू से बवाल काटा है यह कहते हुए कि मराठा मानुष का हक मारते हैं बिहारी। इन सबके बावजूद शिवसेना ने बिहार में जिस तरीके से प्रदर्शन किया वह शिवसेना की बढ़ती ताकत का अहसास कराती है। 

शिवसेना की बिहार में स्वीकार्यता के बाद शिवसैनिकों के हौसले बुलंद हैं और अब उत्तर प्रदेश के चुनावी संग्राम में तपिश बढ़ाने की तैयारी में जुटे हैं। शिवसेना के उत्तर प्रदेश में कदम रखने से सबसे अधिक बेचैन बीजेपी है। शिवसेना ने भी साफ कर दिया है कि वह उत्तर प्रदेश में किसी सहयोग के बिना चुनाव लड़ेगी। इशारा महाराष्ट्र में सहयोगी भाजपा पर था। गौरतलब है कि बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा ने महाराष्ट्र में शिवसेना से गठबंधन से इंकार कर दिया था और चुनाव परिणाम में बीजेपी ने बाजी मारी। चुनाव में बीजेपी को फायदा तो शिवसेना को नुकसान हुआ जिसके चलते दोनों दलों के बीच तल्खी बढ़ गई। 

शिवसेना ने उत्तर प्रदेश में अपनी जड़ जमाने के लिए राम मंदिर निर्माण का कार्ड फेंक दिया है। शिवसेना को पता है कि देश में इस समय राष्ट्रभक्ति के साथ ही धर्म से जुडऩे की बयार भी बह रही है। शिवसेना पर घोर हिंदूवादी होने का ठप्पा पहले ही लगा है। उत्तर प्रदेश चुनाव में ताल ठोंकने से पहले ही शिवसेना ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर ले लिया है। 

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे एक तरफ पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए पीएम मोदी को बधाई देते हैं तो दूसरी तरफ राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर पूरी पार्टी को घेरते हैं। उत्तर प्रदेश में जहां बीजेपी सत्ता पाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है, शिवसेना के आने से घबरा गई है क्योंकि दोनों ही दलों का मजबूत आधार हिंदू वोट बैंक है। बीजेपी को मालूम है कि राम मंदिर निर्माण को लेकर कोर्ट में मामला है और ऐसे में अभी इसको लेकर बयानबाजी उचित नहीं। पीएम मोदी के राज में वैसे भी बीजेपी के पुराने मुद्दे पीछे छूट चुके हैं, अब बीजेपी विकास की बात करती है। 


राजनीतिक दलों की गतिविधियों पर नजर रखने वाले रणनीतिकारों का मानना है कि शिवसेना के आने से बीजेपी पर खास असर नहीं पड़ेगा, शिवसेना वोटकटुआ साबित होगी। हालांकि यह बात भी सच है कि शिवसेना के आने से सबसे अधिक नुकसान भी भाजपा को ही होगा क्योंकि वोट कटने की सूरत में पार्टी को अपनी कई सीट से हाथ भी धोना पड़ सकता है। कुछ लोगों का मानना है कि यह एक सोची समझी रणनीति है। 

हैदराबार से सफर शुरू करते हुए महाराष्ट्र में अपनी धमक दिखाने के बाद ओवैसी अब अपनी पार्टी एआइएमआइएम के साथ यूपी में जय भीम-जय मीम के साथ ताल ठोंक रहे हैं। मुस्लिम प्रभावित विस क्षेत्र में ओवैसी की पार्टी जिस तेजी से बढ़त बना रही है उससे अन्य दलों में खासी बेचैनी है खासतौर पर कांग्रेस और सपा में। रणनीतिकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में शिवसेना की खास नजर उन विस क्षेत्रों में हैं जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अधिक है। शिवसेना के नाम पर मुस्लिम वोट बैंक एकमुश्त किसी की झोली में गिरेंगे तो गैर मुस्लिम वर्ग भी एकजुट होगा। वोट बैंक की इस राजनीति के खेल में शिवसेना अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी की मदद ही करेगी। हालांकि शिवसेना इससे इत्तेफाक नहीं रखती है। शिवसेना का साफ एजेंडा है कि बीजेपी राम मंदिर निर्माण की तिथि बता दें, हम पार्टी के साथ खड़े हैं। उत्तर प्रदेश में शिवसेना का पहला और आखिरी एजेंडा राम मंदिर निर्माण और हिंदू भाइयों को एकजुट करना है। 

उत्तर प्रदेश के सियासी संग्राम में शिवसेना तीर-कमान लेकर उतर रही है, उसका निशाना कितना फिट बैठेगा यह तो भविष्य के गर्त में है लेकिन फिलहाल तो शिवसेना की यूपी में गर्जना से भगवा ब्रिगेड खासा बेचैन है। सूत्रों के अनुसार पार्टी के आला पदाधिकारी इस कोशिश में जुटे हैं कि बीच का कोई रास्ता निकले जिससे शिवसेना वोट कटुआ नहीं बल्कि सहयोगी के रूप में साथ खड़ी रहे। 
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