मातृ नवमी को गर्भ में मारी गई 5000 बच्चियों का श्राद्ध

सामाजिक संस्था आगमन के संस्थापक सचिव डॉ संतोष ने किया श्राद्ध, अन्नपूर्णा मंदिर के महंत रामेश्वर पुरी ने कहा कन्या भ्रूण हत्या पाप है।

 

By: Ajay Chaturvedi

Published: 14 Sep 2017, 09:27 PM IST

Varanasi, Uttar Pradesh, India

वाराणसी. पितृ पक्ष की नवमी तिथि, यानी मातृ नवमी। यह दिन है कुल विशेष के ज्ञात व अज्ञात महिलाओं के लिए तर्पण किया जाता है। ऐसे ही दिन मोक्ष की नगरी काशी में गंगा के तट पर सामाजिक संस्था आगमन ने 5000 अजन्मी बच्चियों का श्राद्ध कराया। यह श्राद्ध उन बच्चियों के लिए था जिनके गर्भ में आते ही उनके अभिभावकों ने उन्हें मरवा डाला था। ऐसे में आगमन के संस्थापक सचिव डॉ संतोष ओझा ने गर्भ में मारी गई इन बेटियों के मोक्ष की कामना से वैदिक परंपरा के अनुसार श्राद्ध किया। अजन्मी अभागी बेटियों को मोक्ष दिलाने के लिए आगमन सामाजिक संस्था ने ये अनूठी पहल की है। आगमन प्रतिवर्ष पितृ पक्ष की नवमी तिथि को 5000 अजन्मी बेटियों का पुरे सनातन परम्परा और पूरे विधि विधान से श्राद्ध कर्म कर उनके मोक्ष की कामना करता है। वर्षो से बेटी बचाने की अलख जा रही सामाजिक संस्था आगमन के संस्थापक सचिव डॉ संतोष ओझा आगमन परिवार संग एक बार फिर काशी के दशाश्वमेध घाट पर मातृ नवमी के अवसर पर पांच आचार्यों द्वारा पांच अलग अलग वेदियों पर वैदिक रीति रिवाज से 5000 उन बेटियों का श्राद्ध कर्म कर मोक्ष की कामना की। श्राद्ध क्रम की शुरुआत शांति वाचन से हुआ जिसके बाद अलग अलग 5000 अनाम,ज्ञात और अज्ञात बेटियों के पिंड को स्थापित कर विधिपूर्वक आवाहन कर पूजा अर्चन कर उनके मोक्ष की कामना की गई। गंगा की मध्य धारा में पिंड विसर्जन के बाद सभी को जल अर्पित कर तृप्त होने का निवेदन किया गया।

 

आमतौर पर आमजन द्वारा गर्भपात को एक ऑपरेशन माना जाता हैं लेकिन स्वार्थ में डूबे परिजन भूल जाते हैं कि भ्रूण में प्राण-वायु के संचार के बाद किया गया गर्भपात है ह्त्या है जो 90 फीसदी मामले में होता है। साफ़ है कि अधिकांश गर्भपात के नाम पर जीव -हत्या की जा रही हैं। धर्म-ग्रथों के अनुसार में ऐसी मृत्यु में जीव भटकता है जो परिजनों के दुःख का कारण भी बनता है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार किसी जीव के अकाल मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए शास्त्रीय विधि से पूजन -अर्चन (श्राद्ध) करा कर जीव को शांति प्रदान की जा सकती है जिससे उनके परिजनों को अनचाही परेशानियों से राहत मिलती है। सम स्मृति में श्राध्द के पांच प्रकारों का उल्लेख है। नित्य, नैमित्तिक, काम्य,वृध्दि ,श्राध्दौर और पावैण। नैमित्तिक श्राध्द, एक उद्देश्य को लेकर किये जाते हैं। इस अवसर पर अन्नपूर्णा मंदिर के महंथ रामेश्वर पूरी ने कहा कि जीव हत्या सर्वथा अनुचित है और यदि ये भ्रूण के रूप में है तो ये महापाप है। अपने स्वार्थ में परिजन सामाजिक संतुलन को बिगाड़ने पर तुले है परिजनों को ऐसा नहीं करना चाहिए। श्राद्धकर्ता और आगमन सामाजिक संस्था के संस्थापक सचिव डॉ संतोष ओझा ने बताया कि आगमन अपने सामाजिक कर्तव्यों की पूर्ति करते हुए उन अजन्मी बेटियों की आत्मा की शांति के लिएप्रतिवर्ष नैमित्तिक श्राध्द का आयोजन कराती रही है। संस्था का स्पस्ट विचार है कि कोख में मारी गई उन अभागी बेटियों को जीने का अधिकार तो नहीं मिल सका लेकिन उन्हें मोक्ष तो मिलना ही चाहिए।

 

श्राद्धकर्म के आचार्य गंगोत्री सेवा समिति के दिनेश शंकर दुबे के साथ देवेंद्र त्रिपाठी रहे। अतिथि के रूप में अन्नपूर्णा मंदिर के महंथ रामेश्वर पूरी रहे जबकि संस्था के संस्थापक सचिव डॉ संतोष ओझा के अगुआई में हरिकृष्ण प्रेमी, कपिल यादव, राहुल गुप्ता, अभिषेक जायसवाल, आलोक पांडेय, गोपाल शर्मा, दिलीप तिवारी, रजनीश सेठ, शिव कुमार, राजकृष्ण, संजय संजू, संजय पांडेय, जितेंद्र, किरण, दिलीप श्रीवास्तव, राम भरत, राजकुमार, सन्नी कुमार, संतोष, भाणुजा शरण, राहुल सिसोदिया आदि मौजूद रहे।

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