पंचायत चुनाव में भाजपा को उसी के दांव से चित करने की जुगत में विपक्ष

सभी राजनीतिक पार्टियों की इस बार पंचायत चुनाव अपने सिंबल पर लड़ाने की योजना है। हालांकेि सत्ताधारी भाजपा बेहद मजबूत है, बावजूद इसके विपक्ष भाजपा के हथियार से ही उसे पटखनी देने की फिराक में है। फिलहाल पंचायत चुनाव की सरगर्मी जमीन से ज्यादा सोशल मीडिया पर देखने को मिल रही है।

वाराणसी. उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव समय पर होंगे या नहीं अभी यह तय नहीं, न तो कोई अधिसूचना जारी हुई है और न ही इसकी कोई औपचारिक घोषणा की गई है। पर राजनीतिक दल और चुनाव लड़ने को इच्छुक नेता अपनी तैयारियों में जुट गए हैं। गांवों में चुनावी सरगर्मी काफी बढ़ गई है। पर इस बार पंचायत चुनाव भी बदला-बदला सा होगा। इसके संकेत मिलने लगे हैं। पंचायत चुनाव में भी सोशल मीडिया का बड़ा रोल होगा। हालांकि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी इसमें भले ही सबसे मजबूत दिख रही हो, लेकिन विपक्षी पार्टियां और नेतागण भी कम नहीं। विपक्ष बीजेपी को ग्रास रूट के इस चुनाव में उसी के हथियार से पटखनी देने की योजना पर काम कर रहा है। बताते चलें कि सभी पार्टियां इस बार पंचायत चुनाव अपने सिंबल पर लड़ाने जा रही हैं। इसके चलते इसे 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव का ट्रेलर कहा जा रहा है।

 

 

  • यूपी में 59 हजार 163 ग्राम पंचायतें
  • 25 दिसम्बर को समाप्त हो रहा प्रधानों का कार्यकाल
  • 13 जनवरी 2021 को जिला पंचायत का कार्यकाल होगा समाप्त
  • 17 मार्च को क्षेत्र पंचायतों का पूरा होगा कार्यकाल
  • पंचायत चुनाव कराने के लिये चुनाव आयोग को चाहिये छह माह का समय

 

कोरोना काल में सोशल मीडिया बना सहारा

कोरोना काल में मिलने-जुलने और भीड़ जुटाने से संक्रमण का खतरा है। लेकिन सोशल मीडिया ने काफी हद तक इस मुश्किल को आसान कर दिया है। नेता अपने वोटरों के मोबाइल तक पहुंच बना रहे हैं ताकि उनकी गोटी सेट हो सके। धड़ाधड़ भावी प्रत्याशियों और वर्तमान प्रधानों आदि के पोस्टर, वीडियो और मैसेज व्हाट्सऐप ग्रूपों व सोशल मीडिया के जरिये लोगों तक पहुंच रहे हैं। गांव के विकास और चट्टी चौपाल पर होनेे वाली बहसें अब व्हाट्सऐप जैसे मैसेंजिंग ग्रूपों पर शुरू हो गई हैं।

 

नेता जी लाइक करा रहे पेज, नंबर मांगकर जोड़ रहे ग्रूप में

चुनाव में जितनी जरूरी वोटर लिस्ट होती थी, आज तकरीबन उतनी ही अहमियत गांव वालों के मोबाइल नंबर की हो गई है। पंचायत चुनाव लड़ने के लिये पिछली वोटर लिस्ट के आधार पर नंबर जुटाए जा रहे हैं। मऊ के पवन सिंह बताते हैं कि गांव में प्रधानों और भावी प्रत्याशियों के ग्रूप बन चुके हैं और उनमें वोटरों को जोड़ा जा रहा है। हालांके वोटर नेता जी की बातों से कितना प्रभावित होते हैं यह तो आने वाला समय बताएगा, लेकिन फिलहाल चुनाव लड़ने की जुगत में नेता जी इसके जरिये ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचाना चाहते हैं।

 

आजमायी जा रही हैं तरह-तरह की तरकीबें

गांव का विकास करने का दम भरने वाले भावी प्रत्याशी कोरोना काल में इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिये तरह-तरह की तरकीबें अपना प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। ग्राम प्रधान, मिशन ग्राम प्रधान, ग्राम प्रधान प्रत्याशी, युवा ग्राम प्रधान प्रत्याशी जैसे फेसबुक पेज और ऐसे ही नामों के व्हाट्सऐप ग्रूप बनाकर बने हैं। इनपर मुख्यमंत्री से लेकर सांसद, विधायक के साथ अपने पोस्टर और फोटो पोस्ट किये जा रहे हैं। प्रोफाइल पिक्चर पर भी नेता जी हाथ जोड़े या नेतागिरी वाले तेवर में दिख रहे हैं, या फिर फोटो की जगह अपना पोस्टर ही लगा रखा है। गाजीपुर के प्रधान संघ अध्यक्ष भयंकर सिंह यादव, मतसा गांव के रजनीश, रसूलपुर बेलवां के कमलेश, मझुईं के पप्पू सिंह समेत प्रधान व भावी प्रत्याशियों का कहना है कि कोरोना काल में सोशल मीडिया उनके लिये गांव के वोटरों से अपनी बात कहने का बेहतर जरिया है। गांव के विकास को लेकर ऑनलाइन डिबेट भी हो जाती है और लोगों तक अपनी बात पहुचाना भी आसान है।

 

UP Panchayat Election

 

पोस्टर से लेकर पोस्ट तक की जिम्मेदारी

ग्रामीण स्तर पर चुनावों पर नजर रखने वाली संस्था सोशल विजन के संजय श्रीवास्तव बताते हैं कि प्रधानी के चुनाव में युवाओं को पोस्टर, वीडियो और नेताजी का सोशल अकाउंटर संभालने जैसे काम मिल रहे हैं। उनका काम रोजाना क्रिएटिव पोस्ट और पोस्टर व वीडियो पोस्ट करना है। व्यक्तिगत काम करने वाले युवा फोटो और वीडियो आदि बनाने के लिये कमाई कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि एक पोस्टर बनाने पर करीब 100 से 200 रुपये का खर्च आ जाता है। कई युवा और इस तरह का काम करने वालों ने इसके लिये बाकायदा 2000 से 3000 रुपये का महीने भर का पैकेज भी देने जैसी बातें सामने आई हैं।

 

प्रधान जी बनवा रहे विकास कार्य का वीडियो

सोशल विजन के संजय श्रीवास्तव ने बताया कि कई वर्तमान प्रधान चाहते हैं कि अपने कार्यकाल में किये गए विकास कार्यों का डाॅक्यूमेंटरी स्टाइल वीडियो बनवाकर उसे सोशल मीडिया में डालकर लोगों को बताया जाय कि प्रधान रहते उन्होंने क्या-क्या किया। डाॅक्यूमेंट्री वीडियो का खर्च प्रोफेशनल कंपनी 15 से 20 हजार रुपये चार्ज करती है। हालांकि गांव में कुछ प्रधान अपने युवा समर्थकों और खुद भी विकास कार्यों का वीडियो मोबाइल ऐप्स के माध्यम से बनाकर प्रचार कर रहे हैं।

 

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रफतउद्दीन फरीद
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