scriptSupreme Court advocate Prashant Bhushan raised many questions on current state of Indian democracy | भारतीय लोकतंत्र के मौजूदा हालत पर SC के अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने खड़े किए कई सवाल, JP आंदोलन से पूर्व से भी बदतर हालात | Patrika News

भारतीय लोकतंत्र के मौजूदा हालत पर SC के अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने खड़े किए कई सवाल, JP आंदोलन से पूर्व से भी बदतर हालात

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने वाराणसी में मौजूदा भारती लोकतंत्र पर कई सवाल खड़े किए हैं। उनहोंने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र व राज्य सरकारों पर भी निशाना साधा है। उन्होंने यहां तक कहा कि सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी खड़ी की जा रही है जिसके जवाब में ट्रुथ आर्मी खड़ी करना वक्त का तकाजा है।

वाराणसी

Published: August 13, 2022 07:23:13 pm

वाराणसी. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण आज शनिवार को बनारस में थे। मीडिया से अनौपचारिक वार्ता में उन्होंने मौजूदा भारतीय लोकतंत्र पर कई सवाल खड़े किए। इस दौरान न्यायपालिका पर भी सवाल किए। साथ ही कहा कि सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी खड़ी की जा रही है। इसके जवाब में ट्रुथ आर्मी खड़ी करना वक्त का तकाजा है। देश के इन हालातों से जूझने के लिए आंदोलन की जरूरत है। आज बेरोजगारी के मुद्दे पर देश के अधिकाधिक लोग जुड़ सकते हैं।
राष्ट्र निर्माण समागम को संबोधित करते प्रशांत भूषण
राष्ट्र निर्माण समागम को संबोधित करते प्रशांत भूषण
जेपी मूवमेंट के वक्त से भी ज्यादा बिगड़ गए हैं हालात

आजादी के अमृत महोत्सव पर राजघाट स्थित सर्व सेवा संघ में संघर्ष वाहिनी समन्वय समिति की ओर से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्र निर्माण समागम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जेपी (जय प्रकाश नारायण) को जिन हालात में संपूर्ण क्रांति का बिगुल फूंकना पड़ा था, वर्तमान माहौल उससे कहीं ज्यादा बद से बदतर हो चुके हैं। पिछले आठ सालों मे देश को रसातल में पहुंचा दिया गया है। वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। एक तो इस देश में RSS की सांप्रदायिक और दकियानूसी विचारधारा का प्रसार हुआ है। दूसरे वर्तमान केंद्रीय सरकार के दो प्रमुख चेहरे अपने एजेंडे को RSS की मूल विचारधारा से भी आगे और अधिक पतन की ओर ले गए हैं।
इन चार मसलों पर आमजन को करना होगा सवाल

वरिष्ठ अधिवक्ता ने जनता को चार बिंदुओं पर काम करने की सलाह दी। इसके तहत रोजगार के कानूनी अधिकार, देश में सभी सरकारी रिक्तियों को 6 महीने में विश्वसनीय तरीके से भरने, निजीकरण की प्रक्रिया तत्काल प्रभाव से रोकने और ठेके पर नौकरियों की व्यवस्था खत्म करने की मांग उठाने का आह्वान किया।
स्वायत्तशासी और संवैधानिक संस्थाओं को बचाने की जरूरत

इन्होंने देश की न्यायपालिका, चुनाव आयोग, सीबीआई और ईडी जैसी संवैधानिक संस्थाओं को सत्ताधारी दल से मुक्त कराने की वकालत की। साथ ही विश्वविद्यालयों को भी बचाने की मांग उठाई।
अब हिंदू होने का नशाः प्रो आनंद कुमार

इस मौके पर प्रख्यात समाजशास्त्री प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में नागरिकों को गलती करने का हक है। लेकिन इन दिनं देश में हिंदू होने का नशा पैदा हो गया है। कुछ दशक पहले देश ने सिख होने का नशा भी देखा था। कहा कि देश 1947-48 के दौर में इस देश ने मुसलमान होने के नशे को भुगत चुका है। हालांकि देश ने पूर्व में भी निरंकुश सत्ता की बरगदी जड़ों को उखाड़ फेंका है।
काशीवासियों पर देश के लोकतंत्र को बचाने की बड़ी जिम्मेदारी

कहा कि आज तो हमारी लड़ाई ऐसे लोगों से है, जिनकी जड़ें बेहद कमजोर हैं। इसमें उत्तर प्रदेश और खासकर बनारस के लोगों की बड़ी जिम्मेदारी बनती है, जिन्होंने बुलडोजर की गलत संस्कृति को गले लगाया है। उन्होंने कहा कि आज इस समागम से तीन सवालों के जवाब देश के लोगों को जरूर मिलने चाहिए। पहला, देश बचाओ और भाजपा हराओ नारे का मतलब क्या है? दूसरा, भाजपा को हटाना क्यों जरूरी है? तीसरा, यह काम करने की रणनीति क्या होगी?
लोकतंत्र को बचाना है तो पूरे देश को एकजुट होना होगाः मार्डी

इस मौके पर कुमार चंद्र मार्डी ने कहा कि जिस तरह भूमि अधिग्रहण कानून-2013 को कमजोर करने के प्रयास में सरकार को बार-बार असफल होना पड़ा। उसी तरह कार्पोरेट्स के साथ मिलकर आदिवासियों जमीन पर प्रोजेक्ट्स शुरू करने के अनेक प्रयास भी धराशायी हुए। आदिवासियों ने पूरी मजबूती संग सरकार की मंशा पूरी नहीं होने दी। इसी तरह पूरे देश को इकट्ठा होना होगा, वरना लोकतंत्र नहीं बचेगा।
लोकतंत्र की वर्तमान परिस्थिति में सामूहिक प्रयास की जरूरतः अमरनाथ भाई

सर्वोदय नेता अमरनाथ भाई का कहना था कि देश जिन परिस्थितियों से गुजर रहा है, ऐसे में इस तरह के सामूहिक प्रयासों और जुटानों का तांता लगना चाहिए। समाज के बीच यह संदेश जाना अति आवश्यक हो गया है कि लोकतंत्र को इस तरह खत्म होते हम नहीं देख सकते। जनता के बीच जनता की बात पहुंचाने के काम को अब मिशन बनाया जाना चाहिए।
शब्दों के घालमेल से रहना होगा सतर्कः रामचंद्र राही

केंद्रीय गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष रामचंद्र राही का कहना था कि देश की मौजूदा स्थिति में शब्दों के घालमेल पर सतर्क रहना होगा। तानाशाही और फासिज्म के बीच अंतर करना जरूरी ही नहीं अनिवार्य हो गया है। यदि हम इतिहास के पन्ने ही पलटते रहे तो इतिहास के खंडहरों में गुम हो जाएंगे। पूर्व संसद सदस्य डीपी राय ने कहा कि धर्म, भाषा, बोली, संस्कृति सब भिन्न होते हुए भी देश की यह खूबसूरती है कि हम संकट के समय एक हो जाते हैं।

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