यूपी की जेलों में सुलग रही आग, जेल की दीवारों के पीछे हो रहे बवाल के पीछे का सच जानकर हैरान रह जाएंगे आप

यूपी की जेलों में सुलग रही आग, जेल की दीवारों के पीछे हो रहे बवाल के पीछे का सच जानकर हैरान रह जाएंगे आप
varanasi district jail

बनारस की जिला जेल में एक लाख रुपये रोजाना होती है कमाई, रुपये देने से इंकार पर काला पानी से बद्तर सजा 

विकास बागी

वाराणसी. देवरिया जेल में मंगलवार को बंदी रक्षकों के बीच मारपीट के बाद बंदियों द्वारा जमकर बवाल किया गया। कुछ दिनों पहले दो अप्रैल को बनारस की जिला जेल में भी बंदियों द्वारा जमकर बवाल किया गया था। जेल अधीक्षक को बंदी बनाने के साथ ही उनको पीटकर अधमरा कर दिया। बंदियों ने जेलर को भी जमकर पीटा था। कमोवेश बनारस समेत प्रदेश की सभी जेलों में क्षमता से दो गुना से भी अधिक बंदी हैं। सुख-सुविधाओं से वंचित बंदियों पर बंदीरक्षकों से लेकर आला अधिकारियों तक का कहर बंदियों के भीतर दबे गुस्से को हवा देता है। जब पानी सिर से ऊपर चला जाता है तब जेल की दीवारों से गुस्सा फूट पड़ता है। वाराणसी हो या देवरिया की जेल, यूपी की सभी जेलों की दीवार के पीछे बंदियों के बीच गुस्से की चिंगारी दबी है जो कभी भी विकराल रूप ले सकती है। जेल के पीछे सुलग रही इस चिंगारी के पीछे का सच हैरान कर देने वाला है। वाराणसी की जिला जेल में हुए बवाल के दौरान जेल में बंद एक बंदी बीते दिनों जेल से बाहर छूटा। उसकी मुलाकात कुछ मीडियाकर्मियों से हुई। जमानत पर रिहा उस बंदी ने जेल की चहारदीवारी के पीछे की कहानी सुनाई उसे सुनकर साधारण इंसान के रोंगटे खड़े हो जाएंगे। जेल में जिंदा रहने के लिए कदम-कदम पर रुपये देने पड़ते हैं।

बैरक नंबर दस सेे प्रताडऩा का शुरू होता है दौर
बातचीत में उस बंदी ने जेल के भीतर होने वाली प्रताडऩा का सिलसिलेवार ब्यौरा दिया। बताया कि कोर्ट में पेश होने के बाद जब कोई बंदी पहली बार जेल में प्रवेश करता है तो उसे सबसे पहले बैरक नंबर दस में रखा जाता है। यहां से शुरू होता है रुपयों का खेल। हैसियत के हिसाब से जेलकर्मियों की जेब गरम करने वाले को अन्य बैरकों में स्थानांतरित किया जाता है। जिनके पास जेलकर्मियों को देने के लिए रुपये नहीं होते उनसे जेलकर्मी शौचालय की साफ-सफाई से लेकर झाड़ू-पोछा का काम कराते हैं। यह सिर्फ बनारस की जेल का हाल नहीं वरन यूपी की सभी जेलों का है। बस, बैरकों के नंबर बदल जाते हैं, व्यवस्था वहीं रहती है।

पशु भी न खाए खाना पर रोज आता है मीट-मुर्गा
वाराणसी की जिला जेल में जेल प्रशासन की ओर से जो भोजन तैयार कराया जाता है उसे पशु भी खाने से इंकार कर दे। दाल में पानी या पानी में दाल पता ही नहीं चलता है। जेलकर्मी सिर्फ कमाई के चक्कर में बंदियों को इतना खराब खाना खिलाते हैं कि बयां नहीं कर सकता। दूसरी तरफ जेल में बाहर से तो तरह-तरह के व्यंजन आते ही हैं, जेल के एक हिस्से में भी मीट-मुर्गा पकता है। यह खानपान उन बंदियों के लिए जो रुपये-पैसे से मजबूत रहते हैं। जेलकर्मी यह सुविधा मुहैया कराने के लिए ताकतवर बंदियों से रुपये ऐंठते हैं। चाय का हाल तो पूछिए मत, बाजार में दो रुपये की मिलने वाली चाय भी जेल की पंद्रह रुपये की चाय से लाख गुना बेहतर होती है। 

मुलाकात के नाम पर होती है वसूली
जेल में आप बंद है और परिजन या यार-मित्र मुलाकात करने आए तो जेलकर्मियों को रुपये लेना ही लेना है। एक मुलाकात पर कम से कम दो सौ रुपये जेलकर्मी वसूल करते हैं। मुलाकातियों ने अगर रुपये देने से इंकार कर दिया तो अगली बार जेलकर्मी यह कहकर उन्हें भगा देते हैं कि बंदी ने मुलाकात से इंकार कर दिया है। परिवार वाले स्वयं को कोसते हैं कि उनकी किसी गलती के कारण मुलाकात करने से इंकार कर रहा है लेकिन सच्चाई कुछ और होती है।
 
बंदीरक्षक ढाते हैं जुल्म  
जेल प्रशासन वसूली व प्रताडऩा कि लिए बंदीरक्षकों का सहारा लेते हैं। पुराने हो चुके बंदीरक्षक जेल अधिकारियों के कहने पर इस कदर जुल्म ढाते हैं कि अंग्रेजों के भी पसीने छूट जाएं। बनारस की जेल में रहकर आए बंदी ने बताया कि उसे कई बार बंदीरक्षकों ने फिल्मी स्टाईल में पानी में डूबो-डूबोकर मारा। बनारस में जेल के भीतर बवाल के पीछे की वजह वसूली, प्रताडऩा और खराब भोजन था। बंदीरक्षकों द्वारा की गई मारपीट के चलते ही वाराणसी के जिला जेल में बवाल शुरू हुआ क्योंकि बंदीरक्षक व राइटर आए दिन बिना बात के कुछ बंदियों को पीट रहे थे।

एक लाख रुपये रोजाना कमाई
बंदी ने दावा किया कि वाराणसी की जिला जेल में बंद बंदियों के माध्यम से जेल प्रशासन रोजाना एक लाख रुपये तक की कमाई करता है। बनारस की जेल में मोबाइल का प्रयोग नहीं होता अन्यथा जेल प्रशासन की कमाई और बढ़ जाती है। बंदी ने दावा किया किया कि प्रदेश की जिस जेल में चाहिए आप वहां के बंदी से मोबाइल पर बातचीत कर सकते हैं। 

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