मिर्जापुर की मंजरी बोली मेरे प्राण, शक्ति तुम्हारी देखना चाहेंगे पाषाण 

मिर्जापुर की  मंजरी बोली मेरे प्राण ,शक्ति तुम्हारी देखना चाहेंगे पाषाण 

आवेश तिवारी 
वाराणसी। वह सावन का ही महीना था जब बलिया जिले के गौरा निवासी वीर लौरिक का डोला अपने घर से लगभग 200 किमी दूर सोनभद्र के अगोरी स्टेट में रहने वाली मंजरी के किले तक जा पहुंचा था मंजरी कई रातों तक सो न सकी थी जब एक ब्याह में लोरिक ने उसे प्रेम प्रस्ताव दिया था और उसे अपने हाथ की अंगूठी उतार कर पहना दी थी । वो दिन और वो घनघोर बरसार की रात ,उसके ख्यालों में केवल लोरिक का मासूम चेहरा और बलशाली भुजाएं दिखाई देती थी।

दरअसल मंजरी अगोरी के रहने वाले मेहर नाम के ही एक अहीर की बेटी थी,मंजरी के कई नाम थे  प्रियाल मंजरी ,मैनावती ,मृणाल मंजरी। मंजरी पर अगोरी के राजा मोलाभागत की निगाह थी। कहा जाता है  राजामोलाभगत बेहद अत्याचारी थी।उसे जब मेहर को अपनी बेटी के प्यार का पता चला, तो वह भयभीत हो गया क्यूंकि उसे मोलाभागत के मंसूबों का पता था। मेहर को जब लोरिक और मंजरी के प्यार का पता चला उसने लोरिक से तुरंत संपर्क किया और मंजरी से तत्काल ब्याह करने को कहा।

अजब प्रेम की ग़जब कहानी 
माँ काली के भक्त लोरिक की शक्ति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनकी तलवार 85 मन की थी। युद्ध में वे अकेले हज़ारो के बराबर थे। लोरिक को पता था कि बिना मोलागत को पराजित किये वह मंजरी को विदा नहीं करा पायेगा। उधर, मंजरी को देखने के बाद लोरिक ने भी सोच लिया था कि वह मंजरी के अलावा किसी से ब्याह न करेगा, लेकिन हर प्रेम कहानी की तरह यह कहानी भी उतनी आसान नही थी।

जब पहुंची लोरिक की बरात 
युद्ध की तैयारी के साथ बलिया से बारात सोन नदी के तट तक आ गयी ।नदी में भारी उफान आया हुआ था और तेज बारिश भी हो रही थी। bराजा मोलागत ने तमाम उपाय किये कि बारात सोन को न पार कर सके, किन्तु बारात नदी पार कर अगोरी किले तक जा पहुँची, भीषण युद्ध और रक्तपात हुआ। इतना खून बहा कि अगोरी से निलकने वाले नाले का नाम ही रुधिरा नाला पड़ गया और आज भी इसी नाम से जाना जाता है।मोलागत और उसकी सारी सेना और उसका अपार बलशाली इंद्रावत नामक हाथी भी इस युद्ध में मारा गया। आज भी हाथी का एक प्रतीक प्रस्तर किले के सामने सोंन नदी में दिखता है। लोरिक के साथ मोलागत और उसके कई मित्र राजाओं से हुए युद्ध के प्रतीक चिह्न किले के आस पास मौजूद है।

लोरिक की ताकत और वो पाषाण 
मंजरी की विदाई के बाद डोली मौजूदा वाराणसी शक्तिनगर मार्ग के मारकुंडी पहाडी पर पहुंची। जहाँ पर नवविवाहिता मंजरी लोरिक के अपार बल को एक बार और देखने के लिए चुनौती दी और कहा कि कि कुछ ऐसा करो जिससे यहां के लोग याद रखें कि लोरिक और मंजरी कभी किस हद तक प्यार करते थे।लोरिक ने पूछा कि बोलो मंजरी क्या करूँ ?मंजरी ने लोरिक को एक विशाल चट्टान दिखाते हुए कहा कि वो अपने तलवार से इस चट्टान को एक ही वार में दो भागो में विभक्त कर दें – लोरिक ने ऐसा ही किया और अपनी प्रेम -परीक्षा में पास हो गए।a उस अद्भुत प्रेम का प्रतीक वो खंडित शिलाखंड आज भी वाराणसी-शकतिनगर मार्ग पर मौजूद हैं, जो उस प्रेम की कहानी को कहता है। बताया जाता है कि मंजरी ने खंडित शिला से अपने मांग में सिन्दूर लगाया था।

आज भी मौजूद है अगोरी का किला और वो पाषाण 
लोरिक और मंजरी की दसवीं सदी की यह प्रेम कहानी आज भी समूचे उत्तर भारत के आदिवासी समाज के जीवन का हिस्सा है। वो इस प्रेम कहानी से न सिर्फ प्रेम करना सीख रहे हैं, बल्कि अपनी संस्कृति और विरासत के प्रति जवाबदेह भी बना हुआ है।आदिवासियों के नायक लोरिक की कथा से सोनभद्र के अगोरी किले का गहरा सम्बन्ध है, यह किला आज भी मौजूद है। मगर वर्तमान परिस्थिती में यह किला बहुत जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। ईसा पूर्व निर्मित इस किले का दसवीं शती के आस पास खरवार और चन्देल राजाओं ने पुनर्निर्माण कराया था।

Show More
Awesh Tiwary Desk/Reporting
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned