भाजपा बताये, खाकी के साथ या खिलाफ

भाजपा बताये, खाकी के साथ या खिलाफ
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यूपी में बीजेपी का यह दांव उल्टा न पड़ जाए

वाराणसी. बनारस के एक थाने की चौकी में रविवार  की शाम जान बचाता इलाकाई कारोबारी घुसता है। पीछे-पीछे कुछ दबंग भी आते है। दारोगा के सामने ही कारोबारी को फिर पीटते हैं और भाग लेते है। मार खाये कारोबारी का कहना था कि उसको पीटने वाले सत्ता से जुड़े लोग थे। यह तो एक बानगी है। बीते दो साल में प्रदेश के कई जिलों में तो पुलिस वाले ही बेभाव के पिट गए। मथुरा कांड समेत कई ऐसी घटनाएं हुई जिसमे पुलिसकर्मियों को अपनी जान गंवानी पड़ी। कहने में गुरेज नहीं कि पुलिस का मोरल गिरा है। कानून का इक़बाल बुलंद करने वाले पुलिसकर्मी ही आज सत्ता के आगे बंध गए हैं। विभागीय बंदिशों के साथ ही सत्ता के ठेकेदारों के आगे बेबस पुलिसकर्मियों को इस समय बीजेपी का यह निर्णय तनिक भी नहीं भा रहा है। पुलिसकर्मी पूछ रहे हैं कि आखिर बीजेपी पुलिस के साथ खड़ी है या उसके खिलाफ।

दरअसल बीजेपी ने सपा सरकार को ध्वस्त कानून- व्यवस्था के नाम पर घेरने के लिए प्रदेशव्यापी थाना घेरने का कार्यक्रम शुरू किया है। वाराणसी समेत प्रदेश के कई जिलों में बीजेपी कार्यकर्ताओं ने जनप्रतिनिधियों के नेतृत्व ने थाना घेरने का कार्यक्रम हुआ। अनुशासन की बेड़ी में बंधे एक पुलिस ऑफिसर को बीजेपी के इस कदम से खासी नाराजगी है। अधिकारी का कहना है कि पुलिस को राजनीती से दूर करने के बजाय उसी के कंधे पर रखकर गोली चलायी ज रही है जो की हितकर नहीं है। समय पुलिस के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का है। यदि राजनीतिक दल ऐसे ही थानों पर धरना प्रदर्शन करेंगे तो पुलिसकर्मियों का मनोबल टूटेगा और अपराधियों के हौसले बुलंद होंगे। पार्टी सोचे कि उसे क्या करना है, पुलिस की मदद या फिर मनोबल तोड़ने वाला काम।

वोट बैंक पर भी पड़ेगा असर
मथुरा के जवाहर बाग़ काण्ड के बाद भी बीजेपी ने up पुलिस और खुफिया तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाये थे। तब भी यह बात सामने आई थी कि पुलिस और ख़ुफ़िया तंत्र ने इसकी रिपोर्ट पहले ही सरकार को भेज दी थी लेकिन कुछ नहीं हुआ। उस दौरान भी जब बीजेपी ने पुलिस को निशाना बनाया था तब भी पुलिसकर्मी आरोपों से आहत हुए थे। यूपी के चुनावी महासमर के बीच बीजेपी जिस तरह पुलिस को निशाना बना रही है उसका खासा असर चुनाव पर पड़ सकता है।

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