बनारस में होली : दिगम्बर खेल रहे मसाने में होली, डमरू-मजीरे के संग रंगों में डूबे श्रद्धालु

बनारस में होली 2020 का रंगारंग त्यौहार शुरू
भूतभावन भोलेनाथ की नगरी काशी में होली के पर्व का ऐतिहासिक महत्व
द्वादशी को बाबा विश्वनाथ चिताओं की भस्म से खेलते हैं होली

By: Mahendra Pratap

Published: 07 Mar 2020, 11:10 AM IST

वाराणसी. बनारस में होली 2020 का रंगारंग त्यौहार शुरू हो गया है। भूतभावन भोलेनाथ की नगरी काशी में होली के पर्व का ऐतिहासिक महत्व है। भक्तों के हाथों से उड़ते अबीर गुलाल, डमरू की थाप, मजीरे की झंकार के बीच सतरंग में रंगे भोलेनाथ यहां होली खेलते हैं। अनादिकाल से चली आ रही यह परंपरा आज भी काशी के कण कण में सजी हुई नजर आती है।

दुनियाभर में मशहूर काशी की दुर्लभ होली पर विश्वनाथ मंदिर के महंत कुलपति तिवारी बताते हैं कि काशी की होली अनादिकाल से इसी लय में चली आ रही है। रंगभरी एकादशी के दिन माता गौरा की विदाई कराकर बाबा विश्वनाथ अपने धाम ले आते हैं। इस दिन को काशीवाशी उत्सव के रूप में मनाते हैं। रंग के साथ खुशियां बिखेरी जाती है, यहीं से काशी में होली की शुरुआत होती है।

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काशी की होली एक अद्भुत पर्व :- तकरीबन एक सप्ताह तक खेली जाने वाली काशी की होली में शामिल होने के लिए देश ही नहीं दुनियाभर से लोग शामिल होते हैं। इस उत्सव में देवी, देवता, यक्ष, गन्धर्व, मनुष्य बाबा के रंग में रंगे दिखते हैं। काशी की होली अपने आप में एक अद्भुत पर्व है, जिसने इस जगत में अपनी अमिट पहचान बनाए हुए है।

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चिताओं की भस्म से होली खेलते बाबा :- द्वादशी को बाबा विश्वनाथ चिताओं की भस्म से होली खेलते हैं। इसे लेकर काशी में ऐसी मान्यता है कि बाबा जब मां गौरा का गौना कराकर लाते हैं तो काशी का जन-जन जश्न में डूबा रहता है। पर बाबा के प्रियगण भूत, प्रेत, पिशाच, दृश्य, अदृश्य, शक्तियां जिन्हें बाबा ने स्वयं मनुष्यों के बीच जाने से रोक रखा है, ये सब इस खुशी के मौके में शामिल नहीं हो पाते, इन्ही के संग होली खेलने के लिए विश्वनाथ प्रसिद्ध मणिकर्णिका धाम पहुंचते हैं और यहां जलती चिताओं की राख से होली खेलते हैं।

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घाटों पर गुलाल बरस रहा :- शुक्रवार को हज़ारों की संख्या में जुटे भक्तों ने अबीर गुलाल और चिता की राख से घण्टों तक होली खेलकर बाबा से आशीर्वाद लिया। इस वक्त काशी की गली होली के पर्व पर अपनी धुन में है, घाट पर गुलाल उड़ रहे हैं। धार्मिक आयोजक गुलशन कपूर कहते हैं कि काशी आज भी वैसी ही है, घाटों पर गुलाल बरस रहा है, हारमोनियम से निकलते सुर हर किसी के पांव थिरकने को बेबस कर दे रहे हैं। रंग उमंग दे रही, तो सिल पर छनती भंग मदमस्त कर रही है, विश्वनाथ डमरु बजा रहे हैं। होली में बाबा के संग, सभी रंग और खुशियों में भीग रहे हैं।

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