varanasi stampede मायावती की रैली से नहीं लिया वाराणसी पुलिस ने सबक

varanasi stampede मायावती की रैली से नहीं लिया वाराणसी पुलिस ने सबक
varanasi stampede

जानिए कौन हैं भगदड़ के लिए जिम्मेदार खलनायक 

वाराणसी. जय गुरुदेव के शिष्य पंकज महाराज की शाकाहार शोभायात्रा में मची भगदड़ से हुई 25 लोगों की मौत के लिए पुलिस-प्रशासन महकमा सीधे जिम्मेदार है वह भी एक नहीं बल्कि दो-दो जिलों यानि बनारस और चंदौली। पुलिस और जिला प्रशासन ने बीते दिनों कांशीराम की जयंती पर लखनऊ में मायावती की रैली से सबक लिया होता तो वाराणसी में यह हादसा न हुआ होता। पुलिस और जिला प्रशासन के अधिकारियों की लापरवाही और पुराना जुमला कि बाबा भोलेनाथ की नगरी हैं, वह सब संभाल लेंगे, भारी पड़ गया। भले ही डीजीपी की रिपोर्ट पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बनारस के एसपी सिटी समेत पांच पुलिस अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया है लेकिन हादसे को जिम्मेदार कौन लोग हैं, इसकी जवाबदेही कब तय होगी। कार्रवाई से अधिक उस योजना पर काम करने की जरूरत है जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। 

पत्रिका ने जब सिलसिलेवार पड़ताल की तो हादसे के लिए सबसे जिम्मेदारों की लंबी लिस्ट निकली। बात अगर नगर के कप्तान आकाश कुलहरि की हो तो वह बीते कुछ दिनों  से छुट्टी पर चल रहे हैं। काशी में चर्चा का विषय बना है कि जब भी काशी में कोई अनहोनी होती है, आला अधिकारी गायब रहते हैं। वर्ष 2006 सात मार्च को वाराणसी में हुए सीरियल ब्लास्ट के दौरान भी यहां के तत्कालीन कप्तान नवनीत सिकेरा सपा परिवार की शादी में शामिल होने गए थे। एसएसपी आकाश कुलहरि नवरात्र पर भी नगर में चक्रमण करते नहीं दिखे थे। कहने में गुरेज नहीं कि चार दिनों तक काशी की जनता सड़क पर थी और सुरक्षा-व्यवस्था बाबा विश्वनाथ के ही भरोसे था। बीते साल प्रतिकार यात्रा के दौरान हुए बवाल को लेकर भी कप्तान की सूझबूझ को लेकर सवाल उठे थे। 

हादसे के दूसरे खलनायक बनकर सामने आए हैं एसपी सिटी सुधाकर यादव। पूर्व डीजीपी जगमोहन के भाई सुधाकर यादव का बनारस में कुछ ऐसा दबदबा है कि यहां पर उनका अलग ही सिस्टम चलता है। बनारस में कई त्यौहार बीत गए लेकिन एसपी सिटी अपने दफ्तर व बीएचयू से बाहर नहीं निकल पाए। पूर्व में भी आला अधिकारियों ने चेतावनी भी दी थी। यहां तक की पूर्व कप्तान जोगेंद्र कुमार ने भी एसपी सिटी की कार्यशैली को लेकर शासन में रिपोर्ट की थी, वह भी तब जब जगमोहन डीजीपी थी। इसके बाद भी सुधाकर यादव बनारस में जमे रहे। दो साल पूर्व बीएचयू में छात्रसंघ चुनाव को लेकर हुए बवाल में भी एसपी सिटी की भूमिका को लेकर सवाल उठे थे। जय गुरुदेव से जुड़े किसी भी आयोजन में लाखों की भीड़ जुटती है और यह बात पुलिस महकमा तो छोडि़ए प्रदेश का आम नागरिक भी जानता है। ऐसे हालात में भी एसपी सिटी ने एक बार भी सुरक्षा-व्यवस्था का जायजा लेना उचित नहीं समझा। 

एसपी ट्रैफिक कमल किशोर को सत्संग में आए लोगों की भगदड़ से मौत के लिए पहला जिम्मेदार माना जाए तो गलत नहीं होगा क्योंकि आकाश कुलहरि के अवकाश पर चलने के कारण इस समय वहीं प्रभारी एसएसपी हैं। वाराणसी की यातायात व्यवस्था को जिम्मेदार एसपी ट्रैफिक ने अपने महकमे का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया। ट्रैफिक पुलिसकर्मियों की गलती के चलते पहले तो सौ साल से भी अधिक पुराने पुल पर लाखों लोग जुट गए और एक बाइक सवार की गलती के चलते पुल टूटने की ऐसी अफवाह फैली कि 25 लोग मौत के मुंह में समा गए। हादसे की सबसे बड़ी वजह ट्रैफिक पुलिस कर्मियों की अदूरदर्शिता ही रही। यह बात सही है कि वाराणसी में ट्रैफिक पुलिस फोर्स की कमी है लेकिन इतनी भीड़ के बाद एसएसपी का प्र्रभार संभाल रहे एसपी ट्रैफिक द्वारा फौरी तौर पर कोई प्लान न तैयार करना बड़ी कमी है।

खुफिया तंत्र भी इस मामले में फेल साबित हुआ या यूं कहिए अपने हाथ-पैर बंधे होने के कारण सिर्फ रिपोर्ट तक ही सीमित रहा। जानकारी के अनुसार एलआईयू ने पुलिस विभाग और जिला प्रशासन के आला अधिकारियों को इस बाबत सूचित किया था कि भीड़ लगातार बढ़ रही है, कोई हादसा हो सकता है इसलिए पर्याप्त पुलिस फोर्स के साथ ही समागम स्थल पर सुविधाएं मुहैया कराई जाए। एलआईयू चीखता रहा लेकिन जिला प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। 

वाराणसी रेंज के चंदौली जिले के पुलिस अधिकारियों की भी लापरवाही इस पूरे प्रकरण में थी। दो दिन पहले से ही चंदौली व वाराणसी की सीमा पर जय गुरुदेव के अनुयायियों की जुटान शुरू हो गई थी। लाखों की संख्या में भीड़ जुटने के बाद भी चंदौली पुलिस, जिला प्रशासन ने न तो वाराणसी के अधिकारियों से संपर्क साधा और न तो स्वयं कोई व्यवस्था की। चंदौली पुलिस ने उसी तरह की मानसिकता बना रखी थी जैसे सीमा पर जब कोई दुर्घटना हो जाती है तब दो जिले की पुलिस घटनास्थल को एक दूसरे पर ठेलने में अधिक व्यस्त रहती है। 

इंस्पेक्टर मुगलसराय भी वाराणसी में हुई भगदड़ के मामले में नपे हैं। जय गुरुदेव के अधिकतर अनुयायी मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर ही उतरे थे। इतना ही नहीं इंस्पेक्टर के इलाके में ही लाखों अनुयायी ठहरे थे लेकिन रेलवे स्टेशन पर होने वाली कमाई के मोह में इंस्पेक्टर साहब ने कोई लोड नहीं लिया। आला अधिकारियों तक संदेशा पहुंचाने की जहमत नहीं उठाई कि श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ गई है और सुरक्षा-व्यवस्था के इंतजाम में इजाफा करने की जरूरत है। 

स्वास्थ्य महकमा भी मामले में लापरवाह था। अमूमन जब कोई कार्यक्रम होता है तब आयोजक जिला प्रशासन से अनुमति लेता है। जिला प्रशासन अनुमति की प्रतिलिपि स्वास्थ्य विभाग के साथ ही नगर निगम व अन्य संबंधित विभाग को देता है ताकि आयोजन स्थल पर साफ सफाई, पेयजल की व्यवस्था के साथ ही आपात स्थिति में चिकित्सकीय सुविधा मौजूद रहे। स्वास्थ्य महकमे ने भी जय गुरुदेव के इस आयोजन को हल्के में लिया और आयोजन स्थल पर चिकित्साकर्मी मौजूद नहीं थे। हादसे के बाद दो घंटे से अधिक समय लग गया समाजवादी एंबुलेंस को मौके पर पहुंचने में। समय से चिकित्सकीय सुविधा न मिलने के कारण मृतकों की संख्या बढ़ गई थी। 

आयोजकों की भूमिका भी संदिग्ध
वाराणसी में जय गुरुदेव के शिष्य पंकज महाराज की तरफ से तीन हजार लोगों के जुटने की झूठी सूचना क्यों दी। पंकज महाराज को अच्छे से पता था कि जय गुरुदेव के किसी भी समागम में इतनी कम भीड़ जुटने का सवाल ही नहीं है। भीड़ लगातार बढऩे के बाद भी आयोजकों ने जिला प्रशासन को इस बाबत सूचना नहीं दी। इतना ही नहीं आयोजकों की तरफ से समागम में शामिल होने आए श्रद्धालुओं के लिए मूलभूत सुविधाओं का कोई इंतजाम नहीं किया गया था। 
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