धार्मिक स्थलों पर मौत की भगदड़, कब थमेगा ये सिलसिला

धार्मिक स्थलों पर मौत की भगदड़, कब थमेगा ये सिलसिला
rajghat pul

धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा के नाकाफी इंतजामों के चलते होते रहते हैं हादसे

वाराणसी. धार्मिक स्थलों पर मौत की भगदड़ कब थमेगी इसका जवाब फिलहाल तो बेदम हो चुके पुलिस-प्रशासनिक अफसरों के पास नहीं है। धार्मिक पर्व के दौरान उमडऩे वाली भीड़ को नियंत्रित व व्यवस्थित करने का शासन और प्रशासन के पास कोई फार्मूला नहीं है जिससे उनकी कार्यशैली पर सवाल खड़े होना लाजमी है। वाराणसी के जय गुरुदेव महाराज के शिष्य पंकज की आयोजित सत्संग समारोह भी ऐसी ही अदूरदर्शित की भेंट चढ़ गया जिसके चलते 19 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। 

धार्मिक स्थलों पर किसी खास आयोजन के दौरान हादसा कोई नई बात नहीं लेकिन किसी भी हादसे के बाद सिर्फ कुछ दिनों की हायतौबा मचती है। मजिस्ट्रेटी जांच, मुआवजा व निंदा तक ही मामला सिमट जाता है और हालात फिर वहीं ढाक के तीन पात वाला। जिला प्रशासन या शासन स्तर पर कभी भी ऐसे मामलों से निबटने की खास रणनीति नहीं बनाई जाती है। वाराणसी में ही तीन अक्टूबर 2007 को ज्युतिया पर्व के दौरान मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर भगदड़ मची थी जिसमें चौदह महिलाओं की मौत हो गई थी। इतनी संख्या में मौत के बाद यदि प्रशासन ने भविष्य के लिए कोई रणनीति बनाई होती तो शनिवार को जय गुरुदेव के सत्संग कार्यक्रम में शामिल होने आए लोग अचानक काल के गाल में न समाते। 

धार्मिक आयोजनों को लेकर अपार श्रद्धा वाले भारत देश में ऐसा कोई साल शायद ही गुजरता है जब किसी न किसी धार्मिक आयोजन में शामिल होने पहुंचे श्रद्धालु इस तरह की भगदड़ का शिकार न होते हों। हैरत की बात यह कि हर हादसे के बाद स्थानीय प्रशासन से लेकर राज्य स्तर तक जांच कमेटी गठित होती है लेकिन यह जांच रिपोर्ट कब दब जाती है किसी को याद नहीं रहता तब तक जब तक कि दूसरा हादसा न हो जाए। ऐसी घटनाओं के बाद शासन अधिक से अधिक जिलाधिकारी, कप्तान या फिर संबंधित मजिस्ट्रेट का तबादला और मुआवजा की कार्रवाई करके अपनी पीठ थपथपा लेता है लेकिन सच तो यहीं है कि इन कवायदों के बाद भी धार्मिक स्थलों पर पर्व के दौरान सुरक्षा-व्यवस्था को लेकर प्रशासनिक स्तर पर काफी सुस्ती बरती जाती है। यकीन मानिए किसी राजनेता के आने पर जिस तरीके से पुलिस प्रशासन चौबीस घंटे सक्रिय रहता है, ऐसे आयोजनों के दौरान भी सक्रियता दिखाए तो हादसे न हों। 


हादसे जो जेहन में लोगों के बस गए -
 
वाराणसी में अभी दो दिन पूर्व ही एक कार्यक्रम में शामिल होने आया गजराज भड़क उठा था जिसके चलते भगदड़ मच गई थी और एक दर्जन से अधिक लोग जख्मी हो गए थे। संयोग था कि किसी की जान नहीं गई। एक साल पूर्व गणेश प्रतिमा विसर्जन के दौरान ऐसा बवाल कटा कि बनारस को अरसे बाद कफ्र्यू का मुंह देखना पड़ा था। अराजक तत्वों द्वारा किए गए बवाल के बाद ऐसी भगदड़ मची कि पुलिसकर्मियों समेत सैकड़ों लोग जख्मी हुए। यहां भी पर भी पुलिस-प्रशासन ने यदि समझदारी दिखाई होती तो बात इतनी आगे न बढ़ती। तीन वर्ष पूर्व वाराणसी के लोलार्क कुंड में पुत्र की कामना के लिए आई महिलाएं भी भगदड़ में फंस गई थीं। संयोग अच्छा था कि अधिकतर महिलाएं सिर्फ घायल हुईं। यदि कोई मौत हो जाती तो इस कुंड पर भी एक कलंक लग जाता जिसका ठीकरा जिला प्रशासन व पुलिस के मत्थे आता। 

धार्मिक स्थानों पर बदइंतजामी के चलते हादसों का इतिहास काफी लंबा है। तीन साल पूर्व इलाहाबाद कुंभ मेले के दौरान इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर रेलिंग टूटने के बाद मची भगदड़ में 36 लोगों की मौत हो गई थी। दो साल पूर्व मुंबई में सैयदना के अंतिम दर्शन को उमड़ी भीड़ में भगदड़ से 18 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।  पड़ोसी जिला मध्य प्रदेश में भी वर्ष 2013 में दतिया के रतनगढ़ मंदिर के टूटने की अफवाह के चलते मची भगदड़ में 115 लोग मारे गए थे। 

चार साल पूर्व 2012 में बिहार के पटना जिला में छठ पूजा के दौरान अदालतगंज घाट पर हुई भगदड़ में 18 मरे थे। अप्रैल 2004 में भाजपा नेता लालजी टंडन के जन्मदिवस पर आयोजित समारोह में साड़ी लेने पहुंची 21 महिलाएं भगदड़ में मारी गई थीं। 2008 में हिमाचल के नैना देवी मंदिर में भगदड़ के चलते 145 श्रद्धालु मारे गए थे। दो साल पूर्व बिहार के पटना में गांधी मैदान में विजय दशमी के दिन मची भगदड़ तीन दर्जन से अधिक मौतें हुई थी।

वाराणसी में दो साल पूर्व शूलटंकेश्वर मंदिर में दर्शन के बाद नाव से मीरजापुर श्रद्धालुओं का जत्था लौट रहा था। क्षमता से अधिक नाव में चालीस लोग सवार थे और नाव बीच गंगा जाकर पलट गई थी जिसके चलते दो लोगों की मौत हो गई थी जबकि कई लापता हुए जिनके शव आज तक नहीं मिले। नाविकों की समझदारी से कई जाने बच गई थीं।  
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