
जयपुर।
समृद्ध भवन निर्माण,परंपरा,विरासत और संस्कृति की लिए जयपुर की अपनी एक पहचान है। जयपुर के स्थापत्य,कला और संस्कृति पर यूनेस्को की भी मुहर लग गई है। यूनेस्को ने जयपुर को वर्ल्ड हेरिटेज सिटी का दर्जा दिया है। ऐसे में पत्रिका शुरू कर रहा है ‘परकोटे की परिक्रमा’ इस परिक्रमा पर पत्रिका टीवी के रिपोर्टर होंगे परकोटे में और परकोटे से जुड़ी हर वो छोटी-बड़ी चीजों से आपको रूबरू कराएंगे। जो पहचान है जयपुर के हेरिटेज की इसी में आज आपको दिखा रहे हैं तालकटोरे और जयपुर के जल संरक्षण के प्राचीन तरीके के बारे में..देखिए वीड़ियो…
गुलाबी नगर जयपुर को भारत का पेरिस यूं ही नहीं कहा जाता है। यहां हर पग पर विरासत, हेरिटेज, परंपरा के निशां देखे जा सकते हैं। आज आपको बता रहे हैं तालकटोरे के बारे में पहले आमेर के राजा सवाई जयसिंह द्वितीय शिकार के लिए नाहरगढ़ की पहाड़ियों की तलहटी में आते थे। इसी स्थान पर जयसिंह ने जयपुर बसाने का विचार किया था। उंचाई से देखने पर पहाड़ियों के बीच में एक कटोरे के जैसा दिखाई देने की वजह से इसका नाम तालकटोरा रखा गया। धीरे धीरे इसका स्वरूप बदल गया है और यह चौकोर हो गया है। एक समय में इसमें फव्वारे चला करते थे तब इसका स्वरूप देखते ही बनता था। इसी के लगते हुए बादल महल था जहां पर सावन और बरसात के दिनों में राजपरिवार के लोग आकर समय बिताते थे। जयपुर के महाराज और राजपरिवार के सदस्य नाव में बैठ कर सवारी करते थे। जयपुर की बसावत के समय वास्तु का पूरा ध्यान रखा गया था