तिरुपति के साथ ही विदिशा के बालाजी का भी मन रहा विवाह महोत्सव

विदिशा में बालाजी के विवाहोत्सव की तीन सौ साल पुरानी परंपरा

By: govind saxena

Published: 13 Oct 2021, 09:38 PM IST

विदिशा. दक्षिण के तिरुपति में विराजे बालाजी का अश्विन शुक्ल पक्ष की अष्टमी, नवमी और दशहरे को ब्रम्होत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। इस तीन दिनी उत्सव को बालाजी महाराज का विवाहोत्सव माना जाता है। बिल्कुल इसी तर्ज पर विदिशा में विराजे व्यंकटेश बालाजी का भी इन्हीं तिथियों में विवाहोत्सव मनता है। नवरात्र के पहले दिन गणेश पूजन के बाद 13 अक्टूबर अष्टमी को बालाजी और लक्ष्मीदेवी की लगुन रस्म और पाणिग्रहण संस्कार हुआ। इस दौरान मंदिर परिसर में लोगों की आस्था देखते ही बनती थी। बालाजी के विवाहोत्सव में शामिल होने के लिए लोग उत्साह से आते जा रहे थे। मंत्रोच्चार से परिसर गूंज रहा था और फिर जयकारों के बीच भगवान का अंर्तपट हुआ। अब दशहरे पर धूमधाम से बालाजी विन्नायकी निकलेगी और फिर विवाह उपरांत शरद पूर्णिमा पर विप्र भोज के साथ महोत्सव का समापन होगा।
मंदिर के 84 वर्षीय वरिष्ठ पुजारी पं. कैलाश नारायण चतुर्वेदी बताते हैं कि उन्होंने विरासत में ये परंपरा पाई है। मंदिर का निर्माण 1776 में मुंशी प्रयागदास ने कराया था और तब से ही चतुर्वेदी परिवार को बालाजी की सेवा के लिए नियुक्त किया गया था और इसी चतुर्वेदी परिवार की पीढिय़ां यहां पूजा करती हैं। हर वर्ष धूमधाम से बालाजी का विवाहोत्सव मनाया जाता है। लक्ष्मी व्यंकटेश बालाजी के पाणिग्रहण संस्कार में शाम 6 बजे से उत्सव शुरू हुआ और पहले बालाजी का अभिषेक, मंगलाष्टक के बाद विद्वानों द्वारा स्वस्तिवाचन हुआ। गाजे-बाजे बज उठे और बालाजी की प्रतिमा को चादर से ढंक दिया गया। स्वस्तिवाचन के बाद ही उनके दर्शन हुए और भक्तों तथा मौजूद विप्रजनों ने उन पर पुष्प-अक्षत वर्षा की। यह रस्म अंर्तपट कहलाती है। इस मौके पर विधायक शशांक भार्गव, पं. नंदकिशोर शास्त्री, रवि चतुर्वेदी, सुरेश शर्मा शास्त्री, मनोज शास्त्री, विजय चतुर्वेदी, मनमोहन शर्मा, शिवराम शर्मा, विशाल चतुर्वेदी, विहिप के मलखान सिंह, नारायण शर्मा, सतीश व्यास, नरेंद्र पीतलिया सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु महिलाएं और पुरुष मौजूद रहे। अब 15 अक्टूबर को दशहरे के दिन बालाजी की विन्नायकी निकाली जाएगी, जिसमें व्यंकटेश बालाजी पालकी में सवार होकर निकलेंगे। विवाह के आचार्य पं. गिरीश दयाल चतुर्वेदी हैं। मुख्य पुजारी कैलाश नारायण बताते हैं कि तिरुपति बालाजी के मंदिर में भी इसी तरह का आयोजन होता है, वहां यह तीन दिनी उत्सव ब्रम्होत्सव के नाम से जाना जाता है। वहां भी इन्हीं तिथियों में यह आयोजन होता है। गौरतलब है कि विदिशा के व्यंकटेश बालाजी की प्रतिमा भी तिरुपति की ही तर्ज पर काले संगमरमर से और उसी तरह की बनी है। यहां भगवान के आजू बाजू में लक्ष्मीदेवी और भूदेवी की प्रतिमाएं विराजमान हैं। बाहर द्वार पर भगवान के द्वारपाल जय-विजय मौजूद हैं, जबकि बाहर ऋषिकुमार सनक, सनंदन, सनत और कुमार बैठे हैं, इन चार प्रतिमाओं को चारों वेदों का प्रतीक भी माना गया है।

govind saxena Bureau Incharge
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