यहां 1600 साल से विराजे हैं बाल गणेश, बिना वस्त्राभूषण और मुकुट की है अद्भुत प्रतिमा

गुप्तकालीन प्रतिमा पर न मुकुट न वस्त्राभूषण, गुफाओं में विराजे हैं बाल गणेश..

By: Shailendra Sharma

Published: 23 Aug 2020, 07:31 PM IST

विदिशा. गणेशोत्सव में इस बार भले ही झांकी पंडालों में भव्य और भिन्न-भिन्न रूपों में विशाल गणेश प्रतिमाओं के दर्शन नहीं हो पा रहे हैं, लेकिन विदिशा जिले की प्रसिद्ध उदयगिरी पहाड़ी की गुफाओं में प्रदेश की सबसे प्राचीन गणेश प्रतिमाओं में से एक बालरूप गणेश की प्रतिमा के दर्शन किए जा सकते हैं। उदयगिरी की गुफा क्रमांक 6 में स्थित यह बालरूप गणेश की प्रतिमा उस समय की मानी जाती है जब गणेश प्रतिमाओं का निर्माण शुरू हुआ था।

दो भुजा वाली अद्भुत प्रतिमा
गुप्तकालीन बाल गणेश की यह प्रतिमा चतुर्भज नहीं बल्कि दो भुजा वाली है। इस प्रतिमा के मस्तक पर न तो मुकुट है और न ही शरीर पर कोई वस्त्र, गले में जरूर एक कंठा सा आभूषण दिखाई देता है, इसके अलावा पूरी प्रतिमा वस्त्र, मुकुट और आभूषणों से विहीन दिखाई देती है। ऐसा माना जाता है कि इसके बाद ही गणेश प्रतिमाओं का निर्माण शुरू हुआ जिसमें उन्हें वस्त्र और आभूषण के साथ दिखाया जाने लगा। गुप्त काल में चंद्रगुप्त द्वितीय के समय बनाई गई उदयगिरी की गुफाओं में सामान्यत: शैव और वैष्णव संप्रदाय की प्रतिमाएं मौजूद हैं। विशाल वराह प्रतिमा और शेषाशायी के रूप में भगवान विष्णु और मुखलिंगी शिव तथा अमृत गुफाओं में शिवलिंग विराजित हैं। यहां महिषासुर मर्दिनी और कुमार यानी कार्तिक की प्रतिमाएं भी मौजूद हैं, लेकिन गुफा क्रमांक 6 की गणेश प्रतिमा दुर्लभ है। इसी तरह उदयगिरी की गुफा क्रमांक 2, 17 और 18 में भी भगवान गणेश की ऐसी ही बालरूप प्रतिमाएं मौजूद हैं।

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पुरातत्ववेत्ता डॉ नारायण व्यास बताते हैं कि उदयगिरी की यह गणेश प्रतिमा प्रदेश की सबसे प्राचीन गणेश प्रतिमाओं में से एक है। डॉ व्यास कहते हैं कि मैंने खुद बैसनगर (उदयगिरी के पास) से गणेश जी का एक मस्तक खोजा था, जो कुषाणकाल का था। उस मुकुट का शिल्प विदेशी शिल्प का संकेत देता है। वह मस्तक अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के भोपाल कार्यालय में मौजूद है।

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