पत्रिका साक्षात्कार...नामांकन भरने से पहले राघवजी और मेरे बीच में हुआ था समझौता

कांग्रेस के पूर्व विधायक डॉ. सूर्यप्रकाश सक्सेना ने किया रहस्योद्घाटन

By: govind saxena

Published: 27 Sep 2021, 09:05 AM IST

विदिशा. चिकित्सा पेशे से राजनीति में आए डॉ. सूर्यप्रकाश सक्सेना जिले के एक ऐसे इकलौते नेता हैं जो विधायक और नगरपालिका अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर एक साथ रहे हैं। उन्होंने विधानसभा का एक ही चुनाव लड़ा और जनसंघ के राघवजी को हराकर जीते भी। लेकिन इस चुनाव में नामांकन भरने से पहले उनके और राघवजी के बीच एक समझौता हुआ था, जिसे दोनों नेताओं ने पूरे चुनाव में पूरी शिद्दत से निभाया। क्या था वह समझौता? पत्रिका से साक्षात्कार में 84 वर्षीय डॉ. सक्सेना ने किया वह रहस्योद्घाटन।

सवाल- शिक्षा कहां हुई और राजनीति में प्रवेश कैसे हुआ?
जवाब- प्राथमिक शिक्षा घर पर और फिर जैन स्कूल में ही हुई। हाइस्कूल के बाद माधव कॉलेज उज्जैन चला गया। ग्वालियर से मेडिकल की डिग्री ली और विदिशा में 1960 में प्रेक्टिस शुरू की। शुरू से कांग्रेस विचारधारा से प्रभावित रहा, अग्रवाल धर्मशाला में एक तरफ आरएसएस की शाखा लगती थी तो दूसरी ओर सेवादल की। सेवादल की शाखा से ही राजनीति में प्रवेश हुआ मान सकते हैं। बाबू रामसहाय जी के साथ काम किया और आगे बढ़ा।

सवाल- विधायक कब और कैसे बने?
जवाब- विदिशा विधानसभा के लिए 1971 में उपचुनाव हुआ। वरिष्ठ नेता डीपी मिश्रा और गोविंद नारायण सिंह ने मेरा टिकट लगभग फायनल कर दिया था, लेकिन श्यामाचरण शुक्ल ने नाम बदल दिया। इसी दौरान मेरे पिता का निधन हो गया। बाद में फिर सक्रिय राजनीति शुरू की और 1972 में डीपी मिश्रा ने टिकट दिया। यह 1972 की बात है और विदिशा विधानसभा में 1957 के बाद से कोई भी कांग्रेस उम्मीदवार विधायक नहीं बना था। मेरे प्रतिद्वंदी के रूप में जनसंघ ने अपने विधायक राघवजी को रिपीट किया था।

सवाल- राघवजी और आपके संबंध कैसे थे?
जवाब- राघवजी और मैं बचपन से साथ पढ़े थे। हम सहपाठी हैं, बहुत अच्छी मित्रता थी और आज भी है। लेकिन चुनाव तो लडऩा ही था। मन में यह जरूर था कि चुनाव में मित्रता प्रभावित नहीं होना चाहिए। संयोग से हम दोनों ने नामांकन भी एक साथ भरे। उसी समय मुझे मौका मिल गया और नेताओं-कार्यकर्ताओं के बीच से मैं राघवजी को एक तरफ ले गया। उनसे कहा कि देखों चुनाव में दोनों तो जीतेंगे नहीं, एक तो हारेगा ही। लेकिन यह बेहतर होगा कि मित्रता की खातिर हम एक समझौता करें कि चुनाव भी मित्रता से लड़ा जाए। कोई किसी पर व्यक्तिगत और पारिवारिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं करेगा। राघवजी ने तत्काल इस पर सहमति जताई और हो गया दोनों के बीच राजनीति की शुद्धता का यह समझौता। मुझे फक्र है कि हम दोनों ने पूरे चुनाव में यह समझौता पूरी तरह निभाया और आज भी राघवजी और मेरे संबंध पूरी तरह मित्रतापूर्ण हैं।

सवाल- विधायक रहते हुए आप नपाध्यक्ष बने? ये कैसे हुआ।
जवाब- घटना 1975 की है। नपाध्यक्ष के टिकट की अनुशंसा जिला कांग्रेस करती थी और प्रदेश कांग्रेस घोषणा करती थी। मैं विधायक था और राजमल जालौरी कांग्रेस जिलाध्यक्ष। जालौरी के घर पर नाम तय करने के लिए बैठक चल रही थी, मैं भी चला गया। रामनारायण अग्रवाल को टिकट मिल रहा था, लेकिन अन्य पार्षद उनके नाम पर सहमत नहीं थे। डॉ. पद्म जैन और भूपेंद्र बंसल सहित साथियों ने कहा कि-डॉक्टर आप ही लड़ो। मैंने मना किया कि मैं विधायक हूं, ठीक नहीं है। नपा के 27 में से 15 पार्षद मेरे साथ थे जिन्होंने तय किया कि चुनाव आप ही लड़ोगे। उस समय प्रदेशाध्यक्ष नंदकिशोर शर्मा थे। उन्होंने टिकट तय करने मुझे अधिकृत कर दिया। फिर मैंने और भूपेंद्र बंसल ने फार्म भर दिया। बंसल ने बाद में फार्म वापस ले लिया। सभी पार्षद प्रतापभानु शर्मा के साथ गाड़ी में बैठकर वोट डालने आए, लेकिन उन्होंने जिला कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा तय रामनारायण अग्रवाल की जगह मुझे वोट किया। मुझे 27 में से 18 वोट मिले और मुझे चुन लिया गया।

सवाल- प्रतापभानु को जब सांसद का टिकट मिला तब आप जिलाध्यक्ष थे?
जवाब- बिल्कुल सही। 1980 में सेठी जी ने मुझे सांसद का चुनाव लडऩे बहुत कहा था, लेकिन मेरी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए हाथ जोड़ लिए। दूसरे एक नेता का नाम बताया तो सेठी जी ने साफ नकार दिया। फिर प्रतापभानु शर्मा का नाम रखा तो सेठी जी बोले-प्रतापभानु को जिताएगा कौन? मैने कहा था कि हम जिताकर लाएंगे। इसकी भूमिका के लिए इंदिरा गांधी को यहां लाना तय हुआ। इंदिराजी की सभा के लिए भीड़ सुबह से आ गई, लेकिन ऐनवक्त पर उनका आना कैंसिल हो गया। मैंने किसी तरह खुद फोन पर बात कर कहा था कि- कांग्रेस का छोटा सा सेवक हूं। यहां एक लाख लोग बैठे हैं, जनता मुझे मार डालेगी। इस पर इंदिराजी ने कहा था कि वेट करो, मैं आऊंगी। वे दूसरे दिन आईं। हेलीपेड से मंच के बीच बात हुई- प्रतापभानु के नाम पर बोलीं, क्या गारंटी है? मैंने यही कहा था- नहीं जिता पाऊं तो कांग्रेस से निकाल देना। वे चलीं गईं, बाद में प्रतापभानु के नाम की घोषणा हुई।

सवाल-क्या कांग्रेस में आपके खिलाफ कभी माहौल नहीं बना।
जवाब-(हंसते हुए) खूब बना। मैं पीसी सेठी के नजदीक था, लेकिन श्यामाचरण शुक्ल मुझे पसंद नहीं करते थे। विधायक बना तो जो लोग राजनीति में चलना सीख रहे थे, वही बाद में मेरी काट करने लगे। कांग्रेसी विधायक होते हुए भी मुझे मीसा में बंद कराने का प्रयास किया गया। नपाध्यक्ष के चुनाव में भी बाद में बड़े पदों पर पहुंचे मौजूदा नेताओं ने खूब खिलाफत की। हालांकि मैंने उनका पूरा सहयोग किया। बाद में बड़े पदों पर पहुंचे लोगों ने मेरा टिकट कटवाने में भी जी जान लगाई। खैर, यही राजनीति अब भी खूब चल रही है।

govind saxena Bureau Incharge
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