बाढ़ और कोरोना से निजात दिलाने 'शिव-साधना' ने की गणपति की आराधना

बाढ़ से हुए नुकसान का जायजा लेने पहुंचे सीएम शिवराज सिंह चौहान ने पत्नी साधना सिंह सहित भगवान गणेश से की कोरोना और बाढ़ से निजात देने की प्रार्थना..

By: Shailendra Sharma

Updated: 30 Aug 2020, 10:45 PM IST

विदिशा. मध्यप्रदेश में लगातार बारिश से बने बाढ़ का हालात जानने के लिए सीएम शिवराज सिंह चौहान हेलीकॉप्टर से प्रदेश का दौरान कर रहे हैं। बाढ़ का दौरा करते हुए सीएम शिवराज रविवार को विदिशा भी पहुंचे जहां वो गणेश उत्सव में बाढ़ वाले गणेश मंदिर जाना नहीं भूले। उन्होंने मंदिर में बप्पा के दर्शन किए और पूजन कर प्रदेश को कोरोना और भारी बारिश से उत्पन्न हालात से निजात दिलाने की प्रार्थना की। इस दौरान उनकी धर्मपत्नी साधना सिंह भी मौजूद रहीं।

बाढ़ वाले गणेश में ही सीएम शिवराज की आस्था
विदिशा के बाढ़ वाले गणेश मंदिर प्रदेश के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है और बाढ़ वाले गणेश मंदिर में सीएम शिवराज सिंह चौहान की भी काफी आस्था है। वो अक्सर परिवार सहित बाढ़ वाले गणेश मंदिर में भगवान गणेश के दर्शन करने के लिए आते रहते हैं। बाढ़ का जायजा लेने के दौरान भी विदिशा पहुंचने पर पत्नी साधना सिंह के साथ बाढ़ वाले गणेश मंदिर पहुंचे और पूजा अर्चना की। साल 2010 में जब बाढ़ वाले गणेश मंदिर का निर्माण हुआ था तो सीएम शिवराज ने खुद मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के समय सबसे ऊंचे शिखर पर ध्वज और कलश चढ़ाया था। तब सीएम शिवराज सीढ़ी लगाकर ध्वज और कलश चढ़ाने के लिए मंदिर पर चढ़े थे।

 

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ऐसे पड़ा बाढ़ वाले गणेश नाम
बाढ़ वाले गणेश मंदिर के नाम की भी एक अलग ही कहानी है। बताया जाता है कि यहां पर बच्चों ने भगवान गणेश की प्रतिमा की झांकी लगाई थी लेकिन लगातार बारिश के कारण नदी की बाढ़ में गणेश पंडाल डूब गया था। 3 दिन बाद जब नदी की बाढ़ कम हुई और नदी का पानी उतरा तो बच्चे फिर से पंडाल पर पहुंचे तो मिट्टी की गणेश प्रतिमा ज्यों की त्यों थी। तब शिवराज सिंह की पत्नी साधना सिंह खुद वहां पहुंची थीं और गणेश प्रतिमा के दर्शन कर उसे चमत्कारी बताते हुए यहां मंदिर बनाने की बात कही थी। बाद में सीएम शिवराज सिंह चौहान के निर्देश पर साल 2010 में इस मंदिर का निर्माण किया गया था और इस मंदिर का नाम बाढ़ वाले गणेश रखा गया था। मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा करने के लिए खुद सीएम शिवराज सिंह चौहान पहुंचे थे प्राण प्रतिष्ठा के समय मंदिर के सबसे ऊंचे शिखर पर सीढ़ी लगाकर ध्वज और कलश चढ़ाया था।

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