आ अब लौट चलें...

जीवन संघर्ष में महानगरों से अपने गांव लौटने की जद्दोजहद

By: govind saxena

Published: 12 May 2020, 09:37 PM IST

विदिशा. कोरोना संकट काल, लॉक डाउन का दौर...। काम-धंधे बंद, बाजार बंद, रोजी-रोटी का संकट। ऐसे में वर्षों पहले गांव से रोजी रोटी की तलाश में महानगरों में जाकर बस गए लोग फिर गांव लौटने की जद्दोजहद में हैं। शहरों में सब बंद है, लेकिन अपना गांव-अपना घर तो अपना ही होता है। गांव में अपने परिजनों के साथ मिलकर दो रोटी तो खा सकेंगे। वह भी नहीं मिली तो सब साथ तो रहेंगे अपनी माटी और अपने देस में। लॉक डाउन खुलने के बाद जब काम धंधे शुरू हुए और सब ठीक रहा तो वापस लौटेंगे, काम तो करना है, जिन्दगी तो चलाना ही पड़ेगी। कुछ इसी तरह के भाव लेकर हजारों लोग रात दिन महानगरों से अपने-अपने गांव को लौट चले हैं। जैसे भी, कैसे भी संभव हो बस चले चलो। ट्रक, ट्राले, जीप, कार, मेटाडोर, लोडिंग ऑटो, ऑटो, बाइक, साइकिल और अगर वो भी नहीं तो पैदल ही चल पड़े सैंकड़ों किमी की दूरी तय करते हुए। मन में बस एक ही बात...आ अब लौट चलें...।


विदिशा-रायसेन जिले की सीमा पर बना पुलिस का चेक पोस्ट। सुबह 10 बजे से लेकर 12 बजे तक के हालात ऐसे कि हर पल विदिशा बायपास से कई ऑटो, ट्रक, ट्राले, लोडिंग ऑटो, मेटाडोर, बाइक गुजर रहीं थीं। अधिकांश वाहन महाराष्ट्र के। कुछ मुंबई, कुछ पुणे, कुछ भिवंडी सहित अनेक जगह से आ रहे वाहन और उसमें सवार हजारों लोग। कोई सोशल डिस्टेंसिंग नहीं, कोई परहेज नहीं, जैसे भी हो अपने गांव पहुंच जाएं। विदिशा बायपास पर सामान्यत: कोई ऑटो नहीं दिखता था, लेकिन अब हर मिनट में 5-7 ऑटो निकल रहे हैं। इनमें से ज्यादातर ऑटो मुंबई से आ रहे हैं। कई ऑटो चालक खुद अपने काम धंधे बंद होने पर पूरे परिवार को लेकर अपने गांव निकल पड़े हैं।

ऑटो से 1486 किमी का सफर लाई चने खाकर
मुंबई से जौनपुर की दूरी करीब 1486 किमी है। मुंबई के बोरीवली इलाके से अपना ऑटो लेकर उप्र के जौनपुर जिले में जा रहे दशरथ जायसवाल और मजीद खान बताते हैं कि लाई-चने खाकर सफर तय कर रहे हैं। लॉक डाउन खुलने और सब कुछ सामान्य होने पर फिर वापस मुंबई लौटना पड़ेगा। अभी तो ऑटो का लोन भी दो लाख रूपए देना है। वापस नहीं आएंगे तो क्या करेंगे। अपने गांव में तो काम मिलता नहीं है। अरूण सिंह यादव और विनोद यादव कहते हैं कि मुंबई तो भूखे मरने की नौब्त थी, अपने गांव पर दो रोटी तो मिलेंगी परिवार के साथ।

बाइक से बीबी-बच्चे सहित 1400 किमी की यात्रा
मुंबई से इलाहाबाद की दूरी करीब 1400 किमी है। लेकिन जब कोई साधन नहीं दिखा तो संदीप सिंह अपनी पत्नी और 8 साल के बच्चे के साथ बाइक से ही निकल पड़े सफर पर। जगह-जगह रास्ता पूछते जा रहे और बढ़ते जा रहे संदीप बताते हैं कि दो माह से कुछ काम नहीं था तो वहां रहकर भी क्या करते। परिवार को छोडऩे का सवाल ही नहीं था, इसलिए सब एक साथ निकल पड़े, जो होगा देखा जाएगा।

साइकिल से चल दिए भिवंडी से इलाहाबाद
भिवंडी महाराष्ट्र में टेक्सटाइल मिल में लूम चलाने का काम करने वाले शमशेर बहादुर और गंगाराम को जब वहां जीवन चलाना मुश्किल हुआ और कोई साधन नहीं मिला तो वे अपनी साइकिल उठाकर निकल पड़े। कैसे पहुंचेंगे पता नहीं। लेकिन कहते हैं कि वहां तो खाने के भी लाले पड़ रहे थे, कब तक रहते। वे कहते हैं कि जब कारखाना फिर खुलेगा तो जाना ही पड़ेगा, काम तो हर कहीं मिलता नहीं।

स्विच ऑफ रखते हैं मोबाइल...
साइकिल से ही डेढ हजार किमी से भी ज्यादा की यात्रा पर मुंबई से बहराइच के लिए निकल पड़े फिरोज खान मुंबई में हाथ गाड़ी चलाते थे। अब सब बंद है तो वे दो माह से बेकार थे। अपने 5 साथियों के साथ निकल पड़े साइकिलों से अपने गांव के लिए। वे कहते हैं कि मोबाइल तो है, लेकिन डिस्चार्ज न हो, इसलिए उसे स्विच ऑफ ही रखते हैं। जब जरूरत होती है तो ऑन कर बात कर लेते हैं। वे कहते हैं कि वापस तो लौटना पड़ेगा। अगर अपने गांव में ही काम मिले तो कोई क्यों जाए दूर शहरों में।


पुलिस-प्रशासन बांट रहा भोजन
अग्रवाल एकेडमी के पास बने चेक पाइंट पर पुलिस और प्रशासन ने साइकिल, पैदल आने-जाने वालों के लिए भोजन के पैकेट की व्यवस्था की है। पुलिसकर्मी ही उन्हें भोजन भी बांट रहे हैं। ज्यादातर लोग पुलिस वालों से इलाहाबाद, कटनी, कानपुर, सीधी, सतना आदि जगहों के रास्ते पूछ रहे हैं। रात दिन यही स्थिति बनी हुई है। पैदल और साइकिल से चलने वालों को पुलिस और प्रशासन के लोग रोककर बैठाते हैं और फिर किसी ट्रक, मेटाडोर आदि में व्यवस्था कर उसमें उन्हें जहां तक संभव हो वहां तक भेजने के लिए बैठाते हैं। यहां से पुलिस और प्रशासन ने साइकिल से सीधी जा रहे 12 लोगों को एक ट्रक में बैठाकर रवाना किया।


16 लोगों को सिरोंज-कुरवाई भेजा
नायब तहसीलदार प्रमोद उइके ने अग्रवाल एकेडमी में रूके 16 लोगों को सरकारी वाहन उपलब्ध कराते हुए उन्हें उनके गृह नगर कुरवाई और सिरोंज के लिए रवाना किया। उइके बताते हैं कि चेक पाइंट पर जब अपने जिले के लोग मिलते हैं तो उन्हें अग्रवाल एकेडमी में रोक लिया जाता है, फिर वाहन की व्यवस्था कर उन्हें उनके गांव भेजने का प्रयास रहता है।

govind saxena Bureau Incharge
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned