तम्बू की जगह पक्की दुकानों और मशालों की जगह झिलमिलाती रोशनी ने ले ली अब

37 बीघे में लगता है मेला, 3 बीघा में होती है रामलीला

By: govind saxena

Published: 06 Jan 2020, 05:40 PM IST

विदिशा. नगर की ऐतिहासिक रामलीला अपने 119 वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। 13 जनवरी को भूमिपूजन और ध्वजारोहण के साथ ही 14 जनवरी को शिव बारात के साथ 27 दिन चलने वाली रामलीला का श्रीगणेश हो जाएगा। भगवान राम की लीलाओं के लिए अयोध्या और लंका भवन के साथ ही पूरा रामलीला परिसर रंग रोगन के साथ ही सज संवर तैयार हो रहा है। विदिशा की रामलीला की भव्यता का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जहां रामलीला मेला करीब 37 बीघा क्षेत्र में लगता है, वहीं करीब 3 बीघा के परिसर और सुविधायुक्त स्टेडियम सी सीढिय़ों के बीच मैदान में रामलीला होती है। खुले मैदान में युद्ध, सड़कों से दौड़ती आतीं राक्षस सेनाएं और शहर में करीब तीन किमी का भ्रमण करके निकलती शिवजी और रामजी की बारात इन लीलाओं को और जीवंत बनाती हैं। लेकिन 119 वर्ष के इस सफर में रामलीला ने काफी बदलाव देखा है। जो रामलीला पहले मशालों की रोशनी में होती थी, वही अब लाखों बल्बों की झालरों की झिलमिल रोशनी में होती है। इसी तरह मेला पहले छोटे-बड़े तंबूओं की दुकानों में सजता था, लेकिन अब तंबुओं की जगह पक्की दुकानों ने ले ली है।


सन् 1901 में धर्माधिकारी पं. विश्वनाथ शास्त्री ने लोगों को धर्म से जोडऩे की मंशा से रामलीला की शुरूआत बहुत छोटे से रूप में की थी। तब मौजूदा रामलीला परिसर जंगली झाडिय़ों और ऊबड़ खाबड़ जमीन तथा टीलों के रूप में था। पं. विश्वनाथ शास्त्री और उनके साथियों सहित शिष्यों ने रामलीला को साकार करने के लिए मैदान को समतल करने का काफी प्रयास किया और पूरी शिद्दत से रामलीला की शुरूआत की। पहले अयोध्या के रूप में एक घास-फूस की झोपड़ी बनाई जाती थी, जिसके स्थान पर अब भव्य दो मंजिला भवन है। लंका के दो मंजिला भवन का निर्माण भी बाद में हुआ। पहले रामलीला देखने गांव-गांव से लोग अपनी बैलगाडिय़ों से और खाना बनाने का सारा सामान लेकर आते थे। मैदान में ही दाल-बाटी बनाकर भोजन होता था और फिर यहीं लोग रामलीला का आनंद अपने घरों से लाई दरी-चटाई पर बैठकर लेते थे। लेकिन वक्त बदला और करीब तीन बीघा का रामलीला परिसर भव्य स्टेडियम के रूप में तब्दील हो गया। अब यहां करीब 10 हजार लोगों के बैठने की सुविधा है। सीढिय़ों पर महिलाएं और पुरुष अलग-अलग बैठकर सुविधा से रामलीला दर्शन का आनंद लेते हैं। रामलीला में शुरू से पालकियों का चलन था, यही चलन अब भी बरकरार है। रामलीला में अभी 4 पालकियां, 1 विमान और 3 रथ हैं। इस बार नया रथ उज्जैन से तैयार होकर आ रहा है। पहले रामलीला का दर्शन मशालों की रोशनी में होता था, जबकि अब रामलीला परिसर आकर्षक विद्युत सज्जा से झिलमिलाता है।


जहां तक मेले का सवाल है तो इसमें बहुत बदलाव आया है। पहले रामलीला तिराहे से लेकर पशु बाजार की जगह तक पर छोटे-छोटे तम्बू लगाकर तमाम उपयोग की सामग्री बेंचने दूर-दूर से व्यापारी आते थे। बैलों की जोडिय़ां, पहिए, कढ़ाई, कृषि उपकरण और बाद में बाइक से लेकर हार्वेस्टर तक यहां बिकने आने लगे। लेकिन मेले का स्वरूप मेला परिसर में बनी पक्की दुकानों ने बदल दिया। पक्की दुकानों ने रामलीला मेले की आय तो बढ़ा दी, लेकिन मेले का असली स्वरूप गुम होकर मेला पक्के बाजार में परिवर्तित लगने लगा। वर्षों तक यहां बरखेड़ा की गुलाबजामुन की दुकानें खूब प्रसिद्ध थी और इन पर खूब भीड़ रहती थी। लोग केवल रामलीला देखने, झूला झूलने और बरखेड़ा की गुलाबजामुन का स्वाद लेने भी अपने परिवार और साथियों संग मेले में आते थे। लेकिन अब बरखेड़ा का नाम ही रह गया है। गुलाबजामुन की जगह अब कदम-कदम पर लगीं सोफ्टी की दुकानों ने ले ली है। झूलों में भी पलकिया वाले झूलों की जगह ब्रेक डांस और टोरा-टोरा जैसे झूलों ने ले ली है।

govind saxena Bureau Incharge
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