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सिर से उठा माता-पिता का साया, क्या आप बनेंगे इनके ' पालनहार '

जिले के सेवाभावियों से मदद की उम्मीद, केवल 50 बच्चों को मिल पा रही सरकारी सहायता

विदिशा

Published: February 24, 2022 10:00:55 pm

विदिशा. पिछले दो साल जीवन-मृत्यु की कशमकश और अकाल मौतों से जूझते हुए निकले हैं। इस संकट में जिले के करीब 350 बच्चों ने अपनी मां, पिता या दोनों को खो दिया। बचपन में ही माता-पिता का साया सिर पर से उठ जाने या दोनों में से किसी एक की मौत से इन बच्चों के सामने जीवन यापन का संकट खड़़ा हो गया है। बच्चे अपने किसी न किसी परिजन के पास तो हैं लेकिन जिन लोगों को अपने परिवार पालना ही मुश्किल होता हो, उनमें से कई को इन बच्चों की परवरिश करना भी दूभर हो रहा है। सरकार की योजना है कि ऐसे हर बच्चे को दो हजार रुपए प्रतिमाह के मान से भरण पोषण राशि मिले, लेकिन वह भी 350 में से मात्र 50 को ही मिल पा रही है। ऐसे में अब बच्चों के लिए काम करने वाली बाल कल्याण समिति जिले के दानदाताओं और सेवाभावियों की ओर देख रही है कि उनमें से कुछ लोग इन बच्चों के पालनहार बनने के लिए आगे आएं तो हो सकता है कि कुछ बच्चों का भविष्य बेहतर बन सके।
सिर से उठा माता-पिता का साया,  क्या आप बनेंगे इनके  ' पालनहार '
सिर से उठा माता-पिता का साया, क्या आप बनेंगे इनके ' पालनहार '
क्या हैं इन बच्चों के लिए योजनाएं
1. मुख्यमंत्री बाल कल्याण योजना- इसके तहत 1 मार्च 2021 से 30 जून 2021 के बीच जिस बच्चे ने अपने माता-पिता दोनों को खोया हो, उसे 5 हजार रुपए प्रतिमाह की राशि दी जाएगी। यह राशि बाल कल्याण समिति द्वारा बच्चों के बनाए गए संरक्षक के खाते में हर माह पहुंचती है, साथ ही बच्चे के लिए खाद्यान्न और उसकी शिक्षा का खर्च सरकार उठाती है। लेकिन इस योजना के लिए समयावधि बहुत सीमित कर देने से अधिकांश बच्चों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।
2. पीएम केयर फॉर चिल्ड्रिन-इस योजना के तहत माता-पिता को खो चुके बच्चों को 10 लाख रुपए प्रति बच्चे के मान से देने का प्रावधान है, लेकिन यह राशि बच्चे के 18 वर्ष के पूरा होने पर ही देय होगी।
3.स्पांसरशिप योजना- इसके तहत दो तरह से बच्चे की मदद संभव है। एक योजना शासन के माध्यम से संचालित होती है, जिसमें माता-पिता या दोनों में से किसी एक के खो देने पर भी बच्चे को दो हजार रुपए प्रति माह देने का प्रावधान है। जबकि दूसरी योजना निजी व्यक्तियों और संगठनों के माध्यम से संचालित होना है, जिसमें कोई भी सेवाभावी या साधन संपन्न व्यक्ति अथवा संगठन एक या अअधिक बच्चों को कम से कम एक वर्ष के लिए परवरिश के लिए दो हजार रुपए प्रति माह के मान से राशि का भुगतान कर उस बच्चे के पालन पोषण का खर्च उठा सकता है।
50 बच्चे ऐसे जिन्होंने माता-पिता दोनों को खोया
जिला बाल कल्याण समिति ऐसे बच्चों के लिए काम कर रही है, जिनके सिर पर से माता-पिता या दोनों का साया उठ चुका है और जो अपनी परवरिश के लिए जूझ रहे हैं। इनमें से कई अपने ऐसे परिजनों के पास हैं, जो खुद अपने परिवार का पालन पोषण ठीक से करने में सक्षम नहीं हैं। समिति की मानें तो ऐसे करीब 48-50 बच्चे हैं जिनके माता-पिता दोनों अब इस दुनियां में नहीं हैं।
ये बने 146 बच्चों के पालनहार
जिले में माता-पिता या दोनों में से किसी एक को खो देने के कारण परवरिश के लिए जूझ रहे ऐसे 350 बच्चों में से 104 बच्चों को कैलाश सत्यार्थी फाउंडेशन, 40 बच्चों को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के प्रयासों से वेदांतु और 2 बच्चों को वस्त्र व्यवसायी घनश्याम बंसल ने मदद करने हाथ आगे बढ़ाया है। ये लोग इतने बच्चों को हर माह 2 हजार रुपए के मान से यानी 24 हजार रुपए सालाना की मदद कर रहे हैं। ये मदद अधिकतम कितने भी साल के लिए दी जा सकती है, लेकिन हर दानदाता को कम से कम 24 माह की मदद का संकल्प लेना जरूरी है।
सरकार से मात्र 50 बच्चों का बजट
सूत्रों की मानें तो योजना तो हर बच्चे की मदद की है, लेकिन शासन स्तर से 350 बच्चों में से मात्र 50 बच्चों के लिए बजट विदिशा जिले को मिला है। बाकी बच्चों को सहायता पहुंचाने के लिए बाल कल्याण समिति हर तरह से प्रयास कर रही है। लेकिन उनकी आवाज दूर तक नहीं जा पा रही। बाल कल्याण समिति को तलाश है ऐसे दानदाताओं और सेवाभावियों की जो कुछ-कुछ बच्चों की मदद के लिए आगे आएं और उनके पालनहार बने, ताकि अपने माता-पिता को खो चुके बच्चे भी धन अभाव के कारण पलने-बढऩे में कमजोर न रहें।
बाल कल्याण समिति लेती है निर्णय
ऐसे सभी बच्चों की जानकारी जिला बाल कल्याण समिति के पास सुरक्षित है, इस समिति के अध्यक्ष प्रेमसिंह धाकड़ हैं, जबकि डॉ पिंकेशलता रघुवंशी, रामपाल सिंह राजपूत, धर्मेंद्र मिश्रा और अनीता तिवारी इस समिति के सदस्य हैं। ये सभी अपने-अपने स्तर पर बच्चों की परवरिश के लिए मदद के लिए प्रयासरत हैं। दरअसल ऐसे बच्चों की जानकारी समिति के पास आने के बाद समिति इनका परीक्षण करती है और फिर केस तैयार करती है। सरकार से योजनाओं अथवा सेवाभावियों की पहल पर दी गई राशि से बच्चों को प्राथमिकता के आधार पर मदद की जाती है।
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वर्जन...
पिछले दो साल में जिले में 350 बच्चों ने अपने माता-पिता या दोनों में से किसी एक को खोया है। उनके सामने अब परवरिश का संकट है। पीएम केयर फॉर चिल्ड्रन का लाभ 18 वर्ष की आयु के बाद मिलेगा, स्पांसरशिप योजना में राज्य से जो राशि मिल रही है वह मात्र 50 बच्चों के लिए है, ऐसे में जिले के दानदाता और सेवाभावी आकर बच्चों की परवरिश में हाथ बंटाएंगे तो इनका भविष्य भी संवर सकेगा।
-प्रेमसिंह धाकड़, अध्यक्ष बाल कल्याण समिति विदिशा

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