दशहरा विशेष : इस जिले में जलते भी हैं और पुजते भी हैं रावण और मेघनाद

बुराई पर अच्छाई की जीत के पर्व दशहरे पर जानिए एक ऐसे जिले के बारे में जहां रावण और मेघनाद को बुराई का प्रतीक मानकर जलाया भी जाता है और उनकी पूजा भी की जाती है..

By: Shailendra Sharma

Published: 25 Oct 2020, 02:18 PM IST

विदिशा. पुरातन संस्कृति को अपने में सहेजे हुए विदिशा जिले की परंपराएं और मान्यताएं भी अनोखी हैं। दुनिया भर में जिस रावण और मेघनाद को बुराई के प्रतीक के रूप में मानकर उनके पुतले जलाए जाते हैं, वहीं विदिशा जिले के दो गांव ऐसे हैं जिनमें से एक में रावण तो दूसरे में मेघनाद की पूजा होती है। पूरे जिले में रावण का पुतला जलता है, कहीं कहीं रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले भी जलते हैं, लेकिन नटेरन तहसील का रावन गांव और कुरवाई तहसील का पलीता गांव इससे अलग है। यहां की मान्यताएं और परंपराएं अनूठी हैं। यहां राम पुजते हैं तो रावण और मेघनाद भी पुजते हैं। यहां रावण-मेघनाद के पुतलों का दहन नहीं होता। विशेष बात यह भी है कि जिले के इन दो ग्रामों की दूरी 150 किमी से ज्यादा है, लेकिन दोनों गांव में सर्वाधिक परिवार कान्यकुब्ज ब्राम्हणों के ही हैं जिनके बीच खूब रिश्तेदारियां भी हैं।

 

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रावन गांव में होगी रावण की पूजा
विदिशा जिले की नटेरन तहसील के गांव रावन में आज प्रसिद्ध रावण मंदिर में विशेष आयोजन होंगे। इस गांव के बुजुर्गो समेत सभी परिवार और बाहर बस गए लोग भी रावण बाबा के मंदिर पहुंचेंगे और रावण की प्रतिमा पर पुष्प, हल्दी, अक्षत और प्रसादी अर्पित करने के साथ ही रावण की नाभि पर शुद्ध घी का लेप करेंगे। ऐसी मान्यता है कि घी के लेप से रावण की नाभि को राम के अग्निबाण से हुई पीड़ा से राहत मिलती है। रावण बाबा की आरती होगी और रामधुन भी की जाएगी। ग्रामीण बताते हैं कि यह गांव कान्यकुब्ज ब्राम्हणों का है और यहां रावण को देवता मानकर उनकी पूजा की जाती है। वर्षों तक यहां रावण की प्रतिमा खुले चबूतरे पर पड़ी रही, लेकिन अब ग्रामीणों ने यहां मंदिर बना दिया है। यहां रावण की आरती के साथ ही रामायण पाठ और रामधुन भी होती है। यहां के ग्रामीण और यहां के परिवार अपने वाहनों पर जय लंकेश लिखवाते हैं।

 

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पलीता गांव में होगी मेघनाद की पूजा

वहीं दूसरी तरफ विदिशा जिले की ही कुरवाई तहसील के पलीता गांव में मेघनाद की पूजा होगी। जिला मुख्यालय से 70 किमी और मंडीबामोरा से 12 किमी दूरी पर बसा पलीता गांव मूल रूप से कान्यकुब्ज ब्राम्हणों के बाहुल्य वाला है। यहां सदियों से एक चबूतरे पर बाबा मेघनाद की पूजा होती है। यहां के ग्रामीण अपने आप को रावण-मेघनाद का वंशज मानते हैं। पलीता में एक स्तंभ को मेघनाद का स्वरूप मानकर उसकी पूजा की जाती है। दशहरे पर यहां विशेष पूजा होती है। ग्रामीण मेघनाद को यहां प्रथम पूज्य और ग्राम देवता के रूप में भी पूजा जाता है। गांव में पुरानी बावड़ी और कुछ प्राचीन भवनों अथवा मंदिरों के अवशेष भी मौजूद हैं। गांव के बुजुर्ग सरजू प्रसाद तिवारी बताते हैं कि हमारे पूर्वज यही कहते आए हैं कि हम कान्यकुब्ज ब्राम्हण परिवारों के लोग रावण के वंशज हैं, रावण के पुत्र मेघनाद थे, इसलिए वे भी हमारे पूर्वज ही हुए। सरजू प्रसाद बताते हैं कि रावण गांव की हमारे पलीता गांव से करीब 150 किमी की दूरी है, लेकिन रावण और पलीता दोनों गांव में कान्यकुब्ज ब्राम्हणों के परिवार ही ज्यादा हैं, रावण गांव में हम लोगों की रिश्तेदारियां भी बहुत हैं, यानी केवल प्रतिमाओं का ही नहीं बल्कि इन दोनों गांव में रोटी-बेटी के भी खूब संबंध हैं, जो हमारे वंशजों को प्रमाणित करते हैं। गांव में कोई भी शुभ काम मेघनाद की पूजा के बिना पूरा नहीं होता। नई बहू आए या किसी के यहां संतान जन्म ले सभी की पूजा मेघनाद के चबूतरे पर जरूर होती है, बाद में कोई रस्में निभाई जाती हैं। सरपंच राजेंद्र सिंह सहित ग्रामीण रामकृष्ण तिवारी, सचिन तिवारी, नीरज तिवारी, विकास तिवारी बताते हैं कि इस गांव की सदियों पुरानी परंपरा हैं कि कोई भी नया काम करने या नई मशीनें चलाने से पहले मेघनाथ महाराज की पूजन श्रीफल भेंट कर की जाती है। इसके बाद ही नया काम शुरू किया जाता है।

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