Interesting: यहां पड़े थे भगवान श्रीराम के चरण, कहलाता है चरण तीर्थ

ये चरण भगवान श्रीराम के हैं। अयोध्या से निकलकर जब प्रभु श्रीराम वनवास पर गए थे, तब उन्होंने विदिशा में कुछ वक्त बिताया था।

By: Manish Gite

Published: 24 Oct 2020, 03:49 PM IST


विदिशा/भोपाल। अपने वनवास के दौरान भगवान राम मध्यप्रदेश के कई क्षेत्रों से गुजरे थे। माना जाता है कि वे इस दौरान वे विदिशा से भी गुजरे थे, क्योंकि यहां भगवान के पदचिह्न हैं, जो आज चरणतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। शोधकर्ता आ भी इसी उधेड़बून में लगे रहते हैं कि जिन रास्तों से भगवान गुजरे थे, उन रास्तों को संरक्षित किया जाना चाहिए। आज भी लोगों के लिए अयोध्या से लेकर लंका तक का मार्ग शोध का विषय है।

patrika.com दशहरे के मौके पर आपको बता रहा है उस स्थान के बारे में जहां भगवान राम के चरण आज भी सुरक्षित हैं...।

 

जब भगवान श्रीरामचंद्र, सीता और लक्ष्मण जब अयोध्या से अपना राजपाट छोड़कर वनवास पर निकले थे वे उत्तर प्रदेश से लेकर लंका तक सैकड़ों स्थानों पर गए और कई स्थानों पर रुके थे। 14 वर्षों के वनवास के दौरान सैकड़ों ऐसे स्थान आज भी मौजूद हैं, जो तीर्थ बन चुके हैं। शोधकर्ता यह भी दावा करते हैं कि वनवास के दौरान भगवान विदिशा में भी कुछ समय के लिए रुके थे।

02.png

यहां के चरण तीर्थ के तस्वीर देख आपको यकीन न हो, लेकिन शोधकर्ता इसे सत्य मानते हैं। यहां मौजूद जो चरण है, वो भगवान श्रीराम के ही हैं। जब अयोध्या से प्रभु श्रीराम वनवास पर निकले थे, तब उन्होंने विदिशा में कुछ समय बिताया था। ये चरण त्रेतायुग के हैं और हजारों साल से ऐसे ही बने हुए हैं। विदिशा का यह स्थान आज का चरणतीर्थ है।


इतिहास में भी है इसका जिक्र

इतिहासकार निरंजन वर्मा कहते हैं कि त्रेता युग में भगवान राम ने अश्वमेघ यज्ञ किया था, तो विदिशा को शत्रुघ्न ने यादवों से युद्ध के बाद जीत लिया था। इसके बाद जब रामराज्य विभाजन का वक्त आया तो इस प्रदेश को महाराजा शत्रुघ्न के पुत्र शत्रुघाती को दे दिया गया। (इस तथ्य का जिक्र वाल्मिकी रामायण में भी मिलता है)। उस दौर के आसपास का प्रदेश दशार्ण तथा इसकी राजधानी विदिशा कहलाती थी, महर्षि वाल्मिकी से भी यह क्षेत्र जुड़ा माना जाता है।

 

245 साल पुराना है यह मंदिर

विदिशा से अशोकनगर मार्ग से होकर पवित्र बेतवा नदी गुजरी है। यहीं महाराष्ट्रीयन शैली के दो मंदिर हैं। इसी जगह को चरणतीर्थ कहा जाता है। चरणतीर्थ पर शिवजी के दो विशाल मंदिर भी बने हैं। इनमें से एक मंदिर मराठों के सेनापति और भेलसा के सूबा खांडेराव अप्पाजी ने 1775 में बनवाया था। दूसरा मंदिर उनकी बहन ने बनवाया था। दोनों मंदिरों शिवलिंग स्थापित किए गए थे।

 

भेलसा कहलाती थी यह जगह

भोपाल से महज 56 किमी दूर बसे विदिशा का पुराना नाम भेलसा था। यह नाम सूर्य के नाम भेल्लिस्वामिन के नाम पर था। संस्कृति साहित्य में विदिशा का प्राचीन नाम वेदिश या वेदिसा है। अंग्रेजी काल में भी यह शहर भेलसा के नाम से प्रचलित था, लेकिन 1952 में राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने शहर की जनता की मांग पर इस शहर का नाम विदिशा रख दिया।

 

 

चित्रकूट में भी भगवान आए थे

चित्रकूट के पास स्थित सतना जिले में अत्रि ऋषि का आश्रम था। वे चित्रकूट के तपोवन में रहते थे। श्रीराम कुछ समय के लिए वनवास के दौरान रुके थे। अत्रि ऋषि ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा हैं। अत्रि ऋषि की पत्नी का नाम है अनुसूइया, जो दक्ष प्रजापति की 24 कन्याओं में से एक थी। चित्रकूट की मंदाकिनी, गुप्त गोदावरी, छोटी पहाड़ियां, कंदराओं आदि से ही गुजरकर श्रीराम घने वन में चले गए थे।

Show More
Manish Gite
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned