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एक था गौड राजा मानसिंह, जिसने बनवाया था मानसरोवर

अब भी नहीं सहेजा ग्यारसपुर का मानसरोवर तो पन्नों में सिमट जाएगी ये कहानी

विदिशा

Updated: May 11, 2022 09:29:32 pm

विदिशा. गौड़ राजा मानसिंह द्वारा ग्यारसपुर में बनवाया गया तालाब मानसरोवर के नाम से जाना गया। यह इतिहास में अब भी दर्ज है। लेकिन विशाल मानसरोवर अब खत्म सा होकर कहानी बनता जा रहा है। यदि अब भी इसकी सुध नहीं ली गई तो आने वाले कुछ वर्ष में यह फिर खेतों में तब्दील होकर इतिहास के पन्नो का ही मानसरोवर रह जाएगा। मौजूदा हालात यह हैं कि तालाब के 10 बीघा से अधिक हिस्से में जलकुंभी का डेरा है। पंचायत ने गहरीकरण और घाट निर्माण के नाम पर खानापूर्ति इसी साल की है, लेकिन खत्म होते तालाब का कुछ भला नहीं हो पाया। यही हाल मानसरोवर जाने वाले रास्ते में पड़ने वाली परघय झील का है, यह भी देखभाल, सफाई और मरम्मत के अभाव में खत्म सी होती जा रही है और इसके साथ ही खत्म होता जा रहा है जल संरक्षण की संरचनाओं का एक बहुत अहम हिस्सा।
एक था गौड राजा मानसिंह, जिसने बनवाया था मानसरोवर
विदिशा. ग्यासपुर के मानसरोवर में अब जलकुंभी का डेरा है।
तत्कालीन कलेक्टर सुधा चौधरी ने दिया था जीवनदान

ग्यारसपुर का मानसरोवर तालाब जिले के सबसे महत्वपूर्ण, विशाल और खूबसूरत तालाबों में से एक माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में इस पर खूब खेती होने लगी थी। अब भी कुछ हिस्से में खेती होती है। लेकिन तत्कालीन कलेक्टर सुधा चौधरी ने इस तालाब को पुनर्जीवित करने के लिए जलाभिषेक अभियान चलाया और तालाब में खेती करने वालों को अलग-अलग जगह मुहैया कराकर तालाब को मुक्त कराया। ये 2003 की बात है जब सूखा राहत, जनभागीदारी और श्रमदान के जरिए तालाब का गहरीकरण कर उसे नया जीवन दिया गया। लेकिन इसके बाद उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया।
मानसरोवर की बदौलत रहता है बस्ती में पानी

मानसरोवर की बदौलत है कि ग्यारसपुर की बस्ती में जलस्तर ठीक ठाक बना हुआ है। बीच-बीच में कई बार जब यहां जलकुंंभी और गंदगी बढ़ी तो गांव के कुछ युवाओं ने श्रमदान के जरिए तालाब को साफ करने का काम शुरू किया, लेकिन यह सांकेतिक ही रहा। शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने इसमें रुचि नहीं ली, नतीजा मानसरोवर के लिए कोई पुख्ता और सकारात्मक काम नहीं हो सका।
मनरेगा से काम की खानापूर्ति हुई

हाल ही में 2020-21 में मनरेगा की करीब 9 लाख रुपए की राशि से इसका जीणोद्धार शुरू हुआ, इसमें घाटों का निर्माण और वेस्टवीयर के साथ ही गहरीकरण करना तय हुआ। पंचायत की मानें तो गहरीकरण और घाटों की मरम्मत हो चुकी है, लेकिन अभी वेस्टवीयर बनना बाकी है। लेकिन मौके पर हालात देखने से लगता नहीं कि इस प्रयास से भी मानसरोवर का कोई भला हुआ है। घाट अभी भी टेडे मेडे और खानापूर्ति की मरम्मत दिखाते नजर आते हैं। करीब आधे से मानसरोवर में जलकुंभी यहां स्नान करने की भी इजाजत नहीं देती। धीरे धीरे यह िस्थति और खराब होकर तालाब के अस्तित्व को मिटाने में मददगार बनेगी।
जलकुंभी हटाने के लिए राशि का रोना

मानसरोवर का कई बीघा हिस्सा इस समय जलकुंभी के शिकंजे में फँसा हुआ है। यहां स्नान करना भी अभी संभव नहीं है, घाट मरम्मत की खानापूर्ति हुई लेकिन यहां की गंदगी हटानें का कोई प्रयास नहीं हुआ। सरपंच का कहना है कि मनरेगा से कुछ काम कराया है, लेकिन जलकुंंभी हटाने के लिए राशि का कोंई प्रावधान नहीं है।
प्रशासन रुचि ले तो फिर जीवित हो सकता है मानसरोवर

ये दौर है जल संरचनाओं को सहेजने का, सरकार भी इसके लिए प्रयासरत है, लेकिन दुखद है कि मानसरोवर में कोई सकारात्मक पहल होती या इस तालाब को बचाने का कोई काम होता नजर नहीं आ रहा है। प्रशासन का ध्यान छोटी-छोटी और अनुपयोगी से संरचनाओं को बचाने की ओर है, लेकिन विशाल और प्राचीन ध्ररोहर के रूप में जो मानसरोवर दम तोड़ रहा है उसमें फिर से जान फूंकने कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है।
परघय झील में स्नान करने आती थीं किले की महिलाएं

मानसरोवर के मार्ग में ही किले से नीचे की ओर एक खास तरीके की जल संरचना दिखाई देती है। इसे स्थानीय लोग परघय झील के नाम से जानते हैं। यह वह झील है जिसके घाट किले से नीचे उतरने वाली सीढियों से आज भी जुड़े हैँं। युवा स्वदीप रघुवंशी बताते हैं कि राजाओं के समय किले में रहने वाले राजपरिवार की महिलाएं इन्हीं सीढि़यों के जरिए परघय झील में जाकर स्नान करती थीं और यहीं से पानी उनके स्नान के लिए किले में भी जाता था। लेकिन अब इस झील में भी पूरी तरह जलकुंभी और गंदगी है। स्वदीप बताते हैं कि मानसरोवर और झील के कारण ही यहां की बस्तियों में जल स्तर बना रहता है।----
वर्जन...

मानसरोवर में जलकुंभी बहुत है। मनरेगा से 2021-22 में ही 9 लाख रुपए की राशि से गहरीकरण, मरम्मत और वेस्टवीयर बनना है। गहरीकरण और मरम्मत हो चुकी है। वेस्ट वीयर बनना है। मानसरोवर का रिसाव भी रोकना है। लेकिन जलकुंभी का कोई हल नहीं है। इसके लिए किसी मद से राशि स्वीकृत होने का प्रावधान भी नहीं है।
-ओमवती लीलाधर कुशवाह, सरपंच ग्यारसपुर

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