उदयसागर घाट पर मौजूद है राजनर्तकी की प्रतिमा, चढ़ती है श्रंगार सामग्री

चुनरी और श्रंगार सामग्री चढ़ाकर पूजी जाती है यह प्रतिमा

By: govind saxena

Published: 12 Feb 2021, 05:47 PM IST

विदिशा. परमार राजा उदयादित्य ने नीलकंठेश्वर मंदिर ही नहीं बनवाया, बल्कि उन्हीं के नाम पर उदयपुर नगरी बसी और उन्होंने यहां बड़ा तालाब भी बनवाया था जो उदयसागर के नाम से मशहूर था। तालाब पर अब खेती होती है, लेकिन तालाब की मजबूत पार और उसकी सीढिय़ां काफी कुछ व्यवस्थित रूप में आज भी दूर तक दिखाई देती हैं। ऐसे ही एक घाट पर मौजूद है एक राजनर्तकी की प्रतिमा जिसे लोग बेडऩी माता के नाम से पूजने लगे हैं।


उदयपुर में प्राचीन मनकामनेश्वर गणेश मंदिर के ठीक सामने से एक पगडंडी नुमा कच्चा रास्ता है जो आगे चलकर खेतों और उसकी मेड़ में तब्दील हो गया है। यह रास्ता पहले झिलीपुर जाता था। इसी पगडंडी और खेतों में से होकर करीब 1 किमी दूर जाकर उदयसागर पर पहुंचते हैं, लोग उदयसागर को अब उदयपुर का बड़ा तालाब कहने लगे हैं। यहां कुछ ही समय के लिए पानी रहता है, अधिकांश दिनों में यहां खूब खेती होती है। लेकिन तालाब की पार दूर तक दिखाई देती है। बड़े बड़े पत्थरों की शिलाओं से बनी सीढिय़ां सदियों बाद भी जमी और व्यवस्थित दिखती हैं। ग्रामीण बताते हैं कि तालाब में नीचे तक सौ सीढिय़ां थीं, हालांकि खेती के कारण तालाब अब पुर चुका है और यही कारण है कि सीढिय़ां भी कम ही बची हैं।


झिलीपुर की ओर जाने वाली पगडंडी और तालाब के बीच ऊपर घाट पर पत्थर की एक करीब 5 फीट की पत्थर की प्रतिमा मौजूद है। यही प्रतिमा बेडऩी माता के नाम से पूजी जाने लगी है। राजनर्तकी की इस प्रतिमा को ग्रामीणों ने देवी मानते हुए आस्था के चलते पूरी तरह सिंदूर से पोत रखा है, पत्थर की होने के बावजूद इसके कानों में बाली, आंखों में काजल, पैरों में महावर लगाकर प्रतिमा पर चुनरी चढ़ाई जाती हैं। चूडिय़ों सहित पूरी श्रंगार सामग्री इस प्रतिमा पर श्रद्धालु महिलाएं चढ़ाती हैं। यहीं कुटी बनाकर रहने वाले रामचरण दास बाबा बताते हैं कि यह बेडऩी माता की प्रतिमा है और इसे पूरी श्रंगार सामग्री के साथ महिलाएं पूजती हैं। वे बताते हैं कि महल से यह बेडऩी(राजनर्तकी) एक बार अपनी तंत्र मंत्र की शक्तियों के चलते सारी बाधाओं को बांधकर डोरे पर नृत्य करते हुए सरोवर को पार करने निकली थी, लेकिन वह एक रॉंपी को बांधना भूल गई थी, वह बीच तालाब में पहुंची ही थी कि रास्ते में उस रांॅपी से किसी ने डोरे को काट दिया जिससे वहीं गिरकर उसकी मृत्यु हो गई। बाद में उसकी प्रतिमा की यहां पूजा होने लगी। तालाब के किनारे ही हनुमान जी की मढिय़़ा है और उससे लगा हुआ एक बड़ा परिसर जिसमें नमाज अदा की जाती है। यहां कुछ समय पूर्व ही पत्थरों से नवनिर्माण दिखाई देता है।


राजा उदयादित्य द्वारा निर्मित विशाल उदयसाागर और तमाम बावड़ी कुओं के बावजूद लगातार उपेक्षा और सरकारी उदासीनता के कारण उदयपुर अब पानी की बूंद बूंद की किल्लत झेलता है। उपेक्षा के दौर में तालाबों, बावडिय़ों और कुओं का यह नगर अब बूंद-बंूद पानी को तरसता है, लेकिन प्रशासन और शासन के नुमाइंदों ने इस ओर मुडकऱ भी नहीं देखा।

govind saxena Bureau Incharge
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