इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पहली बार सांकेतिक उदयगिरी परिक्रमा

कोरोना के कारण 36 वर्ष बाद आज फिर सांकेतिक उदयगिरी परिक्रमा, नहीं लगेगा मेला

By: govind saxena

Published: 22 Nov 2020, 08:59 PM IST

विदिशा. सच है कि इतिहास खुद को दोहराता है। 130 वर्ष की उदयगिरी परिक्रमा की परंपरा में यह दूसरा मौका है जब सांकेतिक परिक्रमा की अनुमति लेना पड़ी है, अन्यथा तमाम मंदिरों के निशानों के साथ सैंकड़ों लोग उदयगिरी परिक्रमा और मेले में शामिल होते थे। 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद बने हालात के कारण कफ्र्यू था और उस दौरान पड़ी अक्षय नवमी पर परिक्रमा संभव नहीं थी, लेकिन परंपरा कायम रहे इसलिए परिक्रमा से जुड़े 5-7 लोग जाकर परिक्रमा और पूजन करके आए थे। इस बार भी यही स्थिति है, कोरोना संक्रमण ने परिक्रमा रोकना चाही थी, लेकिन प्रशासन और रामलीला मेला समिति के बीच हुई चर्चा के बाद सांकेतिक परिक्रमा का फैसला हुआ। परंपरा को निभाने 23 नवंबर सुबह 9 बजे चौपड़ा स्थित रामलीला के प्रधान संचालक पं. चंद्रकिशोर शास्त्री के निवास से सात मंदिरों के निशानों के साथ यह परिक्रमा निकलेगी। मेला नहीं लगेगा। परिक्रमा के दौरान टेम्परेचर गन और मास्क का इंतजाम किया गया है। सभी से सुरक्षित दूरी बनाए रखने का भी अनुरोध किया गया है।

गोवर्धन पर्वत जैसी मान्यता है उदयगिरी परिक्रमा की
गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा दुनियां भर में विख्यात है, लेकिन विदिशा में उदयगिरी की परिक्रमा का भी उसी के जैसा महत्व है। अक्षय नवमी पर एक बार इस पहाड़ी की परिक्रमा से हजार परिक्रमाओं का पुण्य प्राप्त होता है। 130 वर्ष से हर अक्षय नवमी पर होने वाली यह उदयगिरी परिक्रमा विदिशा के धर्म, संस्कृति और इतिहास की त्रिवेणी मानी जाती है।

1890 में हुई थी शुरूआत
करीब 21 किमी का फेरे वाली यह उदयगिरी परिक्रमा 1890 में रामलीला मेला समिति के प्रथम प्रधान संचालक पं. विश्वनाथ शास्त्री ने अपने चंद शिष्यों और शहर के कुछ लोगों के साथ शुरू की थी। तब से अनवरत यह परिक्रमा क्षेत्र की परंपरा बन गई। बैसनगर और उदयगिरी का ही अधिकांश क्षेत्र इस परिक्रमा में शामिल है। मंदिरों के ध्वजों को इसमें शामिल करके जहां इसे विशुद्ध धार्मिक रूप दिया गया है, वहीं नृसिंह शिला पर कवि सम्मेलन के जरिए इसे साहित्य से जोड़ा गया है, क्षेत्र की धरोहर के अवलोकन और उससे लोगों को जोडऩे की यह परिक्रमा हमें संस्कृति से भी जोड़ती है।

1984 में कफ्र्यू में भी निभाई थी परंपरा
रामलीला मेला समिति के पूर्व सचिव सुरेश शर्मा शास्त्री बताते हैं कि 130 वर्ष पहले शुरू हुई उदयगिरी परिक्रमा में यह दूसरा व्यवधान है, लेकिन परंपरा का निर्वहन नहीं रुका। 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद बने हालात के कारण कफ्र्यू लगा था, उस दौरान परिक्रमा संभव नहीं लग रही थी। किसी तरह कलेक्टर और एसपी से बात कर केवल एक ध्वज निशान लेकर 5-7 लोग परिक्रमा पर निकले थे, साथ में 5 पुलिसकर्मी भी भेजे गए थे। परिक्रमा पूरी कर सभी मंदिरों में पूजा कर वापस आए थे।

govind saxena Bureau Incharge
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