सदियों से दिल्ली में कुतुबमीनार के साथ खड़ा है विदिशा का लौह स्तंभ

दिल्ली के महरौली में कुतुबमीनार के पास विदिशा का लौह स्तंभ

By: govind saxena

Published: 26 Sep 2020, 08:31 PM IST

विदिशा. दिल्ली में घूमने जाएं और कुतुबमीनार देखें तो पास ही शान से खड़े लौह स्तंभ को देख कर यह गर्व भी करें कि यह हमारे विदिशा का ही है। इस स्तंभ को 11 वीं शताब्दी या फिर करीब 800 वर्ष पहले उदयगिरी से ले जाया गया था। करीब 24 फीट का यह लौह स्तंभ बिना क्षतिग्रस्त और जंग लगे यहां अपने निर्माण की मजबूती की गवाही दे रहा है और यह भी बताता है कि विदिशा कभी लौह कला में कितना निपुण था। पास ही लगा शिलालेख यह भी गवाही देता है कि चौथी शताब्दी में चंद्रगुप्त मौर्य के समय इसे उदयगिरी में भगवान विष्णु के स्तंभ के रूप में स्थापित किया गया था। लेकिन बाद में इसे दिल्ली लाया गया।
दिल्ली के महरौली क्षेत्र में स्थित कुतुबमीनार के पास ही मौजूद इस लौह स्तंभ का परीक्षण कई बार वैज्ञानिक भी कर चुके हैं कि इसमें जंग क्यों नहीं लगती? इस स्तंभ पर ब्राम्ही लिपि में 33 इंच लंबी और 10 इंच चौड़ी पट्टी पर लेख है, जिसका अनुवाद पास ही अंग्रेजी में किया गया है। शिलालेख में है कि भगवान विष्णु के ध्वज को दर्शाता हुआ यह स्तंभ राजा चंद्र जिन्हें राजा चंद्रगुप्त द्वितीय कहा जाता है ने 375-413 ने निर्माण कराया होगा। (यहां बताना जरूरी है कि उदयगिरी की गुफाएं राजा चंद्रगुप्त द्वितीय के समय चौथी शताब्दी की ही बनी हैं और यहां भगवान विष्णु की विशाल वराह अवतार प्रतिमा तथा शेषाशायी विष्णु इस बात का प्रमाण है कि चंद्रगुप्त भगवान विष्णु का बड़ा भक्त था)। एक अन्य सूचना पट में वर्णित है कि प्रसिद्ध लौह स्तंभ 11 वीं शताब्दी के दौरान राजा अनंतपाल इसे विदिशा की उदयगिरी से दिल्ली लाए। एक संंभावना के तौर पर इसे इल्तुतमिश द्वारा 1233 में उदयगिरी विदिशा से दिल्ली लाए जाने का उल्लेख है। कब लाया गया, कौन लाया, इसका सच जो भी हो, पर इतना तय है कि यह लौह स्तंभ विदिशा में ही निर्मित और उदयगिरी पहाड़ी से ही ले जाया गया था। आरजीपीवी के संस्थापक कुलपति प्रो.प्रीतमबाबू शर्मा लिखते हैं कि कुतुबमीनार में लौह स्तंभ विदिशा से लाया गया था, यह गर्व की बात है। मेरा मत है कि लोहांगी पहाड़ी के नाम से पता चलता है कि विदिशा लोहे के लिए प्रसिद्ध था। विदिशा की प्रसिद्ध तोपें और यह स्तंभ इस बात की पुष्टि करते हैं कि विदिशा लौह परिष्करण, शुद्धीकरण के लिए प्रसिद्ध था। आयरन फाउंड्री, वह भी ऐसी कि जंग मुक्त लोहे का निर्माण करती हो। विदिशा के प्रो. आशुतोष दातार ने भी दिल्ली प्रवास के दौरान कुतुबमीनार पर जाकर जब विदिशा का यह लौह स्तंभ देखा तो गर्व का अनुभव साझा किया था। प्रो. दातार ने उस शिलालेख का अनुवाद करते हुए लिखा है कि कुतुबमीनार महरौली की कुव्वालूल इस्लाम मस्जिद के परिसर में स्थित प्रसिद्ध लौह स्तंभ पर गुप्त कालीन ब्राम्ही लिपी में उत्कीर्ण लेख से यह स्थापित होता है कि लौह स्तंभ चौथी सदी का है। लौह स्तंभ के शिखर की बनावट भी इसके चौथी सदी के होने को प्रमाणित करते हैं।

govind saxena Bureau Incharge
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