विदिशा के जिला शिक्षा अधिकारी का हौंसला...

दोनों किडनी खराब, हफ्ते में दो बार डायलिसिस, फिर भी रोज पहुंचते हैं ऑफिस

By: govind saxena

Published: 11 Jun 2021, 09:19 PM IST

विदिशा. मामूली बुखार या चोट पर हफ्ते भर की छुट्टी लेकर या बहाने बनाकर मेडिकल लीव लेने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए ये मिसाल है। जिला शिक्षा अधिकारी अतुल मुद्गल की पिछले दस साल से दोनों किडनी खराब हैं। डॉक्टर के परामर्श पर वे हफ्ते में दो बार डायलिसिस कराते हैं, लेकिन जैसे उनके शब्दकोश में रुकना और थकना जैसे शब्द ही नहीं, इसलिए वे डायलिसिस के बाद भी घर पर आराम करने के बजाय डायलिसिस सेंटर से सीधे ऑफिस चले आते हैं सरकारी कामकाज निपटाने। ये हौंसला कैसे? वे कहते हैं कि बीमारी को शरीर में ही रहने दो, दिमाग पर मत लो, दिमाग पर लोगे तो संकट बढ़ेगा। इलाज कराएं, दवा खाएं और आगे बढ़ें, रुकना मना है। सरकार ने जिस काम के लिए हमें रखा है, वह भी जरूरी है। मुद्गल की ये मिसाल पूरे शिक्षा विभाग में जानी पहचानी है। हर कर्मचारी, शिक्षक उनके इस जज्बे को सलाम करते हैं।

मुद्गल बताते हैं कि 2009 में मलेरिया हुआ था उसके उपचार के दौरान दवाओं का ओवरडोज हो गया, जिससे शरीर में कुछ अड़चन सी महसूस होने लगी। उस समय मुदगल शासकीय हायर सेंकंडरी स्कूल बरेठ में प्राचार्य थे, सरकारी काम से उन्हें हाइकोर्ट ग्वालियर जाना था, वहां उन्होंने अपने भाई को ये प्रॉब्लम बताई तो उन्होंने अस्पताल में दिखाया। तमाम जांच हुईं और कहीं कोई रोग पकड़ में नहीं आया। फिर सोनोग्राफी भी बची थी वह भी कराने का तय किया। सोनोग्राफी रिपोर्ट आई, जिसमें दोनों किडनी फेल बताते हुए तत्काल दिल्ली जाने को कहा। मुद्गल ग्वालियर से अपने भाई के साथ सीधे दिल्ली चले गए, वहां भी जांच कराई तो विशेषज्ञों ने दो ही विकल्प दिए। या तो किडनी ट्रांसप्लांट कराएं या फिर हर हफ्ते में दो बार अनिवार्य रूप से डायलिसिस कराएं। मुद्गल ने किडनी ट्रांसप्लांट कराने में सक्षम थे, लेकिन उन्होंने यह कहकर इंकार कर दिया कि अपने शरीर के लिए दूसरे के शरीर को संकट में डालने का कोई अर्थ नहीं। इसलिए किसी दूसरे की किडनी का उपयोग तो नहीं करूंगा। इसके बाद से पहले दिल्ली, फिर ग्वालियर, भोपाल में कुछ समय तक डायलिसिस कराई। सौभाग्य से इसके बाद विदिशा में ही डायलिसिस की सुविधा शुरू हो गई और पिछले करीब 10 वर्ष से वे हर ह$फ्ते में दो बार डायलिसिस करा रहे हैं। दोनों किडनी खराब हो जाने का पता चलने और हफ्ते में दो बार डायलिसिस शुरू होने के बाद भी मुदगल ने हार नहीं मानी और इसी दौरान उन्होंने उपसंचालक शिक्षा पद के लिए हुई पीएससी की परीक्षा दी, जिसमें सामान्य वर्ग के तीन पद ही थे, जिसमें से एक पद पर वे चयनित कर लिए गए। हालांकि इस बीच वे प्राचार्य का काम बखूबी संभालते रहे। बोर्ड परीक्षाओं के दौरान मुदगल को कहीं भी केंद्राध्यक्ष बनाकर भेजा गया, उन्होंने कभी अपनी ड्यूटी न तो कैंसिल कराई और न ही सेंटर बदलवाया। वे कहते हैं जहां आपकी ड्यूटी लगाई गई है, वही स्थान सबसे ज्यादा मुफीद है, वहां भी तो कोई काम करेगा, फिर आप क्यों नहीं?


ऐसे में तो कई बार आपको ऑफिस से छुट्टी लेना पड़ती होगी?ï काम प्रभावित होता होगाï? मुद्गल कहते हैं कि किस बात की छुट्टी। मंगलवार और शनिवार के दिन तय कर रखे हैं डायलिसिस के, सुबह 8 बजे डायलिसिस सेंटर पहुंच जाता हूं, करीब तीन-साढ़े तीन घंटे लगते हैं वहां, डायलिसिस के बाद सीधे ऑफिस पहुंच जाता हूं, दिन भर काम निपटाकर शाम को 6-7 बजे घर पहुंच जाते हैं। इसमें न तो अवकाश की जरूरत है और न ही काम प्रभावित होता है। हां, कभी कभी थकान जरूर हो जाती है, लेकिन यह तो जीवन है। मुद्गल बताते हैं कि लंबी छुट्टी क्यों? केवल बेटी की शादी में अवकाश लिया था, इसके अलावा याद नहीं कभी आठ दिन की भी छुट्टी ली हो।


मुद्गल कहते हैं कि शरीर है तो व्याधियां भी लगी रहेंगी। कोई बीमारी है तो इलाज कराएं, दवाएं खाएं और आगे बढ़ जाएं। रुकेंगे और उसी के बारे में सोचते रहेंगे तो सारे काम प्रभावित होंगे। सबसे ज्यादा जरूरी यही है कि बीमारी को दिमाग पर हावी न होने दें, खुश रहें और अपने सब काम सामान्य तरीके से करते चलें तो कभी कष्ट नहीं होगा।

govind saxena Bureau Incharge
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