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ये लापरवाही नहीं, अपराध है सरकार

पुल के सरिए, गड्ढे और सडक़ों का अतिक्रमण बन सकता है जानलेवा

विदिशा

Published: November 29, 2021 09:02:47 pm

विदिशा. लंबे समय तक जनसमस्याओं की अनदेखी लापरवाही नहीं, अपराध कही जाती है। खासकर वो समस्याएं, जिनसे किसी व्यक्ति का जीवन और उसकी सुरक्षा जुड़ी हो। बारिश के पहले से बेतवा पुल के सरिए निकल रहे हैं। पुल पर बड़े बड़े गड्ढे हो रहे हैं, लेकिन हमेशा उस पर आश्वासन का थेगड़ा लगाया जाता है। कभी इसे दुरुस्त करने के बारे में गंभीरता नहीं दिखाई गई। यही कारण है कि तत्कालीन कलेक्टर डॉ पंकज जैन के कहने पर मप्र सडक़ विकास निगम, लोनिवि और नपा की टीम ने यहां मौका मुआयना भी किया और फिर तीन दिन में दुरस्त करने का वादा करके हवा हो गए। अक्टूबर में फिर नगरपालिका सीएमओ ने शहर की सडक़ों की दशा सुधारने के लिए दीपावली के बाद काम शुरू करने को कहा लेकिन दीपावली तो क्या पूरा कार्तिक मास निकलने के बाद भी सीएमओ की दीपावली नहीं आई। रोजाना सैंकड़ों लोग इस रोड से निकलकर गड्ढों और सरियों से बचने का प्रयास कर रहे हैं, कई बार सरियों और गड्ढों के कारण दुपहिया और तीन पहिया वाहन असंतुलित होकर गिर भी रहे हैं और लोग घायल भी हो रहे हैं। लेकिन यह सब प्रशासन के नुमाइंदों को नहीं दिख रहा। किसी दिन जब यहां कोई वाहन पलटकर या दुर्घटनाग्रस्त होकर अप्रिय स्थिति सामने लाएगा तब अधिकारियों की आंखें खुलेंगी और फिर इसका काम होगा। लेकिन इसे अधिकारियों की लापरवाही नहीं, बल्कि अपराध माना जाना चाहिए, जिनकी अनदेखी के कारण घटना होगी। यही हाल रामलीला के मुख्य द्वार से लेकर पुल के पास तक का है। यहां गिट्टी की चूरा ओर धूल वाहनों के साथ लोगों की आंखों में भरकर उन्हें परेशानी में डाल रही है, इस रोउ की भी तो मरम्मत होना थी, लेकिन अधिकारियों को इससे क्या फर्क पड़ता है, उनकी आदत में तो हमेशा से लेतलाली और रोजमर्रा की बातें समझकर इन्हें टालना ही शुमार है। हादसा होगा तो भी क्या, केवल नोटिस मिलेगा और जांच के नाम पर लीपापोती कर दी जाएगी। ये सब वे अच्छे से जानते हैं, इससे ज्यादा और अधिकारियों का हो भी क्या सकता है। शायद यही गुमान हालात बद से बदतर करने के लिए जिम्मेदार भी हैं।
यही हाल अतिक्रमण को लेकर है। साल-छह माह में चार-छह दिन के लिए प्रशासन को अतिक्रमण हटाने की सुध आती है, एनाउंस होता है, यातायात पुलिस के साथ साहब बाजार में निकलते हैं, कुछ अस्थाई सामान को हटवाकर हिदायत की खानापूर्ति होती है, कभी कभार व्यापारियों को हद में रखने के लिए सडक़ पर लाइन डाल दी जाती है, और फिर सब खामोश हो जाते हैं। बाजार में व्यापारियों को भी पता है प्रशासन का यह मात्र दिखावा है, कुूछ करने की इच्छाशक्ति किसी में नहीं। माधवगंज के वर्षों पुराने चबूतरे तोडऩे जैसा साहस बार-बार नहीं हुआ करता। मालवीय उद्यान, पुराने माल गोदाम जैसे स्थानों पर हाथ ठेलों और सब्जी वालों सहित तमाम लोगों को शिफ्ट करने की मुहिम कितनी ही बार चल चुकी, लेकिन बाजार, सडक़ और चौराहों का हाल नहीं बदल सका।
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