कभी गोबर थी यहां की पहचान अब उन्नत खेती के लिए जाना जाता है ये गांव ?

धीरे-धीरे विकास की रफ्तार पकड़ रहा गांव, उन्नत खेती के लिए बना रहा अपनी पहचान..

By: Shailendra Sharma

Published: 02 Sep 2020, 05:56 PM IST

विदिशा. उन्नत खेती के लिए प्रदेश ही नहीं बल्कि देश में अपनी नई पहचान बनाने वाले गांवों की श्रेणी में एक गांव है विदिशा जिले का गोबरहेला गांव। विदिशा जिले से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर बसा करीब 900 की आबादी वाला गोबरहेला गांव की पहचान पुराने समय में गोबर के बड़े बड़े टीलों के कारण होती थी और इसी के कारण गांव का नाम पड़ा था गोबहेला लेकिन अब गांव के किसानों के नवाचार ने गांव की पहचान को बदल दिया है और अब अब गोबरहेला गांव को उन्नत खेती के लिए जाना जाने लगा है। गांव में उन्नत खेती के कारण गांव के एक किसान को शासन की ओर से विदेश यात्रा का भी मौका मिला और सम्मान भी। अब धीरे-धीरे यह गांव विकास की रफ्तार भी पकड़ रहा है।

 

गांव के गौरव किसान बृजकिशोर राठी
गोबरहेला गांव के किसान बृजकिशोर राठी को अगर गांव का गौरव कहा जाए तो ये अतिश्योक्ति नहीं होगी। हमेशा नए नए बीजों का प्रयोग कर खेती करने वाले किसान बृजकिशोर के नवाचारों से ही प्रेरित होकर अब गांव के दूसरे किसान भी खेती में नवाचार की राह अपना रहे हैं और गांव में बड़े पैमाने पर उन्नत खेती हो रही है। खुद उन्नत केती कर दूसरों को भी रास्ता दिखाने वाले किसान राठी बताते हैं कि गांव की ताकत है एक-दूसरे का सम्मान और सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ देना।राठी अश्वगंधा की खेती कर चुके हैं और हमेशा नए-नए बीजों का प्रयोग खेती में करते हैं। आवले के 125 पेड़ों का उनका अपना बगीचा है। चना, गेहूं, सोयाबीन, धान की फसल के साथ ही इस बार उन्होंने करीब 6 बीघा में तुलसी की पौध भी लगाई है। आधुनिक तरीकों को अपनाकर उन्नत खेती करने वाले किसान बृजकिशोर राठी को सरकार की भी सराहना मिली। कृषि वर्ष 2018 में उन्हें शासन की ओर से हॉलैंड व इजराइल जाने का मौका मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गांधी नगर में उन्हें उस समय उत्कृष्ट किसान के रूप में सम्मानित कर चुके हैं जब वो गुजरात के सीएम थे। राठी बताते हैं कि गांव के अन्य किसानों को भी वे खेती के तरीके बताते हैं और इसका लाभ गांव के किसान ले रहे हैं। उनका जनता के प्रति सहयोगात्मक व्यवहार ही रहा कि वे जनपद सदस्य भी रह चुके हैं।

बुजुर्ग बताते हैं गांव का इतिहास
गांव के बुजुर्ग लोगों का कहना है कि ग्वालियर रियासत के समय यहां एक बड़ा तालाब निर्मित हुआ। करीब 300 बीघा में इसमें पानी भराता था। एक बावड़ी भी थी, लेकिन समय के साथ-साथ तालाब सिमटता गया। बावड़ी भी खत्म होकर कुएं के रूप में अपने अस्तित्व होने का एहसास कराती दिखाई दे रही है। तालाब इसलिए सिमटता जा रहा कि तालाब में निजी जमीन भी है वहीं साल 1965 की बाढ़ ने इस तालाब की पार को ध्वस्त कर दिया और इसके बाद फिर ऐसे जनप्रतिनिधि व अधिकारी नहीं मिले जो पानीदार हो। फलस्वरूप तालाब सिमटता गया और फिर गांव में हैंडपंप आ गए जमीन से पानी उलीचने वाले नलकूप खुदने लगे इससे बावड़ी का अस्तित्व भी खत्म हो गया, लेकिन गांव की खासियत यह भी कि बावड़ी की मौजूदगी से लोगों में जो आपसी प्रेम व सद्भाव था वह खत्म नहीं हुआ। गांव के लोग आज भी मिलजुल कर रहते हैं और एक-दूसरे की मदद में आगे रहते हैं।

यह है गांव की खासियत
-गांव में 21 समाज के लोग रहते हैं लेकिन सभी में आपसी भाईचारा है। गांव वाले सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ निभाते हैं।
-गांव में खेती रकबा करीब 648 हैक्टेयर है और जमीन ऐसी है कि प्रति हैक्टेयर 55 से 60 क्विंटल होती है पैदावार जो जिले में अन्य स्थानों से ज्यादा है।

-खेती में कुछ नयापन करने की रुचि हर किसान में है। यही कारण कि गांव में आधुनिक खेती भी किसान करते हैं और 120 घरों के इस गांव में 35 ट्रेक्टर हैं।
-मध्यभारत के मुख्यमंत्री तखतमल जैन के समय यहां प्राथमिक स्कूल भवन बना और अब माध्यमिक स्कूल के बाद हाई स्कूल भी है।

 

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