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स्वच्छता अभियान में नदियां कब होंगी शामिल

विदिशा मेंं बेतवा, गंजबासौदा में पारासरी और सिरोंज मेें कैथन बेहाल

विदिशा

Published: December 07, 2021 10:02:45 pm

विदिशा. स्वच्छता अभियान में शहर की सफाई पर ही फोकस है, लेकिन शहर के बीचों बीच नदियों को पूरी तरह अनदेखा किया जा रहा है। नागरिकों के साथ ही नगरपालिकाओं की लापरवाही से नदियां नालों में तब्दील हो रही हैं और नगरों में स्वच्छता सर्वेक्षण का ढिंढोरा पिट रहा है। लापरवाह लोग तो नदियों को नाला बनाने के लिए जिम्मेदार हैं ही, कई जगह के नगरीय निकाय और प्रशासन भी इस गंभीर लापरवाही का जिम्मेदार है। अक्सर देख लें, जहां मानव का दखल ज्यादा नहीं, वहां नदियां सदानीरा और साफ सुथरी नजर आएंगी। लेकिन जहां मानव की पहुंच है, जहां उसकी बस्ती बस गई, जहां उसका आना-जाना बढ़ गया, वहां नदियों को नाले में तब्दील होने में देर नहीं लगी। यही कारण है कि शहरों के बीच से निकली नदियां अक्सर भयानक प्रदूषण का शिकार होकर नदी से नालों में तब्दील हो गईं हैं। जिन नदियोंं का पानी ईश पूजा, अभिषेक और आचमन में होता था, उनका पानी अब इस योग्य तो क्या उनके किनारे दुर्गन्ध के कारण खड़े होने लायक भी नहीं बचे। जिले में विदिशा में चोरघाट नाला, जतरापुरा नाला और रामलीला के पीछे से निकला नाला बेतवा में गंदगी उड़ेल रहा है। गंजबासौदा में व्यापारियों के साथ ही नगरपालिका ने पारासरी को बर्बाद कर दिया। वहीं सिरोंज में कैथन नदी बीच शहर में ही गंदे नाले की तरह सिमटकर दुर्गन्ध का सबब बनी हुई है।
स्वच्छता अभियान में नदियां कब होंगी शामिल
स्वच्छता अभियान में नदियां कब होंगी शामिल

विदिशा: प्रशासनिक अकर्मण्यता की बलि चढ़ रहा श्रमदान
विदिशा में बेतवा उत्थान समिति के साथ ही श्रमदानियों के कुछ अन्य समूह भी पूरे समर्पण भाव से वर्षों से किसी न किसी तर नदी और नदी तट पर सतत श्रमदान कर रहे हैं, यही कारण है कि अब कुछ घाट साफ सुथरे दिखने लगे हैं, लेकिन प्रशासनिक अकर्मण्यता के कारण इनका श्रमदानियों का श्रम, समर्पण और वक्त सब बलि चढ़ रहा है। चोर घाट और ऐसे ही अन्य नालों की समस्या का जैसे प्रशासन के पास कोई हल नहीं। हां, इसके नाम पर लाखों रूपए खर्च जरूर हो चुके हैं। नेताओं और अधिकारियों का सम्मान भी खूब हो गया, लेकिन चोर घाट नाले की गंदगी को रोकने वाली धार बेतवा में मिलने से कभी नहीं रुक सकी। इस समय भी तमाम गंदगी और दुर्गन्ध को समेटे इस नाले का अपशिष्ट बिना उपचार के सीधे ही बेंतवा में मिल रहा है। जहां बेतवा में इस नाले का मिलन होता है, वह दूश्य अत्यंत दुखद और चिंताजनक है। लेकिन न तो प्रशासन की वहां तक पहुंच है और न ही समस्या के हल की इच्छाशक्ति। इसी तरह रामलीला परिसर के पीछे से गोपाल कृष्ण गोशाला के पास से निकली शहर की गंदगी पुराने पुल के पास मुक्तिधाम के रास्ते में नीचे से समाकर चरणतीर्थ की ओर बढ़ती है। शनिमंदिर के आसपास बसी बस्ती की तमाम गंदगी पुराने पुल के नीचे डायवर्ट कर दी गई है। किसी को न तो शर्म और न ही ही पर्यावरण के बर्बाद करने का पाप करने का डर। बस, श्रमदानियों की दिनचर्या है और तीज त्यौहार पर घाटों और नदियों पर होने वाली गंदगी को साफ करने का क्रम। श्रमदानियों के हाथ में जितना है, उससे ज्यादा वे कर रहे हँ, लेकिन प्रशासन की लापरवाहियों से नदी में नालों का मिलना नहीं रुक पा रहा।
गंजबासौदा शहर में खत्म सी हो गई पारासरी
गंजबासौदा शहर के बीचों बीच से निकली पारासरी पिछले करीब 3-4 दशक में बुरी तरह प्रभावित हुई है। पुराने मेला ग्राउंड के बाजू से निकली इस नदी में सब्जी-फल के थोक व्यापारियों द्वारा सड़े गले सामान इसमें उड़ेले जाते रहे, फिर मेले के कारण भी यहां तमाम गंदगी उड़ेली जाती रही। इसके साथ ही यहां अतिक्रमण के बोलबाले ने नदी को खत्म सा कर दिया। इसे अपराध नहीं तो क्या कहा जाएगा कि खुद नगरपालिका ने पचमा बायपास पर पारासरी पुलिया से सटकर सिंधी कॉलोनी के पास कचरा डंपिंग सेंटर बना दिया और शहर की कचरा ट्रालियां यहां तमाम गंदगी उड़ेलनी लगीं। इससे नदी खत्म होती जा रही है। यहां का कचरा मवेशियों, हवा-आंधी में उडकऱ सीधे नदी में समाता है। इसी तरह नागरिक बैंक के पास भी पारासरी नदी नाले में तब्दील नजर आती है।
सिरोंज: नगर में कैथन नदी का सिर्फ नाम ही रह गया
सिरोंंज में कैथन नदी पर बांध बनने से नगर की पानी की समस्या तो हल हो गई, लेकिन बांध के बाद की नदी जो शहर के बीचों बीच से निकलती है, वह खत्म सी हो गई। अब यहां गंदे पानी के डबरे ही कहीं-कहीं भरे और दुर्गन्ध उड़ाते नजर आते हैं। सिरोंज का पवित्र स्थल माना जाने वाला पचकुंइया भी अब भारी गंदगी से प्रदूषित है। इस क्षेत्र में कभी कैथन पूरे प्रवाह से बहती थी, लेकिन अब यह नदी भारी प्रदूषण के कारण पास खड़े रहने की इजाजत भी नहीं देती। दूर से ही दुर्गंन्ध उड़ती है। पवित्र कार्तिक मास में यहां दीपदान की रस्म अब भी निभाई जाती है, लेकिन नाले जैसे गंदे पानी में दीपदान भी असहज ही लगता है, किन्तु यहां लेागों के पास और कोई विकल्प भी नहीं। शहर के बीचों बीच से निकली इसी कैथन का हाल और भी बुरा है। तहसील रोड, कार्तिक पथ सहित अनेक क्षेत्रों की गंदगी से कैथन खत्म सी हो गई है,यहां नदी का सिर्फ नाम ही बचा दिखता है, बारिश के चंद दिनों को छोड़ दें तो सिरोंज शहर में कैथन नदी खत्म हो चुकी है। नगरपालिका की घोर लापरवाही के कारण लोगों के घर की गंदगी का निकास नदी मे है। घरोंं की गंदगी के साथ ही कचरा भी नपा के वाहनों में कम और नदी में ज्यादा फेंका जा रहा है। स्वच्छता अभियान चल रहा है, लेकिन नदियों की गंदगी किसी को दिखाई नहीं देती।
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वर्जन...
बांध बनने के बाद से पेयजल की समस्या तो हल हो गई, लेकिन कैथन का प्राकृतिक प्रवाह थम गया, रेत आना बंद हो गई और वह गंदगी का शिकार होने लगी। कई क्षेत्रों की गंदगी इसमें उड़ेली जा रही है। कैथन को सदानीरा बनाना कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। प्रशासन इसके लिए कारगर योजना बनाए।
-उमाकांत शर्मा, विधायक सिरोंज
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वर्जन...
यह बहुत ही जरूरी है कि स्वच्छता अभियान में नदियों को भी शामिल किया जाए और स्वच्छता सर्वेक्षण में नगर के बीच से गुजरने वाली नदियों की स्वच्छता अथवा गंदगी के आधार पर भी अंकों का प्रावधान हो। बेतवा उत्थान समिति वर्र्षो से सतत श्रमदान कर रही है, इससे काफी अंतर आया है। लेकिन प्रशासनिक अक्षमता से नालों का नदी में मिलना नहीं रुक पा रहा। नालों का नदी में मिलना रुके तो नदियां स्वच्छ हो सकें।
-अतुल शाह, अध्यक्ष बेतवा उत्थान समिति विदिशा

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