पिथोरा पेंटिंग : राठवा और भील आदिवासी समाज द्वारा बनाई जाने वाली यह पेंटिंग विवाह, जन्म, और त्योहारों पर बनाई जाती है।
गोंड पेंटिंग : गोंड आदिवासी इस पेंटिंग में प्राकृतिक सौंदर्य, नदियों की धाराएँ, और वनस्पतियों का अद्वितीय को दर्शाते है।
ढोकरा कला : यह एक अलौह धातु शिल्प है जिसे खोई हुई मोम से बनाया जाता है। इसका नाम बंगाल के ढोकरा दामर जनजातियों के नाम पर रखा गया है।
पत्थर की नक्काशी : ग्वालियर, टीकमगढ़ और जबलपुर में यह कला प्रचलित है जिसमे बलुआ पत्थर पर नक्काशी की जाती है।
चीर गुड़िया कला : ग्वालियर, झाबुआ और भोपाल छोटे कपड़े के टुकड़ों से बनी इस प्यारी छोटी गुड़िया के केंद्र हैं।
बाटिक प्रिंट : उज्जैन के भेरूगढ़ में प्रचलित यह कपड़े पर मोम को पिघलाकर खास तरह से छपाई करने की एक कला है।
बाग प्रिंट : धार जिले की यह लकड़ी के ब्लॉक और प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर कपड़े पर डिजाइन बनाने वाली कला है। इसका नाम बाघ नदी से आया है।