मानसून के आने से पहले ही मंदिर दे देता है संकेत, छत से अचानक टपकने लगता है पानी

  • Jagannath Temple Of Kanpur : कानपुर स्थित इस चमत्कारिक जगह का नाम जगन्नाथ मंदिर है
  • इस मंदिर के गर्भ गृह में लगे पत्थर से टपकती हैं पानी की बूंदें

By: Soma Roy

Published: 17 Jun 2020, 04:34 PM IST

नई दिल्ली। भारत को मान्यताओं का देश कहा जाता है। यहां तमाम परंपराओं को निभाया जाता है। इसी कारण इसे आस्था का केंद्र भी माना जाता है। यहां हर चीजें भगवान का एक आदेश या संकेत के तौर पर देखी जाती हैं। इसलिए मानसून (Monsoon) की दस्तक से पहले ही कानपुर (Kanpur) का एक प्रसिद्ध मंदिर पहले ही संकेत दे देता है। मान्यता है कि बारिश (Rain Fall) के आने से सात दिन पहले ही मंदिर में ऐसी चीजें होने लगत हैं जिससे इसका पूर्वाभास हो जाता है। इसका नाम जगन्नाथ मंदिर (Jagannath Temple Kanpur) है।

यह मंदिर उत्तर प्रदेश के कानपुर जनपद के के भीतरगांव विकासखंड से ठीक तीन किलोमीटर की दूरी पर बेहटा गांव में स्थित है। लोगों का कहना है कि प्राचीन मंदिर की छत से अचानक पानी का टपकना बारिश होने के संकेत को दर्शाता है। यहां तेज धूप में भी पानी टपकता है। जिससे अनुमान लगाया जाता है कि जल्द ही शहर में बारिश होने वाली है। हालांकि मंदिर के रहस्य को जानने के लिए तमाम सर्वेक्षण किए गए। इसके बाद भी मंदिर के निर्माण और पानी टपकने के रहस्य से पर्दा नहीं हट पाया। पुरातत्व वैज्ञानिक महज इतना पता लगा पाए कि मंदिर का अंतिम जीर्णोद्धार 11वीं सदी में हुआ था।

गर्भ गृह के पत्थर से टपकता है पानी
प्राचीन भगवान जगन्नाथ मानसूनी मंदिर में पानी गर्भ गृह में लगे पत्थर से टपकता है। ये पत्थर मंदिर के शिखर पर लगा हुआ है। माना जाता है कि पानी की बूंदे जितनी बड़ी होती है, उतनी ही अच्छी बारिश होने की संभावना रहती है। इसी के आधार पर आस-पास के किसान खेती और फसलों की कटाई की योजना बनाते हैं।

निर्माण को लेकर संशय
कानपुर में स्थित भगवान जगन्नाथ का ये प्राचीन मंदिर बौद्ध मठ के आकार में बना हुआ है। मंदिर की दीवारें करीब 14 फीट मोटी हैं। मंदिर के अंदर भगवान जगन्नाथ, बलदाऊ और बहन सुभद्रा की काले चिकने पत्थरों की मूर्तियां हैं। जैसी रथ यात्रा पुरी उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर में निकलती है वैसे ही रथ यात्रा यहां से भी निकाली जाती है। पुरातत्व विभाग के सहायक निरीक्षक मनोज वर्मा बताते हैं कि मंदिर का जीर्णोद्धार 11वीं शताब्दी के आसपास हुआ था। जबकि मंदिर 9वीं सदी का हो सकता है। हालांकि इसका अभी सटीक प्रमाण नहीं मिला है।

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