असंपादित जिंदगी

असंपादित जिंदगी

By: Deovrat Singh

Published: 29 Aug 2021, 09:32 PM IST

विनोद विट्ठल
असंपादित जिंदगी


अबोधता से होती है शुरुआत और बढऩा होता है बेतरतीब
गति सीमा और खतरनाक मोड़ की सतर्कताएं और चेतावनियां साइनबोर्ड बन कर रह जाती हैं
बेध्यानियों और लापरवाहियों से खाया और जिया जाता है
बोए जाते हैं बीमारियों के बीज और उगती रहती है जंगली घास घर की लॉन में

एक तरफ जल जाती है और दूसरी तरफ कच्ची रह जाती है रोटी
बरसों जिसकी कहानियों के साथ सोते रहे उसी बुआ और मौसी की नहीं मिलती कोई तस्वीर
पता होते थे जिसके बीती रात आए सपने तक बरसों से उसी लड़की की खबर नहीं होती
बंद आंखों से किसी फिल्म की तरह दिखते हैं लेकिन पिता का कोई वीडिओ पास नहीं होता

बिना कैमरे की तरफ फोकस किए बनाते रहते हैं भंगिमाएं
बिखरे बालों और बिना इस्तरी के कपड़ों में अचकचाए भागते रहते हैं
किसी रॉ-शॉट की तरह दर्ज होते रहते हैं ये भूलते हुए कि लाइव है और नहीं मिलेगा रीटेक का मौका

बैक-व्यू मिरर से दिखती है बहुत सारी सूक्तियां, सफलता-गाथाएं, चमत्कार और विश्वविजय के अभियान
गूगल इंकार कर देता है रास्ता बताने से किसी पुराने शहर की कदीमी गलियों में
अचानक प्रकट होते रहते हैं सांप और दिखती रहती हैं सीढियां भी
विदाई के वक्त भूल जाते हैं ठीक से छूना या फिर चूमना ही

बिना मेकअप के होते हैं फोटो शूट
बड़ी गलती रह जाती है किसी किसी इमारत में
पैथोलोजी लैब में दिख जाती है दूरदर्शन की सलमा सुल्तान
फिजीयोथेरेपिस्ट के यहां दर्द से कराहती आशा पारिख अपनी झाुर्रियों के साथ

असंपादित फिल्म या बिना प्रूफ रीडिंग के छपे किसी उपन्यास तरह असंपादित होती है जिंदगी
जिसमें अक्सर हम खो देते हैं ओटीपी
जहां फैक्टरी सैटिंग पर जाना मुमकिन नहीं होता और न ही मनचाहे ट्रांजेक्शन कर पाना

रात वाली जींस की तरह छीजी हुई लेकिन सुविधाजनक होती है
कभी बनती जींस, कभी बनती पजामा
पीली पड़ी फोन की डायरी जिसके कुछ पन्ने किनारे से फटे होते हैं
कुछ नंबर अधूरे, कुछ नाम गायब!

Deovrat Singh
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