उलझनें दूर कर देता है खुद से संवाद

अभिशाप नहीं, अपितु वरदान है एकांत

By: सुनील शर्मा

Published: 15 May 2018, 04:28 PM IST

मैं अक्सर ब्रह्माकुमारी बहन शिवानी को यूट्यूब पर सुनती रहती हूं। मेरी उनके स्वः प्रबंधन (सेल्फ मैनेजमेंट) पर बताई गई बातों को पूरी तरह आत्मसात करने की कोशिश रहती है। उन्हीं की एक बात का जिक्र यहां करना चाहूंगी कि "हम अक्सर खुद को व्यस्त दिखाने की कोशिश करते हैं, किसी ने अगर थोड़ी सी भी सहायता मांग ली तो हमारा जबाब अक्सर 'मैं अभी काफी व्यस्त हूं' में ही होता है। ये तरीका सही नहीं है। जब भी कोई आपसे किसी भी तरह की सहायता की उम्मीद करे तो जवाब हमेशा 'मैं अभी उपलब्ध हूं', 'हां मैं अभी फ्री हूं', में ही देना चाहिए।" आज के समय में हम दूसरों के लिए ही नहीं वरन खुद के लिए भी उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि हम तो बस व्यस्तता में ही अपनी ख़ुशी ढूढ़ते हैं। हमने अपना एक अलग नजरिया बना लिया है कि अगर हम दिन में २४ घंटे व्यस्त रहेंगे तभी सही मायने में एक कामयाब इंसान कहलायेंगे।

हम अपने अकेले रहने से इतना डरने लगे हैं कि एक पल के लिए भी अकेला रहना दुश्वार सा लगता है। अगर हमें कुछ दिनों, कुछ पल के लिए भी अकेला रहना पड़ जाये तो हम तनावग्रस्त हो जाते हैं। कई बार तो ये तनाव हमें डिप्रेशन का शिकार बना देता है क्योंकि हमने ये स्वीकार कर लिया है कि हमारी खुशी लोगों से घिरे रहने में है, हमेशा काम में व्यस्त रहने में है। कोई हमारी पल भर को तारीफ कर दे तो हम खुश और किसी ने जरा सी कमी निकाल दी तो हम बहुत ज्यादा दुःखी हो जाते हैं क्योंकि हम दूसरों के नजरिये से खुद को देखते हैं। हम अपने अन्दर की खुशी को महसूस करने में डरते हैं क्योंकि ऐसा करने के लिए कुछ पल अकेला रहना पड़ेगा, खुद से संवाद करना होगा जो कि हमें कतई गवारा नहीं होता है।

अकेलापन और एकांत दोनों ही शब्द मतलब में आसपास ही लगते हैं लेकिन दोनों से जुड़ी हुई हमारी भावनाएं भिन्न भिन्न होती हैं। अकेलापन में हम अकेले होते हुए भी सारी दुनिया और लोगों के बारे में सोचते रहते हैं। हम जब अकेले होते हैं तो दुःख और उदासी का तीव्रता से अनुभव करते हैं। हमें सारी दुनिया सुखी और हम खुद को सबसे दुखी इंसान में रूप में पाते हैं। इसीलिए अकेलेपन में हम कई मानसिक बीमारियों का शिकार हो जाते हैं।

एकांत में हम सारी दुनिया से कटकर, लोगों से नितांत अपरिचित बनकर खुद के साथ वक़्त बिताते हैं, खुद से संवाद करते हैं। एकांत एक साधना की तरह है जिसे करने हम सभी शर्म और इस डर का अनुभव करते हैं कि लोग हमें पागल न समझ लें, लेकिन एकांत हम सभी के लिए एक औषधि की तरह जरूरी होता है। एकांत कुछ मिनटों-घंटों या दिनों का हो सकता है। इस वक्त को हम अपनी स्वेच्छा से चुनते हैं। यह हमारी अपनी नियंत्रण क्षमता पर निर्भर करता है। अकेलेपन में हम खुद की सोच पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं क्योंकि हम आभासी किरदारों से घिरे होते हैं और बस उनके बारे में सोचते रहते हैं। वहीं एकांत में हम सिर्फ खुद के बारे में चिंतन मनन करते हैं। एकांत हम कहीं पर भी चुन सकते हैं। अपने घर के एक कमरे को या किसी निर्जन स्थान को भी हम अपनी इस साधना का हिस्सा बना सकते हैं।

एकांत वो समय है, जितना हमने इसे परिभाषित किया है, उसके विपरीत ये अकेलापन एक जादू की तरह होता है जो हमारे अंदर नयी स्फूर्ति को जन्म देता है। जब हम सारी दुनिया की भागदौड़ से कोसों दूर एक शांत जगह या शांत कमरे में सिर्फ खुद से संवाद करते हैं तो हम पाते हैं कि हमारे अंदर एक और इंसान बसता है जो हमारे बाहरी व्यक्तित्व से सर्वथा भिन्न है। कुछ ऐसी रुचियाँ, कुछ ऐसे शौक, एक अलग ही व्यक्तित्व, जो हमने दूसरों के नजरिये के लिए भुला दिया था वो अभी भी बाकी है।

अपने हाथों से गोल रोटियां बनाने की कोशिश करने में, पेंटिंग ना आते हुए भी टेढ़ी -मेढ़ी आकृतियां बनाने में और एक अच्छा चित्र बनाने की कोशिश करने में, अपने आसपास की निर्जीव चीजों को सजीव मानकर उनसे बात करने में, तैरना न आते हुए भी नदी में, समुंदर के किनारों में ही थोड़ी सी छप-छप करने में, कभी-कभी बिना किसी गहरे मजाक के भी अकेले यों ही हंस लेने में, और ऐसी ही बहुत सी छोटी-छोटी बचकानी हरकतें हमारे अकेलेपन में भी खुशियों के रंग भर देती हैं। ये कोशिशें हमें निरंतर बढ़ने का हौसला देती हैं, जीवन की नयी सीख देती हैं। बशर्ते अपनी कमियों-अच्छाइयों को हम खुद से अकेले ही समझने की कोशिश करें।

शायद हम सभी अपना बचपन भूल गये होंगे, जब आज की तरह बहुत सारे टीवी चैनल, मोबाइल, इंटरनेट आदि की सुविधा नहीं हुआ करती थी। इसके बाद भी स्कूल की वार्षिक परीक्षाओं के बाद दो महीने की गर्मी की छुटियों का बेसब्री से इंतजार रहा करता था। सारी दोपहर हम सभी कुछ न कुछ अलग करने में बिताया करते थे, जैसे मम्मी के सोने के बाद रसोई में जाकर कुछ अलग बनाने की कोशिश करते थे (वो अलग बात थी कि जो भी बनता था वो खाने लायक तो नहीं होता था) लेकिन जब सारी रसोई तहस-नहस करने के बाद बाहर आते थे तो किसी कुशल शेफ से कम तो खुद को नहीं समझते थे। सांप-सीढ़ी, लूडो, गुड्डे-गुड़िया की शादी जैसे खेल जाने कितनी बार खेलते थे।

उस वक़्त कॉमिक्स, कहानियों की किताबें पढ़ने की छूट सिर्फ गर्मियों में मिलती थी तो उन्हें पढ़ने के बाद कितनी देर तक ये कल्पनायें बुना करते थे, कि काश! हमारे पास भी चॉकलेट के पेड़ होते, कैंडी के बगीचे होते, वो टीवी वाला फ्लेवर्ड दूध, मिल्कशेक की नदी घर के पास से निकलती और चाचा चौधरी, नागराज, शक्तिमान हमारी सारी परेशानियां एक पल में सुलझा देते। परियां रोज रात को हमसे मिलने आएंगी, ये सोचकर रोज आँगन में सोया करते थे। रात में किसने कितने तारे गिने, इसकी प्रतियोगिता हुआ करती थी। और पहली बारिश में भीगते हुए कागज की नाव बहाना, ये सब अब तो हमें याद भी नहीं होगा क्योंकि हम बहुत व्यस्त रहते हैं।

आज हम सारी सुविधायें होते हुए भी अपनी सारी रचनात्मकता खो चुके हैं क्योंकि हम अपने हर तरह के ज्ञान के लिए इंटरनेट पर निर्भर हैं, हमने कल्पनाएँ करना बंद कर दिया है क्योंकि हम व्यावहारिक हो गए हैं और हमारे पास खुद को देने के लिए वक़्त नहीं है। लेकिन ये व्यावहारिकता हमसे खुद से दूर कर देती है। आज हमारे पास सारी दुनिया से दोस्ती करने का वक़्त और साधन तो हैं लेकिन ऐसा कोई साधन नहीं हैं जो हमारी खुद से दोस्ती करवा दे। ये बेहद जरूरी है कि हम थोड़ा वक्त खुद को भी दें। थोड़ी देर अकेले भी रहें, खुद से दोस्ती करें। मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकती हूँ कि कई बार खुद की उलझनों, परेशानियों का हल कुछ वक्त अकेले रहकर, खुद से संवाद करके मिल जाता है। दिन में 5 मिनट से लेकर आधा घंटे का समय सिर्फ खुद को देने के लिए तय करें और खुद से संवाद करें।

क्योंकि एकांत में वो जादू है जो हमें हमारी कल्पनाएँ, रचनात्मकता वापस देता है। हम खुद की उलझन को बड़ी आसानी से समझ पाते हैं और उन्हें सुलझाने का रास्ता निकाल पाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण चीज़ वो, जो हमें एकांत में खुद की संगत से हासिल होती है, वो है कि हम खुद से दोस्ती कर लेते हैं जो हमें हर वक्त में सहज रहने की हिम्मत देती है। एकांत को सही सोच के साथ जिया जाये तो ये कोई अभिशाप नहीं, अपितु एक वरदान की तरह साबित होता है।

- विरासनी बघेल
(ब्लॉग से साभार)

सुनील शर्मा
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