मोटिवेशन : सच और साहस से दूर भाग जाता है मन का डर

डर वह अवस्था है जो हमें अपनी वास्तविक क्षमताओं का ज्ञान होने से रोकती है यानी इसको पार पाकर ही हम अपनी अधिकतम क्षमताओं को उपयोग कर पाएंगे

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Published: 10 Dec 2017, 09:45 AM IST

डर से हम सब अच्छी तरह से परिचित हैं, क्योंकि हमारी जिंदगी में ऐसे बहुत से अवसर आते हैं जब हम डर रहे होते हैं, नए काम से, खतरा उठाने में, कुछ नया सीखने में, निर्णय लेने में, अपनी बात कहने में, मुश्किलें आने पर। डर से मुकाबला करना सीखें।

डर वह अवस्था है जो हमें अपनी वास्तविक क्षमताओं का ज्ञान होने से रोकती है यानी इसको पार पाकर ही हम अपनी अधिकतम क्षमताओं को उपयोग कर पाएंगे। ज्यादातर लोग डर से घबरा जाते हैं, रुक जाते हैं और दिशा बदल लेते हैं, निर्णय बदल लेते हैं। वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो डर को अपना दोस्त बना लेते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। डर हमारे दिमाग की स्वाभाविक अवस्था है यानी जब हम किसी एक ही तरह के वातावरण, तरीके व सोच के आदी हो जाते हैं और फिर हमें कुछ अलग या नया करना पड़े, तब डर लगता है मतलब स्पष्ट है कि डर लग रहा है यानी कि कुछ नया करने जा रहे हैं। यह हम सबके जीवन का हिस्सा है लेकिन यदि हमने अपने डर का सही मैनेजमेंट करना सीख लिया तो हम अपनी असली क्षमताओं को जान पाएंगे। डर का सामना करो और इसका सामना करने के लिए कुछ तरीके प्रभावकारी हैं-

काम होने की कल्पना

जिस भी कार्य से हमें डर लग रहा हो, उसको करने से पहले अपनी कल्पनाशक्ति का उपयोग करते हुए आंखे बंदकर यह सोचना और महसूस करना कि यह कार्य हो गया है व आपने अच्छे से उसको अंजाम दिया है। यह अभ्यास यदि हम बार-बार करते हैं तो हम अपने अवचेतन मन में इसकी सूचना दे देते हैं कि हम उस कार्य में सफल हो गए हैं और हमारा यह मन धीरे-धीरे हमें सकारात्मक ऊर्जा देता है। यह तकनीक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में काम करती है।

कम सोचें, ज्यादा करें

ज्यादातर डर उस काम के शुरू होने से पहले की अवस्था में महसूस होते हैं और उसके बारे में हम जितना सोचते हैं, उतना ही वह बढ़ता जाता है। एक बार आपने तय कर लिया और योजना बना ली तो फिर उस पर कार्य करना तुरंत शुरू कर दें। धीरे-धीरे आपके मन का डर नए विचारों में बदल जाएगा और आपका ध्यान कार्य पर केंद्रित होने लगेगा। इसलिए आपको ज्यादा सोच-विचार करने के बजाय ज्यादा काम करने के बारे में प्लानिंग बनानी चाहिए।

परिणाम स्वीकार करें

हमारा सबसे बड़ा डर यही होता है कि अगर जीवन में विफल हो गए तो फिर क्या होगा? और कमाल की बात तो यह है कि सफलता-विफलता के मानक हमारे दिमाग ने ही तय किए हैं। यही वजह है कि जैसा हमने सोचा, वही परिणाम आए तो हम सफल अन्यथा विफल। यदि हम अपने दिमाग को पहले से ही यह निर्देश दें कि परिणाम कैसा भी आए, वह सिर्फ परिणाम होगा और वह मुझे स्वीकार्य होगा। इस तरह से हम परिणाम के प्रति सहज हो जाएंगे।

शारीरिक गतिशीलता

हमारी शारीरिक अवस्था ही हमारी मानसिक अवस्था को तय करती है। अक्सर डर के मुश्किल समय में हमारी शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं। हम सोचने और चिंतित रहने में ज्यादा समय बिताते हैं और डर बढ़ता है। जब भी डर महसूस हो तो शारीरिक गतिविधियों को बढ़ा दें। नियमित व्यायाम योग ??, खेलना, सुबह की सैर, ध्यान, डांस, दौडऩा आदि जारी रखें। इससे आपकी मानसिक अवस्था में नियमित बदलाव आता रहेगा।

रुको नहीं, चलते रहो

कई बार डर उस वक्त हमें जकड़ता है, जब हम उस काम को कर रहे होते हैं और हमें लगता हैं कि परिणाम सही नहीं आ रहे हैं। ऐसी स्थिति में हम रुक जाते हैं, ध्यान रहे कि रुकने पर डर ज्यादा हावी होगा। अपने प्रयास जारी रखें। यदि जरूरत हो तो अपने तरीके बदल लो, नए विकल्प तलाश लें, जरूरत हो तो मदद लें पर रुकें नहीं।

योजना को टुकड़ों में बांटो

बड़े काम-बड़ी योजना-बड़ा डर। अपनी उस योजना को, जिससे आप घबरा रहे हैं, छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट लें और प्रत्येक चरण में कितना काम करेंगे यह तय करें। समय तय करें। इस समय सीमा में सिर्फ उस चरण के कार्यों पर ध्यान दें और हम पाएंगे कि हमारे अंदर विश्वास आ गया है।

डर से बातचीत करें

डर को खत्म का सबसे प्रभावी तरीका है कि उससे बातचीत शुरू की जाए। आप अपने डर से सवाल करें कि मैं ऐसा क्यों सोच रहा हूं, ऐसी कौनसी वजह है जिससे मुझे डर लग रहा है।

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