बच्चों में संस्कार जरूरी

Jameel Khan

Publish: Feb, 15 2018 05:49:32 PM (IST)

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बच्चों में संस्कार जरूरी

अत: बालक का गुणवान होना आपके लिए तो आवश्यक है ही। राष्ट्र के लिए भी कम जरूरी नहीं है।

विकसित और सुसभ्य समाज में शिष्टाचार का महत्त्व अब समझाने की बात नहीं रह गई है। परिवार के बच्चे ही उस घर का आइना होते हैं तथा बताते हैं कि उस घर में आधुनिक जीवन के संस्कार किस हद तक आ पाए हैं। यदि बच्चे घर आने वाले लोगों पर प्रभाव नहीं डाल पाते हैं, तो यह हमारी निराशा का कारण बन जाता है। आज हर परिवार व घर के लोगों की पहली ख्वाहिश होती है कि उनके बालक सुसभ्य तथा संस्कारवान हों।

इसके लिए यदि समय रहते उन्हें शिष्टाता का पाठ पढ़ाया जाए, तो बच्चों में उद्दण्डता तथा उच्छृंखलता का प्रतिशत बढ़ जाता है तथा सामान्य शिष्टाचार भी नहीं आ पाता। बच्चे जान ही नहीं पाते कि किसी के घर आने पर उन्हें 'नमस्ते’, 'नमस्कार’ अथवा 'गुड मार्निंग’ या 'गुड नाइट’ भी कहना होता है। बच्चों को यह भी पता नहीं चलता है कि जब बड़े बात कर रहे हों तो उन्हें बीच में जाकर अपनी बात नहीं कहनी चाहिए।

बच्चे को संस्कार सिखाने के लिए उसकी शिशु अवस्था से ही सजग रहना चाहिए। अल्पायु में जैसा बालक को आप बनाएंगे-सिखाएंगे, वही वह बड़ा होकर करने वाला है। अत: बच्चे को हर घर में आने वाले को 'अंकल’ तथा उसके आदर स्वरूप 'नमस्ते’ आदि कहलवाने की आदत डालें। इसके अभाव में बच्चा जब बड़ा होता है, तो उसे ये शब्द बोलना अटपटा तथा संकोचपूर्ण लगता है। बालपन से ही यदि यह शब्द उसकी आदत में आ जाते हैं तो उसे इनका अभ्यास हो जाता है तथा वे शिष्टाचार को सीख लेते हैं। मेहमान घर में आए और उनके लिए चाय-नाश्ता तैयार हुआ तो बच्चे को यह जानना चाहिए कि वह या तो उस जगह रहें नहीं अथवा खाने की चीजों में बिना कहे हाथ न डालें। यह असभ्यता माना गया है आजकल। यह आपके बालक की तथा आपके संस्कारों की पोल खोलकर रख देता है। इसलिए बच्चे को बचपन से ही शिष्टाचार जानने के लिए सचेष्ट करें तो वह उसकी आदत बन जाएंगे। बच्चों को हमें दूसरी जगह भी जाना ले जाना होता है। उन्हें उस समय जो 'मैनर्स’ रखने हैं, उसका भी ज्ञान कराइए।

वे वहाँ जाकर अपने घर की तरह धमा-चौकड़ी तो नहीं मचा रहे अथवा ज्यादा बोल तो नहीं रहे या फिर खाने-पीने की चीजों की तरफ ललचाई दृष्टि से देख तो नहीं रहे। वे वहाँ जाने पर यदि बड़ों को आदर स्वरूप हाथ बाँधकर 'नमस्कार’ करते हैं, तो उससे आपकी भी शान बढ़ती है। सामने वाले को लगता है कि इनके बच्चे बड़े ही शिष्ट, सौभ्य तथा संस्कारवान हैं। इसलिए मेहमान नवाजी के नियमों के साथ मेजबानी के मोटे नियम बच्चों के ज्ञान-कोष में पैदा किए जाने चाहिए। दूसरों के यहाँ जाकर अक्सर बच्चे वहाँ रखी चीजों को छेडऩे लगते हैं, किताबें फैलाने लगते हैं अथवा काँच की चीजों को तोड़-फोड़ डालते हैं।

ऐसा करने से बच्चे के बारे में मिथ्या प्रचार होता है तथा आपके दोबारा आने पर लोग कतराने लगते हैं। बच्चों के बारे में एक गलत छवि अपना स्वरूप बनाने लगती है। वे वहाँ जिद न करें। कई बार बच्चे खाने की बड़ी या पूरी चीज अथवा कप को पूरा भरकर चाय-कॉफी लेने की जिद करने लगते हैं। यह बहुत ही लज्जास्पद बात है। बच्चा जब आता है तो माँ के पेट से कुछ भी सीखकर नहीं आता।

वह सब बातें शनै: शनै व्यावहारिक जीवन से सीखता है। उसे भली-बुरी बात का ज्ञान कराऐं। खाने-पीने, रहने-सहने, ओढऩे-पहनाने, बोलचाल एवं उठने-बैठने का सलीका आप स्वयं को ही बताना होगा। उसे ज्ञान कराना होगा कि यह गलत है और यह सही है। निरन्तर उसके मानस पर अच्छी बातों का प्रभाव बनाए रखने से वह सलीका जानने लगता है। वह बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करें, बड़ों से कैसे बोलें, स्कूल में शिक्षकों के साथ किस तरह सम्मान का बरताव करें और मोहल्ले में रहने वाले पड़ोसियों के साथ किस तरह उठें-बैठें, उसे यही नहीं पढऩे तथा नहाने-धोने सोने का भी 'प्रापर’ ज्ञान दिया जाना अपेक्षित होता है।

खाने या चाय पीने के बाद बर्तनों को नियत-स्थल वॉस बेसिन की जगह ही रखें। घर के कामकाज में हाथ बँटाने में उसकी रूचि भी जगानी चाहिए। बात-बात में रोने, मचलने तथा जिद न करने की सामान्य शिष्टताएं वह जान लेगा तो आपकी पहली पाठशाला की पढ़ाई पूरी समझिए। आज जबकि जीवन मूल्य विघटन बड़ी तेजी से हो रहे हैं तथा सामाजिक जीवन में भी अराजक स्थितियाँ दिन-दिन बढ़ और फेल रही हैं।

ऐसे में मन्द बालक संस्कारशील बनेंगे, तो सामाजिक जीवन मूल्यों की पुनस्र्थापना में भी आप और आपका बच्चा महती भूमिका निबाह सकेंगे। अशिष्टता, असभ्यता तथा संस्कारहीनता से पारिवारिक शान्ति का लोप हो जाता है तथा सदैव घर में क्लेश का वातावरण बना रहता है। बच्चे के सभ्य-संस्कारवान बनने पर राष्ट्र को जिम्मेदार नागरिक मिलेंगे तथा राष्ट्रीयता की भावना को बल मिलता है।

अत: बालक का गुणवान होना आपके लिए तो आवश्यक है ही। राष्ट्र के लिए भी कम जरूरी नहीं है। अत: बच्चों में जिम्मेदारी का अहसास जगाना समय की माँग है, यदि वे सामान्य शिष्टाचार का सबक नहीं सीख सके तो यह अभिभावकों की कमजोरी मानी जाएगी, बच्चे पर दोष बाद में आएगा।

चन्द्रकान्ता शर्मा

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