आखिर कब प्रदूषण मुक्त होगी गंगा?

Jameel Khan

Publish: Dec, 07 2017 05:23:12 (IST)

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आखिर कब प्रदूषण मुक्त होगी गंगा?

भारतीय संस्कृति और परम्पराएँ माँ गंगा की गोद में पली बढी हैं।

भारतीय संस्कृति और परम्पराएँ माँ गंगा की गोद में पली बढी हैं। वैदिक और पौराणिक ऋषियों के मंत्रों से युक्त माँ गंगा , रामायण और महाभारत का इतिहास निहारती माँ गंगा, हजारों वर्षो से भारत की शास्त्रीय तथा ताŸिवक धारा को अपने भीतर समेटे हुए हैं। भारत की सर्वाधिक सतोगुणी नदी माँ गंगा ,गंगा, विष्णुपदी, भागीरथी, त्रिपथगा, त्रिस्त्रोता, भीष्मसु इत्यादि नामों से शोभायमान हैं।

शास्त्रीय महीमा से देखा जाए तो गंगा एक ऐसी नदी है यदि हम किसी भी नदी में भले ही स्नान करले लेकिन भावना उसमें गंगा की ही करते हैं। विशाल जल राशी समेटे हुए गंगा भारत की जीवन धारा हैं। यह केवल नदी ही नही है अपितु भारत की आस्था ,संस्कृति, परम्परा, सभ्यता का स्वर्णिम इतिहास, प्रेरणा व पूजा हैं।

भारत की शाश्वत पहचान,आजीविका का उपक्रम और मर्यादा हैं। हिन्दू परम्परा में जहाँ गंगा माँ के रूप मे पूज्य हैं, वहीं सिख धर्म की शक्ति के रूप गंगा का बडा योगदान रहा हैं। पटना साहिब गंगा के किनारे ही हैं। गंगा के जलीय स्वरूप ने गौतम बुद्ध, जैन धर्म के तीर्थंकरों, और आदि शंकराचार्य को भी प्रभावित किया हैं। गंगा देश की प्राकृतिक सम्पदा ही नहीं अपितु जन जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी हैं।


देश के चौथाई भू भाग पर आधारित गंगा 2525 कि.मी. में गंगोत्री से बंगाल की खाडी तक का सफर तय करती हुई, 10,800,00 वर्ग किलोमीटर में जलसंग्रहण से युक्त होकर 38,000 घन मीटर प्रति सैकन्ड औसत बहाव क्षेत्र से युक्त होकर देश के भू-भाग का २६ प्रतिशत पोषित करती हुई अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती हैं। जिस प्रकार हमारे शरीर की मुख्य रक्त वाहिनी सैकडों शिराओं और असंख्य कोशिकाओं को रक्त के जरिए पोषित करती है ठीक वैसे ही दर्जन भर प्रमुख सहायक नदियों और सैकडों छोटी, बडी उपसहायक मौसमी, पठारी मैदानी नदियों का जाल गंगा के सहारे बहकर भारत के एक बडे भू भाग को कृषि ,आजीविका के साथ जीवन जीने की उम्मीदे भी बांधे रखता हैं।

देश की 43 प्रतिशत आबादी अर्थात् 50 करोड से अधिक आबादी गंगा और इसकी सहायक नदियों के जल पर ही आश्रित हैं। गंगा के बारे में आदिकाल से ही बहुत कुछ कहाँ सुना और लिखा गया हैं। इसके प्रवाह मार्ग में हजारों वर्षो से सभ्यताएँ पनपती रही हैं। संरक्षित, सदानिरा गंगा का महŸव बहुत बडा हैं। बच्चों की मस्ती, युवाओं की शक्ति, क्रियाशीलता, किसानो का भरोसा, वृद्धों का विश्वास, गंगा से ही हैं।

यह समझ से परे है कि हम इस जीवनदायिनी, मोक्षदायिनी, पापनाशिनी, कल्याणकारी, गंगा के साथ कठोर व निर्दयी क्यों हैं? जहाँ एक तरफ गंगा और उसकी सहायक नदियों का जल भारत की समृद्धि, प्रगति,और जीवन की गतिशीलता का प्रमाण हैं। वहीं गर्मियों में गंगा का प्रवाह 40 प्रतिशत शेष रहता हैं और यह भी पानी पिघलते हुए हिमनदों से ही आता हैं। अगर सहायक नदियों विलीन हो गयी तो हिमनद भी पिघलकर पर्याप्त पानी नहीं दे पाएगा।

तब शायद गंगा को वर्तमान रूप में भारत की भावी पीढियाँ देख ही नहीं पाए। इस तरह भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी गंगा जो भारत और बांग्लादेश में मिलकर 2510 कि.मी. की दूरी तय करते हुई उत्तराखंड में हिमालय से लेकर बंगाल की खाडी के सुदंरवन तक विशाल भूभाग को सींचती हैं। इसके बदले भारत के 5 राज्य, 29 नगर, 40 कस्बे, हजारों छोटे बडे गाँवों की 40 करोड आबादी गंगा में सीवेज तथा मलमूत्र छोडती हैं। जिसके कारण विश्व की १० प्रदूषित नदियों में से गंगा सर्वाधिक प्रदूषित नदी बन गई हैं।

1986 के बाद पिछले लगभग तीस साल से किए जा रहे गंगा सफाई के प्रयास में गंदगी घटने के बजाय बढी हैं। गंगा में उद्योगों से 80 प्रतिशत नगरों से 15 प्रतिशत ,पर्यटन धार्मिक कर्मकांडो से 5 प्रतिशत प्रदूषण होता हैं। 8 राज्यों में फैली गंगा प्रणाली में पूरे देश में ६० प्रतिशत से अधिक अपशिष्ट उश्रर हावडा का सीधे गंगा में प्रवाहित होता हैं। गंगा के कछारी क्षेत्र में कृषि में उपयोग में आने वाले उर्वरको की मात्रा सौ लाख टन हे जिसका पाँच लाख टन बहकर गंगा में मिल जाता हैं।

एक अनुमान के अनुसार 3000 टन कीटनाशक प्रतिवर्ष गंगा में प्रवाहित हो रहा हैं। सैकडो टन रसायन, कारखानो, बूचडखानो, अस्पतालों, चमडा उद्योगो, एवं सैकडो अन्य फैक्टरियों का उपद्रव्य गंगा में मिलता हैं। ४०० करोड लीटर अशोधित अपद्रव्य, 900 करोड अशोधित गंदा पानी गंगा में मिल जाता हैं। नगरों और मानवीय क्रियाकलापो से निकली गंदगी, नहाने धोने, पूजा, पूजन सामग्री, शव विसर्जन, दाह संस्कार, मूर्ति विसर्जन से निकला प्रदूषण गंगा में समा जाता हैं।

भारत में गंगा तट पर बसे सैकडों नगरों का ११०० करोड लीटर अपशिष्ट प्रतिदिन गंगा में मिल जाता है। इसका कितना भाग शोधित होता है। इसकी प्रमाणिक जानकारी नही हैं। लक्ष्य तो यह हे कि २०२० तक गंगा पूर्णतया प्रदूषण मुक्तहो जाए जो सम्भव नही हैं। यह एक सबसे बडी चुनौती हैं। ग्ंागा को प्रदूषण मुक्त करने एवं पूर्ण संरक्षण प्रदान करने की प्रक्रिया को एक उदाहरण के रूप में भी समझे तो दुनिया की सबसे ज्यादा स्वच्छ नदी टेम्स जो की १९५७ में प्रदूषण के कारण जैविक रूप से मृत घोषित कर दी गई थी क्योकि उसमें पायी जाने वाली गंदगी से किनारो में बसे शहरों में सर्वाधिक रोग फैलना प्रारम्भ हो गया था।

सामुहिक प्रयासो के बाद कि गई सफाई के पश्चात आज इस नदी में मछलियों की १२५ प्रजातियाँ मिलती हैऔर वर्तमान में यह नदी पूर्णतया स्वच्छ घोषित कर दी गई हैं। गंगा को शुद्ध और प्रदूषण मक्त करने एवं पूर्ण संरक्षण प्रदान करने के लिए उत्तराकाशी में मजिस्ट्रेट के द्वारा एक नियम बना दिया गया है कि उत्ताराकाशी पवित्र तीर्थ स्थल में पर्यावरण एवं साफ सफाई के लिए धारा १४४ लागू है।

इसके तहत पॉलीथिन एवं कैरीबेग और प्लास्टिक के उपयोग पर इस क्षेत्र में प्रतिबंध हैं। उल्लंघन करने पर आई पी सी की धारा १८८ के तहत छ: माह की सजा एवं १ हजार रूपये के जूर्माने का प्रावधान भी निर्धारित किया गया हैं। गंगा संरक्षण के लिए सरकार के द्वारा प्राप्त पर्याप्त बजट ,पारिस्थितिकी संरक्षण, समुदाय की भागीदारी जैसे पक्षों पर भी ध्यान देना अनिवार्य हैं। गंगा बहती है, इसलिए अविरल हैं।

नदी का बहना बंद होने का अर्थ है नदी की मृत्यु। फिर हमें एक बार और सोचना पड़ेगा कि गंगा कि मृत्यु का अर्थ कितना भयावह हो सकता हैं। हमे चाहिए कि गंगा बहे और बहती रहें, स्वच्छ, निर्मल, प्रदूषण से रहित अविरल और निरन्तर । करोडों लोगों के जीवन को सम्भालने, सहेजने वाली गंगा अपने वास्तविक स्वरूप में कब आएगी? हम चाहें तो हमारे देश का गौरव, धार्मिक आस्था का आधार माँ गंगे को बचा सकते है। यह हमारे सामूहिक प्रयास पर ही निर्भर हैं।

 

डॉ.नीतू सोनी

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