ANTI VACCINATION : क्या अमीर देशों का भरोसा तोड़ रहा है टीकाकरण विरोधी तबका

-वैक्सीन के निर्माण में अग्रणी रहने वाले देशों में ही समर्थन नहीं

61 फीसदी डेमोक्रेट्स की तुलना में महज 37 फीसदी रिपब्लिकन्स समर्थक चाहते हैं कि वायरस के लिए वैक्सीन का प्रयोग हो

By: pushpesh

Updated: 31 Aug 2020, 12:03 AM IST

न्यूयॉर्क. ये विचित्र बात है कि जो देश सुविधा संपन्न और चिकित्सा विज्ञान में अग्रणी हैं, उनका रवैया टीकाकरण को लेकर संकीर्ण हो गया। वैश्विक महामारी के बीच संपन्न देशों की ऐसी सोच इस लड़ाई को लंबा कर सकती है। असल में इसके पीछे वैक्सीन निर्माताओं के खिलाफ खड़ा टीकाकरण विरोधी तबका है, जो मानता है कि ये दवा उद्योग को लाभ पहुंचाने के लिए है। शोध और चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी रहने वाले अमीर देशों का वैक्सीन के प्रति नजरिया चौंकाने वाला है। फ्रांस, अमरीका, जापान जैसे कई देशों में लोग महामारी की रोकथाम के लिए इसे पूरी तरह प्रभावी नहीं मानते। इससे उलट गरीब देशों में लोगों का टीके पर भरोसा कायम है।

महामारी के बीच टीकाकरण को लेकर ऐसा मुश्किल पैदा कर सकता है। वेलकम ट्रस्ट की ओर से करवाए एक सर्वे में ये सच निकलकर आया है। सर्वे के मुताबिक अमीर देशों में मुश्किल से 70 फीसदी नागरिकों को लगता है कि टीके सुरक्षित हैं। इसके विपरीत पश्चिम अफ्रीका में 85 फीसदी और दक्षिण एशिया के 95 फीसदी लोग इसे सुरक्षित और प्रभावी मानते हैं। ऐसा इसलिए नहीं है कि अमीर देशों के नागरिक ने चिकित्सा अनुसंधान से किनारा कर लिया है। बल्कि डॉक्टर्स और चिकित्सा विज्ञान में अमीर देशों के लोग, गरीब देशों की तुलना में ज्यादा विश्वास व्यक्त करते हैं। पश्चिम का टीकों को लेकर अविश्वास पहले ही बड़ा हो चुका है।

टीकाकरण के बाद भी लौटा था खसरा
इसकी वजह भी है, 1960 के दशक में सामूहिक टीकाकरण शुरू होने के बाद खसरा लगभग खत्म हो गया था, लेकिन फिर लौट आया। 2019 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ब्रिटेन, अल्बानिया, चेक गणराज्य और ग्रीस का खसरामुक्त होना निरस्त कर दिया। अमरीका में भी 1992 के बाद काफी मामले सामने आए। जब कोविड-19 का संक्रमण फैला तो सर्वे फर्म ‘यूगोव’ ने अमरीकियों से इस पर राय मांगी। जिसमें 85 फीसदी रिपब्लिकन और डेमोके्रट समर्थक मानते हैं कि खसरे का टीका बच्चों के लिए सुरक्षित है। लेकिन अनिवार्य टीकाकरण के लिए वैचारिक भेद सामने आया, जो कोविड-19 को लेकर और बढ़ गया। 61 फीसदी डेमोक्रेट्स की तुलना में महज 37 फीसदी रिपब्लिकन्स समर्थक चाहते हैं कि वायरस के लिए इसका प्रयोग हो। मध्यम आयु वर्ग और कम शिक्षित लोगों में तो यह आंकड़ा मुश्किल से 30 फीसदी है। ये कोविड-19 को उखाड़ फेंकने की इच्छा रखने वाली सरकारों के लिए बुरी खबर है। वेलकम के सर्वे से सामने आया कि कई देशों में वैक्सीन चाहने वाले 50 फीसदी से भी कम हो सकते हैं। अन्य सर्वेक्षणों से पता चलता है कि लोगों को टीके के लिए राजी करना उतना ही मुश्किल हो सकता है, जितना इसे पहली बार तैयार करना।

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भ्रम से डिगा भरोसा
टीकाकरण को लेकर पहले से भ्रम फैलाया जा रहा है। 1998 में मेडिकल जर्नल लॉन्सेट में प्रकाशित एक अध्ययन में इसे लेकर भ्रामक बातें लिखी गई थीं। बाद में पता चला कि अध्ययन के ब्रिटिश लेखक एंड्रयू वेकफील्ड को वैक्सीन निर्माताओं पर मुकदमा चलाने वालों ने पैसे दिए थे। इस तरह वेकफील्ड के छल ने एंटीवैक्सीन सेंटीमेंट पैदा कर दिया।

वैक्सीन न होती तो..
यह सच है कि वैक्सीन नहीं होती तो बड़ी महामारियां दुनिया की बड़ी आबादी को निगल चुकी होती। 1918 का स्पैनिश फ्लू, चेचक, इबोला, पोलियो, डीपीटी, टिटनेस जैसी बीमारियों पर वैक्सीनेशन से ही रोक लग सकी।

कैसे कैसे भ्रम पैदा किए जाते हैं
-टीके से ऑटिज्म होता है।
-दवा कंपनियों को मुनाफा दिलाने के लिए नेता कोविड-19 से डरा रहे हैं।
-बिल गेट्स टीके के जरिए बच्चों में माइक्रोचिप्स लगा देंगे।

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